ETV Bharat / bharat

'सिर्फ दिखावे की कार्रवाई, सरकारी मशीनरी की चौंकाने वाली नाकामी', उत्तराखंड फॉरेस्ट लैंड कब्जा मामले पर SC की टिप्पणी

उत्तराखंड फॉरेस्ट लैंड पर कब्जे पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने सरकार से हलफनामा मांगा है.

Encroachment on forest land
उत्तराखंड फॉरेस्ट लैंड कब्जा मामले पर SC की टिप्पणी (PHOTO-ANI)
author img

By Sumit Saxena

Published : January 5, 2026 at 6:28 PM IST

7 Min Read
Choose ETV Bharat

दिल्ली: उत्तराखंड में जंगल की जमीन पर कब्जे में मामले में सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तराखंड सरकार ने उन लोगों के खिलाफ सिर्फ दिखावे की कार्रवाई की है, जिन्होंने सिस्टमैटिक तरीके से जंगल की जमीन पर कब्जा किया है. एक अंतरिम रिपोर्ट का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सरकारी या जंगल की जमीन की सुरक्षा में सरकारी मशीनरी की चौंकाने वाली नाकामी को दर्शाता है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से साइट प्लान, बनाए गए कंस्ट्रक्शन और इन कंस्ट्रक्शन के नेचर के बारे में एक पूरी जानकारी वाला हलफनामा दाखिल करने को कहा है.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने मामले की सुनवाई की. सीजेआई की बेंच ने कहा कि, उसने जांच कमेटी द्वारा दाखिल अंतरिम रिपोर्ट देखी है. यह सरकारी/जंगल की जमीन की सुरक्षा में सरकारी मशीनरी की चौंकाने वाली नाकामी को दिखाता है. ऐसा लगता है कि जमीन पर सालों से सिस्टमैटिक तरीके से कब्जा किया गया था. 2023 में कुछ नोटिस जारी करके कब्जा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का नाटक किया गया. जिसके बाद, हाईकोर्ट ने कुछ अंतरिम रोक लगा दी और अधिकारी फिर से सो गए. हमें लगता है कि राज्य में एग्जीक्यूटिव पद पर बैठा हर व्यक्ति इस मामले में लगातार लापरवाही के लिए जिम्मेदार है.

सीजेआई ने आगे कहा कि, यह जमीन हड़पने वालों के साथ मिलीभगत और साजिश का मामला लगता है. कोर्ट, कुल जमीन और उस पर कितने लोग कब्जा किए हुए हैं, इसकी जानकारी जानना चाहता है. अगर जरूरत पड़ी तो जमीन पर कब्जा करने वालों की पहचान के लिए गहरी जांच का आदेश दिया जाएगा, यह तय करने के लिए कि क्या उन्हें उन अधिकारियों से सुरक्षा और समर्थन मिल रहा है, जिनसे सरकारी संपत्तियों की देखभाल करने की उम्मीद की जाती थी.

सीजेआई ने दो हफ्ते के अंदर एक पूरी जानकारी वाला हलफनामा राज्य सरकार से मांगा है. बेंच ने साइट प्लान और बनाए गए कंस्ट्रक्शन और इन कंस्ट्रक्शन के नेचर के बारे में भी जानकारी मांगी और कहा कि अंतरिम निर्देश जारी रहेंगे.

सुनवाई के दौरान, सीजेआई ने उत्तराखंड सरकार के अधिवक्ता से पूछा कि, क्या कोर्ट के आदेश की वजह से आपने दावा करना शुरू किया है?

अधिवक्ता ने जवाब दिया, यह निश्चित रूप से सरकारी/ जंगल की जमीन है. सरकार ने 1990 और 2023 में भी कार्रवाई की और कोर्ट का ध्यान एक चार्ट पर दिलाया. इस पर सीजेआई ने कहा, क्या आप कभी-कभी औपचारिक कार्रवाई कर रहे हैं?

बेंच ने कहा कि, वह चार्ट की जांच करने में दिलचस्पी नहीं रखती है और अधिवक्ता से राज्य द्वारा की गई कार्रवाई का विवरण देते हुए रिकॉर्ड पर एक उचित हलफनामा दाखिल करने को कहा.

अधिवक्ता ने जवाब दिया कि अंतरिम रिपोर्ट में दो बातें कही गई हैं. एक तो 1950 के दस्तावेजों की जरूरत थी और हमने उत्तर प्रदेश राज्य को कुछ दस्तावेज देने के लिए लिखा है.

सीजेआई ने अधिवक्ता से राज्य के आचरण और उसने क्या किया है और 2000 में अस्तित्व में आने के बाद राज्य ने क्या किया, यह समझाने को कहा. सीजेआई ने कहा, 'आपने उसके बाद क्या किया है, नहीं तो हम आप में से हर एक की जवाबदेही पूछेंगे? आप लोगों को उनके घर बनाने देते हैं, आप पीढ़ियों को वहां रहने देते हैं और फिर अचानक सिर्फ कोर्ट के आदेश की वजह से, आप उसके पीछे छिपना चाहते हैं.

राज्य सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि बेदखली के नोटिस जारी किए गए थे और बाद में लगभग 750 लोग हाई कोर्ट गए. इसके बाद स्टे लग गया. बेंच ने पूछा कि राज्य ने नोटिस कब जारी किए? बेंच को बताया गया कि नोटिस 2023 में जारी किए गए थे. बेंच ने कहा, तो 2000 से आपको 23 साल लग गए यह जानने में कि आपकी जमीन पर कब्जा हो गया है.

ये है मामला: सुप्रीम कोर्ट उत्तराखंड में जंगल की जमीन के एक बड़े हिस्से पर कथित अवैध कब्जे को लेकर अनीता कंडवाल द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था.

22 दिसंबर को सीजेआई की अध्यक्षता वाली एक स्पेशल वेकेशन बेंच ने एक आदेश में कहा था, 'इस मामले के तथ्य पहली नजर में दिखाते हैं कि कैसे प्राइवेट लोगों ने सिस्टमैटिक तरीके से हजारों एकड़ जंगल की जमीन पर कब्जा कर लिया है. ऐसा लगता है कि 2866 एकड़ जमीन को सरकारी जंगल की जमीन के तौर पर नोटिफाई किया गया था. इस जमीन का एक हिस्सा कथित तौर पर ऋषिकेश की एक सोसाइटी, पशुलोक सेवा समिति को लीज पर दिया गया था. सोसाइटी का दावा है कि उसने जमीन के कुछ हिस्से अपने सदस्यों को अलॉट किए हैं.

इस पर बेंच ने उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण और जंगल की जमीन पर कब्जे का खुद संज्ञान लिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सोसाइटी और उसके सदस्यों के बीच कुछ विवाद हुआ, जिसके कारण जाहिर तौर पर एक समझौता या मिलीभगत वाला फैसला हुआ. इस बीच, सोसाइटी लिक्विडेशन में चली गई और सरेंडर डीड के जरिए उसने 23 अक्टूबर 1984 को 594 एकड़ जमीन वन विभाग को सरेंडर कर दी.

बेंच ने अपने आदेश में आगे कहा कि जमीन सरेंडर करने या जंगल की जमीन को सरकार को वापस सौंपने का वह आदेश फाइनल हो गया है. फिर भी कुछ प्राइवेट लोगों ने कथित तौर पर 2001 में जमीन पर कब्जा कर लिया.

सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, 'हमें जो बात चौंकाने वाली लगती है, वह यह है कि उत्तराखंड राज्य और उसके अधिकारी तब चुपचाप बैठे हैं, जब उनकी आंखों के सामने जंगल की जमीन पर सिस्टमैटिक तरीके से कब्जा किया जा रहा है. इसलिए हम इन कार्रवाई के दायरे को खुद बढ़ाने का प्रस्ताव करते हैं.

उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक उत्तराखंड को एक जांच समिति गठित करने का निर्देश दिया जाता है, ताकि सभी तथ्यों की जांच की जा सके और इस अदालत को एक रिपोर्ट सौंपी जा सके. इस बीच सभी प्राइवेट लोगों को जमीन को बेचने, कोई तीसरा पक्ष अधिकार बनाने से रोका जाता है. यह कहने की जरूरत नहीं है कि कोई भी निर्माण गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी. खाली जमीन (आवासीय घरों को छोड़कर) पर वन विभाग और संबंधित कलेक्टर कब्जा करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से अगली सुनवाई की तारीख पर अनुपालन रिपोर्ट मांगी.

ये भी पढ़ें: