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गंगा बेसिन पर नये प्रोजेक्ट को न मिले मंजूरी, सुप्रीम कोर्ट में बोली केंद्र सरकार, जानिये वजह

केंद्र सरकार ने कहा गंगा नदी बेसिन पर पहले ही कुछ प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं. उन पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है.

GANGA RIVER BASIN
सुप्रीम कोर्ट (फोटो सोर्स: IANS)
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By PTI

Published : May 21, 2026 at 4:38 PM IST

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Updated : May 21, 2026 at 4:55 PM IST

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नई दिल्ली: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि गंगा नदी के ऊपरी इलाकों में अब किसी भी नयी जलविद्युत परियोजना को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए. हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि अलकनंदा और भागीरथी नदी घाटियों में पहले से जारी 07 ऐसी परियोजनाओं को जारी रखा जा सकता है, बशर्ते वे पर्यावरण सुरक्षा के कड़े नियमों का पालन करें.

केंद्र ने अदालत में दायर हलफनामे में निवेदन किया है कि सात परियोजनाओं - टिहरी चरण-2 (1,000 मेगावाट), तपोवन विष्णुगढ़ (520 मेगावाट), विष्णुगढ़ पिपलकोटी (444 मेगावाट), सिग्नोली भटवारी (99 मेगावाट), फाटा ब्यंग (76 मेगावाट), मदमहेश्वर (15 मेगावाट) और कालीगंगा को अनुमति दी जानी चाहिए. भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा गंगा नदी प्रणाली पर इसके पारिस्थितिकीय, भूवैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण 'विशेष ध्यान दिए जाने' की आवश्यकता है.

हलफनामे में कहा गया है,

भारत सरकार की ओर से यह निवेदन किया जाता है कि केवल सात जलविद्युत परियोजनाओं को ही आगे बढ़ने की अनुमति दी जा सकती है, जिनमें से चार परियोजनाएं चालू हो चुकी हैं, और तीन परियोजनाओं में पर्याप्त भौतिक एवं वित्तीय प्रगति हो चुकी है.

इसमें कहा गया, 'यह अनुमति इस शर्त पर दी जानी चाहिए कि सभी लागू वैधानिक प्रावधानों और पर्यावरण सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन किया जाए तथा उत्तराखंड में गंगा नदी बेसिन के ऊपरी क्षेत्रों में कोई अन्य जलविद्युत परियोजना शुरू न की जाए.'

केंद्र सरकार की ओर से शीर्ष अदालत को बताया गया कि, नदी के स्वास्थ्य सहित पर्यावरण को होने वाला जोखिम या नुकसान, जलविद्युत के वित्तीय लाभों से कहीं अधिक है. हलफनामे में गंगा नदी बेसिन के भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ के प्रति संवेदनशील होने की बात पर जोर देते हुए कहा गया कि, अलकनंदा और भागीरथी बेसिन में गंगा की मुख्य धाराएं मौजूद हैं, और यह नदी की जैव-विविधता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.

वहीं, सरकार की ओर से कहा गया कि पहले विशेषज्ञों ने जो हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स की संख्या बढ़ाने की सिफारिशें की थीं, उनमें इस क्षेत्र में बने कई बांधों और मानवीय गतिविधियों के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का ठीक से आकलन नहीं किया गया था.

बता दें कि, यह दलीलें 2013 में केदारनाथ क्षेत्र में आई बाढ़ के बाद गंगा के ऊपरी इलाकों में जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित कार्यवाही में प्रस्तुत की गईं.

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Last Updated : May 21, 2026 at 4:55 PM IST