भाई-भतीजावाद अभिशाप: SC ने हरियाणा हाउसिंग सोसाइटी के फ्लैट आवंटन को कैंसिल किया
याचिका में दो लोगों को सुपर डीलक्स फ्लैट्स के आवंटन को चुनौती दी थी, जिसमें उन पर अपात्र होने का आरोप लगाया गया था.

Published : February 18, 2026 at 8:58 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार की एक हाउसिंग सोसाइटी द्वारा गवर्निंग बॉडी के एक सदस्य और उसके नीचे काम करने वाले कर्मचारी (Subordinate) को दिए गए दो फ्लैट का आवंटन कैंसिल कर दिया है. कोर्ट कहा कि भाई-भतीजावाद और खुद की बड़ाई करना लोकतांत्रिक सिस्टम के लिए अभिशाप है.
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने 17 फरवरी को दिए फैसले में कहा, "भाई-भतीजावाद और खुद की बड़ाई करना लोकतांत्रिक सिस्टम के लिए अभिशाप है, खासकर तब जब यह सरकारी सेवा के सदस्यों वाले समाज में हो, जो अपने सदस्यों को पारदर्शी आवंटन से घर की सुविधा दे सके."
पीठ ने कहा कि दूसरा प्रतिवादी HUDA, अर्बन एस्टेट और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एम्प्लॉइज वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन (HEWO) ऐसी ही एक सोसाइटी है जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत रजिस्टर्ड है.
पीठ ने कहा कि यह कानून साहित्य , विज्ञान, फाइन आर्ट्स को बढ़ावा देने, काम की जानकारी फैलाने, राजनीतिक शिक्षा फैलाने और परोपकारी कामों के लिए सोसाइटी बनाने का प्रावधान करता है, जैसा कि प्रस्तावना में कहा गया है.
शीर्ष अदालत ने कहा, "जाहिर है, HEWO को एक परोपकारी काम के लिए बनाया गया है, खासकर इस सिद्धांत पर कि परोपकार घर से शुरू होता है, ताकि अपने सदस्यों को घर की सुविधाएं देकर फायदा पहुंचाया जा सके. इस मामले में, हम HEWO के बनाए अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में दो सुपर डीलक्स फ्लैट के आवंटन से जुड़े हैं."
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द करने का फैसला किया, जिसमें आवंटन प्रक्रिया में दखल देने से मना कर दिया गया था.
यह कहा गया कि आवंटन सोसाइटी के नियमों और कायदों के हिसाब से हैं और जो छूट दी गई है, उसे बिना किसी छूट के बताया गया क्योंकि यह एक आम बात है, जैसा कि पहले गवर्निंग बॉडी ने तय किया था. तीसरा प्रतिवादी गवर्निंग बॉडी का सदस्य था, इसलिए पहले के फैसले से उसे वरीयता मिली, और चौथा प्रतिवादी बेसिक पे की जरूरत पूरी करता था, जो गवर्निंग बॉडी के फैसले के हिसाब से अकेली बात थी.
पीठ ने कहा कि गवर्निंग बॉडी के सदस्य और उसके सबऑर्डिनेट को किए गए आवंटन मनमाने, भेदभाव वाले थे और सोसाइटी के खुद के पात्रता मानदंडों का उल्लंघन करते थे.
कोर्ट ने कहा, "हमें तुरंत ध्यान देना चाहिए कि ऐसा पक्षपातपूर्ण आवंटन नहीं किया जा सकता, भले ही वह गवर्निंग बॉडी के सदस्य को किया जाए, जो मेंबरशिप की योग्यता शर्तों को पूरा नहीं करता है, जो तब सोसाइटी के उपनियमों का उल्लंघन होगा."
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला HUDA, अर्बन एस्टेट और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एम्प्लॉइज वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन के सदस्य दिनेश कुमार की याचिका पर आया, जिसमें दो हाई-एंड सुपर डीलक्स फ्लैट्स के आवंटन को चुनौती दी गई थी.
याचिकाकर्ता ने दो लोगों को सुपर डीलक्स फ्लैट्स के आवंटन को चुनौती दी थी, जिसमें उन पर अपात्र होने का आरोप लगाया गया था और HEWO पर पक्षपात का आरोप लगाया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "गवर्निंग बॉडी के उस सदस्य को कोई खास आवंटन नहीं दिया जा सकता था जो HUDA की सर्विस में छह महीने की प्रतिनियुक्ति की अवधि भी पूरा नहीं कर रहा था. हमें तीसरे प्रतिवादी को किए गए आवंटन को सही ठहराने का कोई कारण नहीं दिखता, जो साफ तौर पर पक्षपात और खुद की बड़ाई का दिखावा है."
पीठ ने शक्तियों और अधिकारों के घोर दुरुपयोग पर विचार करते हुए, उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया और HUDA पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, तीसरे प्रतिवादी पर 50,000 रुपये और चौथे प्रतिवादी पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया.
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