माड़-भात और सत्तू खाकर दारोगा बना बिहार का रविन्द्र, गरीबी ऐसी की भर आएंगी आंखें
बिहार के रविंद्र गरीबी को हराकर आज दारोगा बन गए. संघर्ष की कहानी ऐसी है कि बताते हुए माता-पिता रोने लगते हैं.

Published : December 21, 2025 at 6:01 PM IST
गयाजी: 'माई खाना बनाने में दिक्कत होती है, सत्तू भेज दो, वही खा कर पेट भर लेंगे.' बेटे की ऐसी बात सुनकर सुगिया देवी की ममता मचलती थी. लगता था मानो कलेजा फट जाएगा. कहती हैं कि 'बेटा जब घर में आता था तभी अच्छा खाना बनाते थे. ताकि मैं भी उसके साथ खा सकूं.' यह कहानी रविद्र और उनके परिवार की है, जिसने संघर्ष की सारे हदे पार कर दी.
सब इंस्पेक्टर बने रविंद्र: आज रविंद्र प्रजापति बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं. पहली पोस्टिंग मुंगेर जिले में हुई है. रविद्र की सफलता से माता-पिता काफी खुश हैं, लेकिन जब संघर्ष की कहानी बताते हैं तो आंसू नहीं रोक पाते हैं.

मिट्टी के घर में बीता जीवन: गया जिले के कुईबार गांव में एक चमचमाता नया मकान है, इसके ठीक बगल में एक मिट्टी और छप्पड़ का घर है. इसी घर में रविंद्र के माता-पिता ने अपने बेटे की सफलता की सीढ़ी तैयार की. आज रविंद्र के कंधे पर डबल स्टार है. यह स्टार इनके माता-पिता के संघर्ष का तोहफा है.
माता-पिता दोनों मजदूरी की: सुगिया देवी रविंद्र की मां हैं, कहती हैं कि उन्होंने बेटा को अफसर की ठान ली थी. इसके लिए उन्होंने पति बंधन प्रजापति के साथ मजदूरी की और बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं होने दी. सुगिया देवी उन दिनों को याद कर रोने लगती हैं, जब बेटे की पढ़ाई के लिए मस्जिद निर्माण में मजदूरी करना पड़ा.
"एक समय आया जब मस्जिद निर्माण में मजदूरी करना पड़ा. मेरे पति मिट्टी खोदते थे और मैं मिट्टी निकाल कर उसे बाहर फेंकती थी. इस दौरान लोग ताना भी देते थे, लेकिन अपने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं होने दी." -सुगिया देवी, रविंद्र की मां

सत्तू और माड़ भात खाकर गुजारा: रविंद्र की मां कहती है, जब गया शहर में बेटा पढ़ाई करता था, उस समय आर्थिक स्थिति और खराब थी. रविद्र कहता था कि मां पढ़ाई के दौरान खाना बनाने में परेशानी होती है. घर से सत्तू भेज दीजिए, उसी से काम चल जाएगा. रविंद्र ने मक्के की रोटी, माड़-भात और सत्तू खाकर अपनी पढ़ाई पूरी की.
माता-पिता ने भी संघर्ष किया: ऐसा नहीं है कि सिर्फ रविंद्र सत्तू खाकर गुजारा करते थे. इनके माता-पिता कहते हैं कि जब बेटा वहां रहकर संघर्ष कर रहा था तो मैं कैसे अच्छा खाना खा लेता. बेटे के आने का इंतजार रहता था. जब रविंद्र शहर से घर आता था, उस समय घर में अच्छा खाना बनता था ताकि सभी लोग एक साथ खाएंगे.
लोगों के ताने सुने: माता-पिता के दुख तकलीफ और मेहनत को रविंद्र ने नजदीक से मसहूस किया. उन्होंने भी संघर्ष में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसका रिजल्ट है कि रविंद्र पुलिस ऑफिसर बन गए. गांव के कुछ लोग ताना मारते थे कि 'गरीब का बेटा क्या ही कर लेगा, एक दिन तो मजदूरी ही करनी है.' आज वही लोग इनकी तारीफ कर रहे हैं.

माता-पिता काफी गरीब: रविंद्र हाल में बिहार पुलिस अकादमी राजगीर से ट्रेनिंग ली है. इनकी पोस्टिंग भी हो गयी है. ईटीवी भारत से बात करते हुए कहते हैं रविंद्र अपने माता-पिता की संघर्ष की कहानी बताते हैं. 'बचपन से ही माता पिता को मजदूरी करते देखते थे. जितनी जगह में घर है, उतनी जमीन है. परिवार की हालात काफी दयनीय है. गरीबी में ही माता-पिता ने पढ़ाया.
गांव में रहकर पढ़ाई: रविंद्र बताते हैं कि उन्होंने गांव में ही रहकर इंटर तक की पढ़ाई की. गयाजी से ग्रेजुएशन किया. इसके बाद बीपीएससी की तैयारी करने लगे. आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से अपना खर्च खुद उठाने का प्रयास करता था. गयाजी शहर में कोचिंग सेंटर भी खोला, लेकिन कोरोना में बंद हो गया.
"गया शहर में कोचिंग खोली थी ताकि घर में मदद कर सके. मेरी कोचिंग से पढ़ कर 22 बच्चे सरकारी सेवा में गए, जिसमें इनकम टैक्स के आफिसर भी हैं, लेकिन कोरोना काल के दौरान कोचिंग बंद हुई तो फिर चल नहीं सकी, मेरी स्थिति फिर वैसी ही हो गई थी." -रविंद्र प्रजापति, सब इंस्पेक्टर, बिहार पुलिस
डेढ़ साल रेलवे में नौकरी: कोचिंग बंद होने के बाद फिर से आर्थिक स्थिति खराब हो गयी. इसी दौरान 2022 में रेलवे ग्रुप डी की परीक्षा दी ताकि सरकारी नौकरी कर घर की आर्थिक स्थिति को सुधार सके. ग्रुप डी में नौकरी भी हो गई थी. ट्रेक मैन का काम था. डेढ़ साल गुजरात में रहकर नौकरी भी की, लेकिन कुछ बड़ा करने की तमन्ना थी.
"माता पिता पढ़े लिखे नहीं है, लेकिन उन्होंने शिक्षा के महत्व को समझा. पिता के साथ मैंने भी मजदूरी की है. गांव की कुछ बातें विचलीत कर देती हैं. मुझे लगता था कि मैं कुछ ऐसा करूं, जिससे मेरा परिवार का नाम रोशन हो. इसके बाद फिर से तैयारी करने लगे." -रविंद्र प्रजापति, सब इंस्पेक्टर, बिहार पुलिस

मां ने बढ़ाया हौसला: रविंद्र कहते हैं कि रेलवे में नौकरी होने के बाद मैंने बीपीएससी की तैयारी छोड़ दी थी, लेकिन मां ने हौसला बढ़ाया. अधिकारी बनने के लिए प्रेरित किया. पिछले साल बिहार पुलिस के एसआई पद के लिए फॉर्म भरा. पिटी और मेंस की परीक्षा तो पास कर ली थी, लेकिन फिजिकल टेस्ट के लिए वह तैयार नहीं थे. वजन काफी बढ़ गया था.
"2 महीने तक कड़ी मेहनत की. जिसके बाद फिजिकल में पास हुए. फिर रिजल्ट आया तो परीक्षा क्वालीफाई कर लिया था. इसके बाद ट्रेनिंग में भेजा गया." -रविंद्र प्रजापति, सब इंस्पेक्टर, बिहार पुलिस
गांव के पहले व्यक्ति पुलिस अफसर: रविंद्र कहते हैं कि उनका एक छोटा भाई है जो घर में रह पढ़ाई करता है और माता-पिता के काम काज हाथ बढ़ाता है. वे बताते हैं कि गांव के पहले व्यक्ति हैं, जो पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर बने हैं. इस से पहले गांव में कुछ व्यक्ति शिक्षक की नौकरी में थे. एक लड़की बिहार पुलिस में सिपाही है. घर में पढ़ाई का माहौल नहीं था. एक रिश्ते में मौसेरे भाई भरत कुमार जो शिक्षक हैं, उन्होंने मदद की और हौसला बढ़ाया.

बीपीएससी कोलिफाई करने का लक्ष्य: रविंद्र पंडित अब इतनी सफलता पर नहीं रुकना चाहते हैं. उन्हें बिहार पुलिस में डीएसपी के पद पर बहाल होना है. इसलिए वह फिर से बीपीएससी परीक्षा की तैयारी करेंगे, उनका लक्ष्य है कि वह इस परीक्षा को भी पास करें. इसके लिए उन्होंने मेहनत करनी शुरू कर दी है.
गरीबी सफलता में बाधा नहीं: रविंद्र पंडित कहते हैं कि गरीबी सफलता के लिए बाधा नहीं है, हां ये जरूर है कि आम छात्रों की तुलना में कठिनाई अधिक होगी. आप को भूखे प्यासे भी रहना पड़ सकता है. फटे पुराने कपड़े से घबराना नहीं है, बल्कि हमें उन परेशानियों का सामना करना है. खुद को इतना सशक्त बनाना है कि गरीबी पीछे रहे ना कि हमारे लक्ष्य से आगे बढ़े. जिस दिन ये लग गया कि हम गरीब हैं कैसे होगा? उस दिन सफलता का रास्ता बंद हो जाएगा.
माता-पिता ने रात में भी काम किए: रवेंद्र के पिता बंधन प्रजापति आज भी दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. वो कहते हैं कि ये संघर्ष मेरे लिए बड़ा था, क्योंकि ये मेरे बेटे के भविष्य का सवाल था. जब पैसे कम पड़ जाते थे तो हम पति पत्नी गांव में रहते हुए भी रात में भी काम करने लगते थे, ताकि बच्चों की पढ़ाई नहीं रुके.
"बड़े स्कूलों कालेज में अपने बच्चे को नहीं पढ़ाया. गांव के सरकारी स्कूल में ही पढ़ कर मैट्रिक पास हुआ. पैसे नहीं थे कि कॉलेज में नामांकन करा कर पढ़ाता, इसलिए उसे मगध विश्वविद्यालय में ही नामांकन करा दिया." -बंधन प्रजापति, रविंद्र के पिता
ताने देने वालों के मुंह पर तमाचा: बंधन प्रजापति कहते हैं कि उनके बेटे की सफलता उनके लिए मुंह पर तमाचा है जो कहते थे कि 'काहे बेटे को पढ़ा रहे हो, मजदूरी ही तो करनी है. क्यों समय खराब कर रहे हो?' तब हम कहते थे कि 'जब मजदूरी ही करनी है तो बेटा सरकारी मजदूरी करेगा. आज बेटा सरकारी अफसर बन गया.'

"बेटा जब रेलवे में ग्रुप डी में बहाल हुआ था तो लोगों का ज्याद कुछ रिएक्शन नहीं था, लेकिन जैसे ही दारोगा बना. गांव ही नहीं बल्कि दूसरे जगहों के लोग भी बधाई देने लगे." -बंधन प्रजापति, रविंद्र के पिता
3 केजी अनाज की दिहाड़ी पर कि मजदूरी: बंधन प्रजापति बताते हैं कि मजदूरी में उन्हें तीन किलो अनाज मिलता था. कच्चे मकान के लिए खपरा और मिट्टी के सामान बनाते थे, लेकिन अब गांव में पक्के मकान बनने से यह काम भी बंद हो गया है. इसके बाद पति-पत्नी दोनों दूसरे के खेतों में मजदूरी करते हैं. मजदूरी के बदले 5-6 किलो चावल मिलता है.
आज परिवार में खुशी का माहौल: आज बंधन प्रजापति के घर में खुशी का माहौल है. रविंद्र के माता-पिता दोनों खुश हैं. गांव के लोग बधाई देने के लिए आ रहे हैं. रविंद्र अब ड्यूटी ज्वाइन करने की तैयारी कर रहे हैं.
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