20 रुपये की थाली से 2.5 करोड़ का टर्नओवर, बड़ी दिलचस्प है जमींदार घर की बहू की कहानी
जब हाथों में हुनर हो और दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा, तो किसी भी बदलाव की शुरुआत मुश्किल नहीं होती. पढ़ें सक्सेस स्टोरी

Published : December 1, 2025 at 7:21 PM IST
रिपोर्ट : कृष्णनंदन
पटना : देवनी देवी की उम्र 65 साल से अधिक हो चुकी है, लेकिन जज्बा और ऊर्जा प्रभावित करने वाली है. कभी 20 रुपये की थाली से शुरुआत करते वाली देवनी देवी आज के दिनों में ढाई करोड़ का टर्नओवर कर रही हैं. हालांकि वह कहती हैं कि, अब भी मैं उसी लगन से काम करती हूं.
जमींदार घर की बहू : देवनी देवी ने जो सफलता की कहानी लिखी है इसकी शुरुआत 23 साल पहले यानी साल 2002 में हुई थी. ऐसा नहीं था कि मजबूरी के कारण देवनी देवी अपने पांव पर खड़ी हुईं, बल्कि वह तो जमींदार परिवार में पली-बढ़ी थी. इसी तरह के परिवार की बहू बनकर भी आई थी.
हाथीदह क्षेत्र के एक संभ्रांत परिवार की बहू देवनी देवी के यहां नौकर-चाकरों से घर पटा रहता था. महिलाओं का काम सिर्फ खाना बनाना होता था. जूठे बर्तन टेबल से उठाने और उसे धोने के लिए नौकर चाकर लगे होते थे. घर के बाहर जाकर काम करना तो उनके ख्याल में भी नहीं था.

ऐसे से हुई शुरुआत : साल 2002 में परिस्थितियों ने करवट बदली और देवनी देवी अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पटना आ गईं. शुरू में दिन भर खाली समय मिल जाता था क्योंकि बच्चे पढ़ाई में और पति नौकरी में व्यस्त रहते थे. इसी दौरान उन्होंने एक मेडिकल छात्र के टिफिन का हाल देखा तो दिल दहल गया.
सिर्फ 20 रुपये में मिलने वाले खाने की हालत देखकर उन्हें महसूस हुआ कि अगर वह चाहें तो इन बच्चों को घर जैसा स्वादिष्ट और पौष्टिक खाना दे सकती हैं. इसी सोच ने एक छोटे से टिफिन सर्विस की शुरुआत का बीज बो दिया. एक डॉक्टर छात्र सौरभ ने उन्हें मेस का तरीका दिखाया और वही उनका पहला ग्राहक बन गया. देखते ही देखते पीएमसीएच के तमाम छात्रों तक उनके स्वाद की पहचान पहुंच गई. प्यार और सादगी से भरे भोजन ने उन्हें सबकी 'अम्मा' बना दिया.

तानों ने किया परेशान लेकिन नहीं टूटा हौसला : देवनी देवी बताती हैं कि यह रास्ता आसान बिल्कुल नहीं था. घर-परिवार ने खूब विरोध किया. गांव में नाते रिश्तेदारों ने ताना कसते हुए कहा कि इतने बड़े खानदान की बहू होकर होटल का काम करती है. पति ने भी 6 महीने तक बात नहीं की.
''ससुर जब भी पटना आते तो मुझे किचन में गंदे कपड़ों के साथ देख दुखी हो जाते थे. कहते थै कि हमने कौन सा पाप किया जो बहू को इतना कष्ट उठाना पड़ रहा है.''- देवनी देवी, अम्मा किचन की संचालिका
'मुझे खुशी मिलती है' : देवनी देवी कहती हैं कि मैंने कभी हार नहीं मानी. मैं जानती थी कि जो कर रही हूं उसमें सम्मान है, खुद की पहचान है और सबसे बड़ी बात यह कि इससे किसी का पेट भर रहा है. मैं हमेशा मुस्कान के साथ ससुर से कहा कि खाना खिलाने से पुण्य मिलता है और यह काम करने में मुझे खुशी मिलती है.
80 हजार में 8 रिक्शे खरीदे : देवनी देवी का कहना है कि धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी. महज 20 रुपये वाली थाली से शुरू हुआ काम बढ़ता गया. पैसे जोड़कर 80 हजार रुपये जमा किए और 8 रिक्शे खरीदे. इससे आय के नए द्वार खुलते गए. इसके बाद उन्होंने सोच बढ़ाई और 2009 में पोती के नाम समृद्धि गर्ल्स हॉस्टल खोल दिया.

''वह लड़कियां जो पहले उनके टिफिन पर निर्भर रहती थीं, वही उनके हॉस्टल की पहली ग्राहक बन गईं. बिना किसी विज्ञापन और प्रचार के जो काम शुरू हुआ, वह काफी सफल हुआ. दो-दो हॉस्टल अच्छी कमाई देने लगे और परिवार की सोच भी धीरे-धीरे बदलने लगी. समय बदला था और महिलाओं के काम को सम्मान मिलने लगा था. समाज की नजर बदलते ही देवनी देवी की प्रतिष्ठा भी बढ़ने लगी.''- देवनी देवी, अम्मा किचन की संचालिका
कोरोना ने तोड़ा, लेकिन नहीं टूटा तो हौसला : देवनी देवी बताती हैं कि जब जिंदगी पटरी पर थी तभी कोरोना का कहर सब कुछ रोक दिया. लॉकडाउन में हॉस्टल पूरी तरह बंद हो गए और कारोबार लगभग खत्म हो गया, पर हिम्मत नहीं टूटी. डॉक्टरों के हॉस्टल में टिफिन सप्लाई जारी रखी. उनके खानपान की स्वच्छता और स्वाद के कारण डॉक्टर्स ने खुद उनसे विनती की 'आंटी आप काम बंद मत कीजिए'. इसी दौरान उन्हें कोरोना भी हो गया.

''वही बच्चे, जिन्हें मैंने अपना मानकर वर्षों भोजन कराया था. उन्होंने पीएमसीएच में भर्ती कराया और अच्छी तरह सेवा की. यह पल जीवन की सबसे बड़ी कमाई थी, बीमारी हारी और हिम्मत जीत गई.''- देवनी देवी, अम्मा किचन की संचालिका
2022 से अम्मा किचन : देवनी देवी के दो बेटे हैं. बड़ा बेटा जयशंकर फार्मा सेक्टर में काम करते थे और छोटा बेटा दुर्गेश सरकारी नौकरी में है. कोरोना के बाद छोटे बेटे ने सुझाव दिया कि मां अब क्लाउड किचन शुरू करो. दुनिया बदल चुकी है और खाना भी ऑनलाइन पहुंचता है. साल 2022 के जून महीने में 'अम्मा किचन' के नाम से क्लाउड किचन शुरू हुआ.

कुछ ही महीनों में यह लोगों के दिलों का स्वाद बन गया. स्वादिष्ट भोजन ऑनलाइन डिलीवरी पार्टनर के जरिए पूरे पटना में पहुंचने लगा. धीरे-धीरे दो आउटलेट भी खुल गए, जहां लोग बैठकर भी खाना खाते हैं. सादी थाली से लेकर स्पेशल थाली तक की रेंज 100 रुपये से 300 रुपये तक है. आज यही 'अम्मा किचन' सालाना 2.5 करोड़ का टर्नओवर कर रहा है.
''कोई काम छोटा नहीं होता. मन साफ हो और इरादा मजबूत तो दुनिया की कोई बाधा आपको आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती.''- देवनी देवी, अम्मा किचन की संचालिका
बड़ा बेटा अब काम में है साथ : देवनी के बड़े बेटे जयशंकर ने अब अपनी नौकरी छोड़कर व्यवसाय संभालने की जिम्मेदारी ले ली है. जयशंकर बताते हैं कि शुरू में अपनी मां के काम का परिवार के साथ वह भी विरोध किए थे, लेकिन आज पूरी तरीके से मां के स्टार्टअप के साथ खड़े हैं.
''अम्मा किचन ने आज 30 से अधिक लोगों को रोजगार दिया है. स्टाफ का न्यूनतम वेतन 15000 रुपये है. ऑनलाइन सेल का ही टर्नओवर 2.5 करोड़ हो जाता है. दो आउटलेट पर एक साथ 15 से 20 लोगों के भोजन की व्यवस्था है. जहां लोग सुबह, दोपहर और शाम खाना खाने आते हैं.''- जयशंकर, देवनी देवी के बड़े बेटे

बेटे को है अपनी मां पर गर्व : जयशंकर कहते हैं कि उन्हें अपनी मां पर गर्व है, क्योंकि जिस घर की बहू अपने जीवन में कभी घर का काम तक उठाकर नहीं किया था. वही आज दर्जनों परिवारों का सहारा बन चुकी है. इतना ही नहीं कई महिलाएं उनसे प्रेरणा लेने आती हैं और आत्मनिर्भरता का पाठ सीखती हैं.
''मेरी मां महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं हैं. आज मेरी पत्नी भी किचन में मां की मदद करने दोनों आउटलेट पर पहुंच जाती हैं. जैसा समय मिलता है उतना अपना योगदान देती हैं.''- जयशंकर, देवनी देवी के बड़े बेटे

'घर जैसा मिलता है खाना' : अम्मा किचन में खाना खा रहे उत्तर प्रदेश के निलेश पांडे कहते हैं कि उन्हें यहां बिल्कुल घर जैसा स्वाद मिला. ना ज्यादा तेल, ना मसाले का अति प्रयोग. सात दिनों से लगातार वह डेढ़ किलोमीटर चलकर यहां खाना खाने आ रहे हैं क्योंकि उन्हें सिर्फ स्वाद नहीं बल्कि घर जैसा अहसास मिलता है. जैसा नाम है अम्मा और वैसा ही अपनापन हर निबाले में महसूस होता है.
''यहां आने पर कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि घर से दूर होटल में खाना खा रहे हैं. बहुत अच्छा लगता है.''- निलेश पांडे, अम्मा किचन में खाने पहुंचे ग्राहक

छोटी सी हिम्मत और सफलता की कहानी : कुल मिलाकर कहें तो देवनी देवी आज सिर्फ अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा हैं. क्योंकि आत्मनिर्भरता किसी बड़े सपने की देन नहीं होती. यह उसी छोटी-सी हिम्मत की कहानी है जो सफलता तय कर देती है.
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