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उत्तराखंड नंदादेवी राजजात यात्रा से पहले केयरिंग कैपेसिटी का होगा अध्ययन, वैज्ञानिकों ने जताई ये चिंता

उत्तराखंड की नंदा राजजात यात्रा अपने प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को समेटे हुई है. ये पवित्र यात्रा 12 साल में आयोजित होती है.

Nanda Devi Raj Yatra
सबसे कठिन नंदा राजजात यात्रा (Photo-Uttarakhand Information Department)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : January 15, 2026 at 1:43 PM IST

7 Min Read
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नवीन उनियाल

देहरादून (उत्तराखंड): मां नंदादेवी राजजात यात्रा के लिए इस बार कई पहलुओं पर रूपरेखा तैयार की जा रही है. अधिकारी ना केवल यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या और पुराने अनुभवों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करने जा रहे हैं, बल्कि यात्रा के पर्यावरणीय पहलुओं पर उठे सवालों और प्राकृतिक आपदा की आशंकाओं पर भी खाका तैयार हो रहा है. वहीं इस यात्रा में श्रद्धालु 19 दिन तक कठिन बुग्यालों को पार करते हैं, ये यात्रा करीब 280 किलोमीटर पैदल है.

कठिन धार्मिक नंदा राजजात यात्रा: एशिया की सबसे कठिनतम धार्मिक यात्रा में से एक मां नंदा देवी राजजात यात्रा की तैयारी शुरू हो गई है. एक तरफ यात्रा के लिए श्रद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए विभिन्न आधारभूत संरचनाओं के निर्माण पर काम होने जा रहा है तो वहीं सुरक्षा के मद्देनजर भी विशेष एहतियात बरतने के प्रयास है.

कठिन धार्मिक नंदा राजजात यात्रा: दरअसल मां नंदादेवी राजजात यात्रा का जितना अधिक महत्व है, उतना ही ज्यादा इस यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में आकर्षण भी है, लेकिन इस सब के बीच वैज्ञानिकों की भी कुछ ऐसी चिंताएं हैं, जो इस यात्रा के लिए एक अलग तरह की चुनौतियों को दर्शाती है. खासतौर पर पर्यावरणीय और प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी यह आशंकाएं किसी भी लिहाज से नजरअंदाज करने वाली नहीं हैं.

नंदादेवी राजजात यात्रा से पहले केयरिंग कैपेसिटी का होगा अध्ययन (Video-ETV Bharat)

केयरिंग कैपेसिटी अध्ययन: मां नंदादेवी राजजात यात्रा में कई बार शामिल हो चुके, और इस यात्रा को लेकर बारीकी से अध्ययन करने वाले उत्तराखंड अंतरिक्ष विज्ञान केंद्र के पूर्व निदेशक और भूवैज्ञानिक एमपीएस बिष्ट बताते हैं कि वो इस कठिनतम यात्रा का 1987 और इसके बाद कई बार हिस्सा रह चुके हैं. इस दौरान उन्होंने इस पर विस्तृत रूप से अध्ययन भी किया है. प्रो. एमपीएस बिष्ट कहते हैं कि उन्हें हिमालय की संवेदनशीलता, इसके इकोसिस्टम और भूगर्भीय क्षमताओं को लेकर हमेशा ही चिंता रही है.

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उत्तराखंड नंदादेवी राजजात यात्रा (Photo-Uttarakhand Information Department)

परिस्थितियों को लेकर चिंता: यहां जिस तरह से बुग्याल क्षेत्र में मिट्टी की गुणवत्ता तेजी से घट रही है वह इस क्षेत्र के लिए एक बड़ी परेशानी बना है. इस बीच यहां एक बार फिर हजारों, लाखों श्रद्धालुओं का जाना बुग्यालों की सेहत के लिए अच्छा नहीं है. ऐसे में जरूरत है कि यात्रा की तैयारी के दौरान इन पहलुओं पर भी बारीकी से विचार करते हुए काम होना चाहिए. उनकी दूसरी बड़ी चिंता यहां की परिस्थितियों को लेकर है.

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12 साल में होती है नंदादेवी राजजात यात्रा (Photo-Uttarakhand Information Department)

9वीं सदी में इस क्षेत्र में एक बड़ी प्राकृतिक आपदा आई थी, जिसमें करीब 600 लोग मारे गए थे. यह प्राकृतिक आपदा जूरा गली और रूप कुंड के पास आई थी. लिहाजा हाई एल्टीट्यूड वाले इस क्षेत्र में इन सभी संभावनाओं को देखते हुए तैयारियां किया जाना बेहद जरूरी है.
प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट, भूवैज्ञानिक

वैज्ञानिकों की चिंता को समझ रही सरकार: वैज्ञानिकों द्वारा जताई जा रही चिंता को शायद सरकार भी समझ रही है और इसलिए शासन स्तर पर चमोली जिले के जिलाधिकारी गौरव कुमार और एसपी को इसके मद्देनजर भी निर्देश जारी किए गए हैं. दरअसल इस बार मां नंदादेवी राजजात यात्रा से पहले यात्रा क्षेत्र की केयरिंग कैपेसिटी को जानने का प्रयास हो रहा है. दिए गए निर्देश के बाद इसके लिए जिला प्रशासन एक रिपोर्ट भी तैयार कर रहा है जिसमें यात्रा में शामिल होने वाली अधिकतम श्रद्धालुओं की संख्या को जानने की कोशिश की जाएगी.

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नंदादेवी राजजात यात्रा में बड़ी तादाद में शामिल होते हैं श्रद्धालु (Photo-Uttarakhand Information Department)

पर्यावरणीय स्थितियां और प्राकृतिक आपदा को लेकर तैयारियां: यही नहीं पूर्व के आयोजनों के दौरान आने वाली दिक्कतों का भी रिकॉर्ड इसमें शामिल किया जाएगा. इसके जरिए यह भी साफ होगा की यात्रा में किस तरह से श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी है, इसमें पर्यावरणीय स्थितियां और प्राकृतिक आपदा की संभावनाओं को लेकर होने वाली तैयारी का भी खाका तैयार किया जाएगा. खास बात यह है कि इसी रिपोर्ट के आधार पर यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या को निर्धारित किया जाएगा.

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नंदा देवी राजजात यात्रा रूट मैप (ETV Bharat Graphics)

इसमें महत्वपूर्ण यह है कि यह यात्रा इसी साल होनी है और जनवरी में ही यात्रा की तारीख भी तय की जाएगी. जाहिर है कि यह यात्रा बरसात के मौसम के दौरान होगी ऐसे में जरूरी तैयारियां को पहले ही पूरा करने के प्रयास किया जा रहे हैं.
धीराज गर्ब्याल, पर्यटन सचिव उत्तराखंड

महत्वपूर्ण कार्यों को प्राथमिकता: फिलहाल शासन ने जिलाधिकारी को प्राथमिकता के आधार पर 20 करोड़ रुपए की राशि दे दी है ताकि महत्वपूर्ण कामों को प्राथमिकता के आधार पर पहले ही करा लिया जाए. इस दौरान तमाम गांव और बस्तियों से आगे वन क्षेत्र में वन महकमे द्वारा जरूरी पुलिया और रास्तों के काम प्राथमिकता के आधार पर करने के भी निर्देश दिए गए हैं. इतना ही नहीं इसके लिए लोक निर्माण विभाग, पीएमजीएसवाई, शहरी विकास के साथ ही स्वच्छता को लेकर काम करने वाले दूसरे विभागों को भी वृहद रूपरेखा तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं.

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राजजात यात्रा का वापसी का रूट मैप (ETV Bharat Graphics)

कैटेगरी में बांटे गए राजजात यात्रा के कार्य: यात्रा क्षेत्र में लोक निर्माण विभाग के तीन कामों के लिए 80 करोड़ स्वीकृत किए गए हैं, जबकि सभी विभागों के मिलाकर अब तक 332 करोड़ के प्रस्ताव शासन को मिल चुके हैं. खास बात यह है की मां नंदा देवी राजजात यात्रा के लिए विभिन्न कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर A,B,C कैटेगरी में बांटा गया है.

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नंदा देवी राजजात यात्रा की विशेषताएं (ETV Bharat Graphics)

राजजात यात्रा का धार्मिक महत्व: उत्तराखंड की भव्य कठिन धार्मिक यात्रा प्रत्येक 12 साल में होती है, कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाली इस यात्रा का श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रहा है. मां नंदा को भगवान शिव की पत्नी माना जाता है, और यह यात्रा मां नंदा को उनके ससुराल भेजने की यात्रा के रूप में पहचानी जाती है. माना जाता है कि एक बार मां नंदा अपने मायके आई थी और वह किसी विशेष परिस्थिति के कारण 12 साल तक अपने ससुराल नहीं जा सकी. इसके बाद उन्हें रीति रिवाज के साथ ससुराल भेजा गया.

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नंदा देवी राजजात यात्रा के गुजरने के पड़ाव (ETV Bharat Graphics)

एशिया की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा: चमोली जिले में पट्टी चांदपुर और श्रीगुरु क्षेत्र को मां नंदा के मायके जबकि बधाण क्षेत्र को उनका ससुराल के रूप में जाना जाता है. यह यात्रा नॉटी गांव से उच्च हिमालय क्षेत्र होमकुंड तक जाती है. खास बात यह है कि यह यात्रा करीब 280 किलोमीटर की है जो कि एशिया में सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा के रूप में जानी जाती है. इसमें शामिल होने वाले श्रद्धालु 20 दिन में 20 पड़ाव से होकर गुजरते हैं.

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नंदा देवी राजजात यात्रा के गुजरने के पड़ाव (ETV Bharat Graphics)

चौसिंगिया खाड़ू आकर्षण का केंद्र: यात्रा में आकर्षण का केंद्र काले रंग की भेड़ होती है, जिसे चौसिंगिया खाड़ू कहा जाता है. यही भेड़ राजजात यात्रा की अगुवाई करती है. यात्रा को नौटी में पूजा अर्चना के साथ शुरू किया जाता है और खाड़ू की पीठ पर पोटली जिसे स्थानीय भाषा में इसे फंची कहा जाता है, बांधी जाती है. इस फंची में मां नंदा के श्रृंगार की सामग्री और श्रद्धालुओं की भेंट होती है. यात्रा के अंतिम क्षेत्र होमकुंड में खांडू को आगे हिमालय के लिए रवाना कर दिया जाता है.

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