कोच मंजू ढांडा ने हिसार के डाया गांव को बनाया कबड्डी का गढ़, 80 से ज्यादा बेटियां कर रही प्रैक्टिस, जीत चुकी हैं कई मेडल
Story of Kabaddi Coach Manju Dhanda: कबड्डी कोच मंजू ढांडा ने गांव की बेटियों को कबड्डी के मैदान पर चमकने का मौका दिया है.

Published : February 28, 2026 at 4:41 PM IST
|Updated : February 28, 2026 at 5:06 PM IST
प्रवीण कुमार की रिपोर्ट
हिसार: हरियाणा की धरती ने खेल की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है. यहां के खिलाड़ियों के संघर्ष से सफलता तक की कहानी तो आपने खूब सुनी होगी, लेकिन आज हम आपको कबड्डी कोच मंजू ढांडा के जज्बे, हिम्मत और संघर्ष की कहानी सुनाएंगे. एक ऐसी महिला कोच, जिसने ना सिर्फ खुद को, बल्कि पूरे गांव की बेटियों को कबड्डी के मैदान पर चमकने का मौका दिया. मंजू की सक्सेस स्टोरी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं. उन्होंने साबित कर दिखाया है कि अगर इरादा पक्का हो तो कोई भी चुनौती छोटी पड़ जाती है.
कबड्डी कोच मंजू ढांडा के संघर्ष की कहानी: हिसार के मिर्चपुर गांव निवासी मंजू ढांडा NIS (नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान (NSNIS) पटियाला से डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स पास आउट उम्मीदवारों को स्पोर्ट्स कोचिंग, शारीरिक शिक्षा और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के तहत विभिन्न नौकरियों के लिए योग्य माना जाता है.) पासआउट हैं. अपने वक्त में अच्छी कबड्डी खिलाड़ी रहीं, लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद उनकी शादी कम उम्र में ही हिसार के डाया गांव में हो गई. घर की जिम्मेदारियां उनके सपनों पर हावी हो गई. जिसके चलते उनका सपना अधूरा रह गया, लेकिन कुछ कर गुजरने की तमन्ना मंजू के अंदर अभी भी थी.
मंजू ने ठाना- बेटियों को कबड्डी सिखाना: महिला होने के नाते मंजू ने ठाना कि गांव की बच्चियां खेल के क्षेत्र में आगे बढ़े, उन्होंने देखा कि गांव में कबड्डी की कोई नर्सरी नहीं है. बच्चे खेलना चाहते हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन और ट्रेनिंग की कमी से उनकी रुचि खत्म हो रही है. खासकर लड़कियों के लिए तो स्थिति और भी मुश्किल है. समाज की सोच, संसाधनों की कमी और मैदान तक पहुंच का अभाव. मंजू ने सोचा "अगर कोई शुरुआत नहीं करेगा, तो बदलाव कैसे आएगा?" बस यहीं से शुरू हुई उनकी जंग.

चुनौतियों से बड़ी थी मंजू की हिम्मत: कबड्डी कोच मंजू ढांडा ने फैसला किया कि वो खुद कोच बनेंगी और गांव की बेटियों को कबड्डी सिखाएंगी. शुरुआत में चुनौतियां बहुत थीं. मैदान नहीं, सामान नहीं और सबसे बड़ी बात, लोगों का भरोसा जीतना, लेकिन मंजू ने हार नहीं मानी. उन्होंने घर-घर जाकर माता-पिता से बात की, गांव वालों को समझाया कि बेटियां भी खेल सकती हैं, नाम रोशन कर सकती हैं. धीरे-धीरे ग्रामीणों ने उनका साथ दिया. कुछ ने रुपयों से मदद की, कुछ ने बच्चियों को भेजना शुरू किया.

दो साल पहले कबड्डी नर्सरी स्थापित: मंजू की इस जिद को देखते हुए ग्रामीणों ने सरकार से खेल नर्सरी की मांग की. जिसके बाद ग्रामीणों ने खेल विभाग को पंचायती जमीन सौंपी. इसके बाद खेल विभाग ने डाया गांव में कबड्डी नर्सरी स्थापित की. दो साल पहले मंजू ढांडा ने बच्चियों को प्रैक्सिट करना शुरू किया था. आज उनकी कोचिंग में 80 से ज्यादा लड़कियां नियमित प्रैक्टिस करती हैं. इनमें कुछ लड़के भी शामिल हैं, लेकिन लड़कियों की संख्या ज्यादा है. ये संख्या छोटी नहीं है. ये एक क्रांति है. एक बदलाव है, जो आने वाले समय में सोने की तरह चमकेगी.

80 से ज्यादा बेटियां करती हैं प्रैक्टिस: मंजू की कोचिंग में 15 से ज्यादा खिलाड़ियां स्टेट लेवल पर खेल चुकी हैं और 30 से ज्यादा डिस्ट्रिक्ट लेवल पर अपनी ताकत दिखा चुकी हैं. 20 खिलाड़ियों ने जिला स्तर पर मेडल जीते हैं, जबकि 12 खिलाड़ियों ने राज्य स्तर पर पदक जीते हैं. बेटियों ने जब जीतना शुरू किया, तो अभिभावकों ने भी समाज के बंधन को तोड़ा और बेटियों को कबड्डी के लिए भेजना शुरू किया. हर बार जब कोई बच्ची मैदान पर उतरती है, तो वो सिर्फ कबड्डी नहीं खेलती. वो मंजू मैम की मेहनत, हिम्मत और विश्वास को जीतती है.

ग्रामीण सत्र की होती है प्रतियोगिता: डाया कबड्डी सेंटर में गांव की बेटियां जमकर कबड्डी की प्रेक्सिटस करती हैं. दौड़ लगाती हैं और कसरत करती हैं. अब तो ग्रामीण सत्र पर कबड्डी प्रतियोगिता भी करवाई जा रही है. जिसमें हिस्सा लेकर बेटियों का खेल निखर रहा है, क्योंकि प्रतियोगिता में खिलाड़ियों को मेडल दिए जाते हैं, पुरस्कार दिए जाते हैं. उन्हें सम्मानित किया जाता है. जिससे बेटियों का हौसला बढ़ता है.

कबड्डी कोच मंजू ढांडा बोली- 'बेटियां करेंगी मेरा सपना पूरा': ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान मंजू ने बताया कि "मैं ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी लेवल तक कबड्डी का गेम खेली हूं. मेरा सपना अधूरा रह गया. अब यही सोचती हूं कि मेरा सपना ये बच्चियां पूरी करेंगी. यहां ये बेटियां 4 से 5 घंटे रोजाना प्रैक्टिस करती हैं. इनको रनिंग कराई जाती है, एक्सरसाइज कराई जाती है. इसके बाद कबड्डी की स्किल्स और टेक्निक सिखाई जाती है. बच्ची दो घंटे सुबह और तीन घंटे शाम को प्रेक्टिस करती हैं. हरियाणा सरकार ने खेल नर्सरी की जो शुरुआत की है. उससे लड़कियां खेल के क्षेत्र में आगे आ रही हैं. गांव का सरपंच और लोग भी भरपूर सहयोग देते हैं. 8 साल से 19 साल तक की लड़कियां मेरे पास प्रेक्टिस करती हैं"

कबड्डी प्लेयरों ने जानें क्या कहा: नेहा नाम की कबड्डी प्लेयर ने बताया "मैं बीते दो साल से मैदान पर प्रैक्टिस कर रही हूं. दो घंटे सुबह और तीन घंटे शाम को प्रैक्टिस करती हूं. माता-पिता भी भरपूर सहयोग करते हैं."
- कबड्डी प्लेयर दीक्षा ने बताया "मैं ओलंपिक लेवल तक के स्तर पर खेलना चाहती हूं और कबड्डी में अपना और मां-बाप का सपना पूरा करना चाहती हूं."
- कबड्डी प्लेयर सुहाना ने बताया "मैंने दो या तीन महीने पहले ही कबड्डी खेलना शुरू किया है. मंजू मैम बहुत अच्छी प्रैक्टिस करवाती है. हम दो घंटे सुबह और तीन घंटे शाम को प्रैक्टिस करते हैं. इसके अलावा मैम हमसे एक्सरसाज कराती हैं और स्किल सिखाती हैं"
- मानवी नाम की कबड्डी प्लेयर ने बताया "मैं यहां डेढ़ साल से प्रैक्टिस कर रही हूं. मैंने अपने करियर के बारे में बहुत कुछ सोचा है. मैं बहुत आगे तक खेलना चाहती हूं. मैं अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी के तौर पर अपनी पहचान बनाना चाहती हूं. मेरे माता-पिता भी मुझे पूरा स्पोर्ट करते हैं."
- कबड्डी प्लेयर निशा ने बताया कि "मैं अच्छा खेल कर बहुत ऊपर तक जाना चाहती हूं और अपनी मम्मी-पापा का सपना पूरा करना चाहती हूं."
सरपंच मुकेश ने सरकार से की सहायता की अपील: हिसार के डाया गांव के सरपंच मुकेश बलोदा ने ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान कहा कि "गांव की खेल नर्सरी में गांव के खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं. अभिभावक भी प्रोत्साहन कर रहे हैं. सरकार से खेल के लिए सहयोग नहीं मिल रहा, बच्चों की डाइट नहीं मिल रही. खेल विभाग से खिलाड़ियों के लिए कोई सहयोग राशि खाते में नहीं आई है. बच्चों की ड़ाइट के लिए सरकार को खाते में उनका मानदेय देना चाहिए. इस साल एक बार ही रुपये खाते में आए थे. उसके बाद बच्चों के खाते में रुपये नहीं आए हैं. पंचायत द्वारा एक और ग्राउंड तैयार किया जा रहा है, लेकिन सरकार ने रुपये नहीं दिए है. जिसकी वजह से काम अधर में लटका है. इसको लेकर हमने कैबिनेट मंत्री रणबीर गंगवा से मांग की थी."

दूसरों के लिए मिसाल बनी कबड्डी कोच मंजू: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मंजू ढांडा की ये कहानी बताती है कि महिलाएं जब आगे आती हैं, तो सिर्फ खुद नहीं, पूरे समाज को बदल देती हैं. वो ना सिर्फ कोच हैं, बल्कि एक प्रेरणा हैं. एक मां, बहन, बेटी के लिए रोल मॉडल. मंजू की स्टोरी हमें याद दिलाती है "तुममें वो ताकत है, जो दुनिया बदल सकती है. बस एक कदम उठाओ, बाकी रास्ता खुद बन जाएगा." मंजू ढांडा जैसी महिलाएं साबित करती हैं. हरियाणा की बेटियां सिर्फ खेल नहीं, इतिहास रच रही हैं. बता दें कि डाया गांव हिसार शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर पड़ता है. ये मंजू की मेहनत और लगन है कि इस गांव को आज कबड्डी वाले गांव के नाम से जाना जाने लगा है. ये अपने आप में बहुत बड़ी बात है.
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