जब मछेरिन को देख बेताब हुए इंस्पेक्टर साहब..तब पटना की 140 साल पुरानी 'ट्राम' बन गई इतिहास
राजधानी में जहां आज चमचमाती गाड़ियां और ट्रेनें दौड़ती हैं, वहीं एक जमाने में ट्राम दौड़ती थीं. पटना से रंजीत कुमार की रिपोर्ट..

Published : July 8, 2026 at 7:20 PM IST
पटना: पुरानी हिंदी फिल्मों में अपने 'ट्राम' जरूर देखे होंगे. इस ट्राम की कहानी बहुत की दिलचस्प है. गौरवशाली इतिहास और बुद्ध-महावीर की विरासत वाले बिहार की भी एक पहचान यहां की ऐतिहासिक 'ट्राम' भी थी, जो अब इतिहास बन चुकी है. हाल ही में पश्चिम बंगाल की शुभेंदु सरकार की पहल के बाद, बिहार में भी इस पर्यावरण अनुकूल सवारी को फिर से शुरू करने की मांग तेज हो गई है. पहले भारत के किन शहरों में ट्राम चलती थी? ट्राम कैसी थी? इसके बंद होने के पीछे की कहानी क्या है और राजधानी में इसके चलने की कितनी संभावना है? विस्तार से जानें..
पटना में 'ट्राम' का इतिहास: क्या आपको पता है कि आज से करीब 140 साल पहले बिहार की राजधानी पटना की सड़कों पर भी ट्राम चला करती थी? वह भी बिजली से नहीं, बल्कि घोड़ों से खींचने वाली ट्राम सड़कों पर सरपट दौड़ती थी. आज भले ही यह इतिहास के पन्नों में सिमट गई हो, लेकिन एक समय यह पटना के आधुनिक परिवहन और शहरी विकास का प्रतीक मानी जाती थी. स्थानीय लोग पटना सिटी से गांधी मैदान तक की सवारी ट्राम के जरिए क्या करते थे.
वर्ष 1886 में शुरुआत : पुस्तक 'पटना: भूले हुए किस्से' के लेखक अरुण सिंह बताते हैं कि वर्ष 1886 में ब्रिटिश व्यवसायी विलियम लॉयड ने पटना में घोड़ा-चालित ट्राम सेवा शुरू की थी. ट्राम का मार्ग पटना सिटी के चौक से बांकीपुर के पीरबहोर (वर्तमान गांधी मैदान क्षेत्र) तक चलता था. उस दौर में यह शहर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने वाला आधुनिक यातायात सशक्त माध्यम माना जाता था.
संभ्रान्त परिवारों ने भी किया था निवेश: ट्राम परियोजना को केवल अंग्रेजों का उपक्रम नहीं था. उस समय के प्रसिद्ध समाजसेवी और शिक्षाविद काजी सैयद रजा हुसैन सरीखे शक्स ने आधुनिकता और व्यापारिक विकास का माध्यम मानते हुए इसमें निवेश किया था. रजा हुसेन ने अन्य लोगों को भी शेयर खरीदने के लिए प्रेरित किया था.कई स्थानीय व्यवसायी, जमींदार और आम नागरिक भी इस परियोजना में निवेश किया था.

एक आना निर्धारित किराया: ट्राम के लिए रेलवे स्टेशन से लेकर गांधी मैदान के पास सब्जीबाग तक गंगा के किनारे पटरियां बिछाई गई थीं. प्रथम श्रेणी और द्वितीय श्रेणी के यात्रियों के लिए अलग किराया निर्धारित किया गया था. सामान्य क्लास के लिए पटना से बांकीपुर तक का किराया एक आना चुकाना पड़ता था.
38 हजार रुपये की कमाई: शुरुआती छह महीनों में ट्राम को अच्छी सफलता मिली और कंपनी को ठीक ठाक मुनाफा भी हुआ. 1890 के दशक के मध्य तक ट्राम से लगभग 38 हजार रुपये की कमाई दर्ज की गयी थी.
तीसरा प्रमुख ट्राम शहर: बता दें कि "भारत में ट्राम सेवा की शुरुआत 24 फरवरी 1873 को कलकत्ता से हुई थी, जबकि बिहार की राजधानी पटना में 1886 में घोड़ा-चालित ट्राम का संचालन शुरू हुआ था. पटना भारत का तीसरा प्रमुख शहर था, जहां ट्राम सेवा शुरू हुई. पटना में घोड़ा-चालित ट्राम 1886 में पटना सिटी (चौक) से बांकीपुर के बीच चलाई गई थी.
1903 में ट्राम सेवा बंद: ट्राम के संचालक विलियम लॉयड हुआ करते थे. घोड़ों से खींचे जाने वाली ट्राम को पटना में लांच किया गया था.पटना सिटी चौक से पीरबहोर (गांधी मैदान क्षेत्र) तक चलता था. कई कारणों से 1903 में ट्राम सेवा बन्द हो गयी. बताया जाता है कि धीमी गति, खराब प्रबंधन, दुर्घटनाएं और घटती सवारियों के वजह से परिचालन बंद कर दी गई.

'अल-पंच' की पैनी नजर और आलोचना: उस दौर के प्रमुख अखबार 'अल-पंच' ने ट्राम व्यवस्था के कुप्रबंधन को चुटीले अंदाज में उजागर किया था. अखबार के एक संवाददाता ने पटना सिटी चौक से पीरबहोर तक का सफर करके जो आंखों देखा हाल था उसे लिखा था. उनकी रिपोर्ट ट्राम के गिरते स्तर की पोल खोलता था. रिपोर्टर के अनुसार, ट्राम सुचारू रूप से चलने के बजाय हर थोड़ी दूरी पर रुकते-रुकाते घिसटती हुई आगे बढ़ती थी, जिससे आम यात्री बेहद परेशान होते थे.
इंस्पेक्टर की मछली शौक और रेंगती ट्राम: अल पंच के एक लेख में लिखा गया था कि गुलजारबाग के पास एक मछेरिन को देखकर ट्राम में सवार इंस्पेक्टर साहब (अंग्रेज) इस कदर बेताब हुए कि उन्होंने तुरंत गाड़ी रोकने का शाही फरमान सुना दिया. वहां आम सवारियों के समय की कीमत को ताक पर रखकर सरेराह मछली का मोल-तोल शुरू हो गया. सौदा न होने पर गाड़ी बमुश्किल दस कदम आगे बढ़ी ही थी कि दोबारा हुक्म देकर ट्राम रुकवाई गई. इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये के बाद आखिरकार मछली खरीदी गई और ट्राम रेंगने लगी.
दिखावे की चमक और कड़वा सच: लेखक ने तीखा सवाल उठाया कि जब घोड़े नए, तगड़े थे, गाड़ी सुंदर सजी थी और कर्मचारी तैनात थे, तो यात्रियों के समय के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों हो रहा था. शुरुआती छह महीनों में बंपर मुनाफा कमाने और हमेशा खचाखच भरे रहने के बावजूद कंपनी ने यात्रियों की बुनियादी सहूलियतें भुला दी थीं. समय की भारी अनियंत्रितता, जगह-जगह बेवजह रोकना और कुप्रबंधन ही इस ऐतिहासिक सेवा के पतन की मुख्य वजह बन रहे थे.

ट्राम बंद होने के कारण: 1886 में पटना सिटी से पीरबहोर तक शुरू हुई घोड़ा-चालित ट्राम सेवा का 'अल-पंच' अखबार ने कुप्रबंधन और बार-बार रुकने की आदतों के कारण आलोचना की थी. रिपोर्ट के अनुसार, इंस्पेक्टरों द्वारा व्यक्तिगत कार्यों के लिए ट्राम रोकने की घटनाओं से यात्रियों को परेशानी होती थी, जो अंततः 1903 में सेवा बंद होने के कारणों में से एक बनी.
यह परिवहन साधन बहुत धीमा, अविश्वसनीय और बेहद बुरे ढंग से चलता था. पटना की ट्रामगाड़ियां जर्जर हालत में थीं और उनमें हमेशा भारी भीड़ भरी रहती थी. सिंगल ट्रैक होने के कारण अक्सर यह अपनी पटरी से उतर भी जाती थी. कई बार तो इसे पटरी के किनारे खड़े होकर अपनी बारी का लंबा इंतज़ार भी करना पड़ता था, क्योंकि सुचारू परिचालन के लिए तब केवल एक ही पटरी उपलब्ध थी.
उस दौर में सड़क पर कोई फुटपाथ न होने से हर वर्ष कई गंभीर दुर्घटनाएं हो रही थीं और कई मासूम जानें भी जा चुकी थीं. भयंकर कुप्रबंधन और भारी घाटे के साथ-साथ बाजार में नए और बेहतर इक्के आ गए थे. इस कारण ट्राम की विदाई तय हो गई और यह बंद हो गया. देश के दूसरे बड़े शहरों में इलेक्ट्रिक ट्राम चल रही थी, यहां भी ऐसा सोचा गया पर बात आगे नहीं बढ़ी.
देश के किन शहरों में चलती थी ट्राम: इतिहासकारों की मानें तो भारत में ट्राम की शुरुआत 19वीं सदी के अंत में हुई थी. पटना के अलावा देश के कई अन्य प्रमुख शहरों में भी नियमित रूप से ट्राम चला करती थी. यह ट्राम सड़कों पर विशेष पटरियां बिछाकर उनपर ही चलती थी. जिन शहरों में इसकी शुरुआत हुई थी उनमें कोलकाता (1873), मुंबई (1874), नासिक (1889) और चेन्नई (1895) शामिल थे.

अन्य शहर और बंदी का दौर: प्रमुख शहरों की सूची में कानपुर और दिल्ली भी शामिल थे, जहां ट्राम सेवा चलती थी. इसके बाद वर्ष 1933 से लेकर 1964 तक का वह दौर आया, जिसमें कोलकाता के अलावा देश के बाकी सभी शहरों में धीरे-धीरे ट्राम का संचालन पूरी तरह बंद कर दिया गया. इसके बंद होने के बाद केवल कोलकाता ही एकमात्र ऐसा शहर बचा जहा यह ऐतिहासिक परिवहन सेवा चलती रही.
पुनर्जीवित करने की नई पहल: शुभेन्दु सरकार ने कोलकाता की ऐतिहासिक ट्राम सेवा को पूरी तरह बंद करने के बजाय पुनर्जीवित (Revive) और आधुनिक बनाने की पहल की है. हालिया घोषणाओं के अनुसार, सरकार आधुनिक, हल्के और ऊर्जा-कुशल ट्राम को यूरोपीय और ऑस्ट्रेलियाई मॉडल की तर्ज पर लाने की संभावना तलाश रही है.
विरासत और परिवहन का संगम: साथ ही बंद या सीमित किए गए ट्राम मार्गों को फिर से शुरू करने की व्यवहार्यता का अध्ययन कराने की भी बात कही गई है.यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पिछली सरकार के दौर में अधिकांश ट्राम मार्ग बंद कर दिए गए थे और केवल सीमित हेरिटेज सेवा बची थी. शुभेंदु अधिकारी सरकार की घोषित नीति "ट्राम को विरासत के साथ-साथ आधुनिक सार्वजनिक परिवहन के रूप में पुनर्जीवित करने" की है, न कि उसे पूरी तरह समाप्त करने की.
कोलकाता की आधुनिक हेरिटेज सेवा: आज देश के एकमात्र शहर कोलकाता में ट्राम चलती है, जिसे यहां धरोहर के रूप में चलाया जाता है. कोलकाता में आज अत्याधुनिक एसी कोच वाली इलेक्ट्रिक ट्राम चलायी जाती है. लेकिन जिस समय इसकी शुरुआत हुई थी, तब यह ऐसी नहीं थी. पहले ट्राम को खींचने का काम घोड़ा किया करते थे, लेकिन यह घोड़ा गाड़ी वाली बग्घी नहीं बल्कि पटरी पर दौड़ने वाली ट्राम होती थी.
विशेषज्ञ का सुझाव: अनुग्रह नारायण सिंह शोध संस्थान के प्रोफेसर डॉ बी एन प्रसाद कहते हैं कि हमें आधुनिकता के साथ-साथ विरासत को भी बचा कर रखने की जरूरत है. अतीत में भी पटना के सड़कों पर ट्राम दौड़ती थी. लोग बड़े ही उत्साह के साथ ट्राम की सवारी करते थे और पटना सिटी से गांधी मैदान आते थे.
"जिस तरीके से पश्चिम बंगाल सरकार में ट्राम सेवा को नए रूप में लाने की पहल की है, उसी तर्ज पर बिहार में भी ट्राम सेवा को फिर से शुरू किया जाना चाहिए. ट्राम के लिये गंगा के किनारे पटरियां बिछाई गई थीं. उस दौर में गंगा गोलघर के किनारे बहती थी."- डॉ बी एन प्रसाद, प्रोफेसर, अनुग्रह नारायण सिंह शोध संस्थान

पर्यटन उद्योग को बढ़ावा: स्थानीय सुमन धारी सिन्हा कहते हैं कि हमने तो ट्राम की सवारी नहीं की है, लेकिन हमारे पूर्वजों ने ट्राम सेवा का फायदा उठाया होगा. पटना में रहने वाले कम ही लोगों को यह पता होगा कि ट्राम का परिचालन पटना में भी होता था. इसके फिर से वापसी से पर्यटन को निश्चिचत रूप से बढ़ावा मिलेगा.
"बिहार ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमि है. बड़ी संख्या में पर्यटक यहां आते भी हैं. अगर फिर से राजधानी पटना में ट्राम सेवा बहाल किया जाए और पर्यटकों को ट्राम के जरिये पर्यटन स्थल पर ले जाया जाए तो बिहार में पर्यटन उद्योग भी विकसित होंगे."- सुमन धारी सिन्हा, स्थानीय निवासी
कैसी होती थी तब ट्राम: आज देश के एकमात्र शहर कोलकाता में ट्राम चलती है, जिसे धरोहर के रूप में यहां चलाया जाता है. कोलकाता में आज अत्याधुनिक एसी कोच वाली इलेक्ट्रिक ट्राम चलायी जाती है, लेकिन जिस समय ट्राम की शुरुआत हुई थी, तब इसका रूप ऐसा नहीं था. पहले ट्राम को खींचने का काम घोड़े किया करते थे, लेकिन यह घोड़ा गाड़ी वाली बग्घी नहीं बल्कि पटरी पर दौड़ने वाली ट्राम होती थी.

प्रदूषण मुक्ति का बेहतर साधन: बिहार के शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में ट्राम सेवा एक गेम-चेंजर की तरह साबित हो सकती है. पूरी तरह बिजली से चलने के कारण ट्राम से हानिकारक गैसों और कार्बन का शून्य उत्सर्जन होता है, जिससे हवा की गुणवत्ता में तेजी से सुधार आएगा. ट्राम से पारंपरिक पेट्रोल-डीजल वाहनों पर लोगों की निर्भरता कम होगी, जिससे भारी यातायात का दबाव घटेगा. यह प्रदूषणमुक्त, शांत और सुरक्षित ग्रीन ट्रांसपोर्ट लूप नागरिकों को एक स्वच्छ वातावरण देने में काफी मददगार साबित हो सकती है.
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