हिमाचल में खेती का 'ब्लू रिवॉल्यूशन': पराली के नीचे उगा 'नीला आलू', खासियत की भरमार, 90 दिन में फसल तैयार
सिरमौर मॉडल 'नीला आलू' बना चर्चा का विषय, 15 किसानों के खेतों में सफल प्रयोग.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : March 3, 2026 at 8:17 PM IST
सिरमौर: हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती को लेकर चल रही पहल के बीच अब एक नया कृषि मॉडल चर्चा का विषय बन गया है. सिरमौर जिले में पराली आधारित तकनीक से उगाया गया 'नीला आलू' खेतों में तैयार खड़ा है और कई स्थानों पर इसकी निकासी भी शुरू हो चुकी है. कुछ किसानों की फसल पूरी तरह तैयार है, जिसे आने वाले दिनों में निकाला जाएगा. मात्र 90 दिनों में तैयार हुई इस फसल ने राज्य में प्राकृतिक खेती की दिशा में नई उम्मीद जगाई है.
हिमाचल में खेती का 'ब्लू रिवॉल्यूशन'
दरअसल, यह तकनीक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई है. धौलाकुआं स्थित कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप इसका परीक्षण और परिष्करण कर इसे किसानों तक पहुंचाया. रबी सीजन में 15 किसानों के खेतों में लगाए गए प्रदर्शन प्लॉट अब सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं. ऐसे में इस फसल को प्रदेश में 'ब्लू रिवॉल्यूशन' की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है.
2 वर्ष पहले किया गया था इंट्रोड्यूस
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि, "आईसीएआर की जमीन के ऊपर और पराली के नीचे आलू उत्पादन तकनीक को 2 वर्ष पूर्व धौलाकुआं स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में इंट्रोड्यूस किया गया था. वर्ष 2024 में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसका विशेष परीक्षण किया गया. अनुसंधान फार्म में 'कुफरी नीलकंठ' किस्म लगाई गई और इसके परिणाम उत्साहजनक पाए गए. इसके बाद इस वर्ष 15 किसानों के खेतों में रबी सीजन के दौरान डेमो प्लांट लगाए गए."

कैसे होती है खेती?
डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि, इस तकनीक में आलू के बीज कंद को मिट्टी के ऊपर रखा जाता है और उसके ऊपर लगभग एक फीट मोटी धान की पराली की परत बिछा दी जाती है. सबसे बड़ी बात यह है कि केवल दो सिंचाई में फसल तैयार हो जाती है. इसमें खुदाई की भी आवश्यकता नहीं होती, पराली हटाकर सीधे आलू की निकासी हो जाती है. इस तकनीक में श्रम लागत लगभग नगण्य हो जाती है. इस तकनीक से खेती करने पर तीन महीने में फसल हो जाती है. 5 बीघे की पराली का उपयोग 1 बीघा भूमि में आलू उत्पादन के लिए किया जा सकता है. इससे पराली जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है.

'कुफरी नीलकंठ' क्यों है खास?
कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल कहते हैं, "अनुसंधान फार्म में लगाई गई 'कुफरी नीलकंठ' किस्म लगभग 90 दिनों में तैयार हो जाती है. यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है और एंथोसायनिन के कारण इसका रंग स्वाभाविक रूप से नीला होता है. यह किस्म केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई), शिमला द्वारा विशेष रूप से मैदानी इलाकों के लिए अनुमोदित है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह लेट ब्लाइट (झुलसा रोग) के प्रति सहनशील है, जो आलू की फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है."

नीलकंठ आली की खेती पूरी तरह प्राकृतिक
डॉ. पंकज मित्तल के अनुसार, इस मॉडल की एक और विशेषता यह है कि जिले में आलू को पूरी तरह प्राकृतिक पद्धति से उगाया जा रहा है. रासायनिक खाद का उपयोग बिल्कुल भी नहीं किया जा रहा है. इसमें कीटनाशकों का प्रयोग भी नहीं होता है. किसी प्रकार के रसायन का इस्तेमाल नहीं होती है. डॉ. मित्तल ने कहा कि, जड़ और पत्तेदार सब्जियों में रसायनों का अधिक प्रयोग उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है. आलू हर वर्ग की रसोई में इस्तेमाल होता है, इसलिए इसे प्राकृतिक पद्धति से बढ़ावा देना आवश्यक है.

ज्वाइंट डायरेक्टर ने की सराहना
कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. अतुल डोगरा ने हाल ही में कृषि विज्ञान केंद्र और किसानों के प्रदर्शन प्लॉटों का निरीक्षण कर इस तकनीक को लाभकारी पहल बताया था. इस दौरान उन्होंने उम्मीद जताई कि स्पष्ट परिणाम सामने आने के बाद अधिक किसान इस तकनीक को अपनाएंगे. कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र मिलकर इसे व्यापक स्तर पर लागू करने की दिशा में काम करेंगे.

आत्मा परियोजना का भी समर्थन
आत्मा परियोजना सिरमौर के निदेशक डॉ. साहब सिंह ने कहा कि, "यदि बाजार में इस नीले आलू को उचित पहचान और मूल्य मिला, तो यह मॉडल प्रदेश के किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इस वर्ष कई किसानों ने प्राकृतिक खेती के तहत इस किस्म को अपनाया है और प्रारंभिक परिणाम उत्साहजनक हैं. हालांकि अंतिम निष्कर्ष हार्वेस्टिंग पूर्ण होने के बाद ही स्पष्ट होंगे, क्योंकि फिलहाल कटाई का समय चल रहा है. इस विधि से उगाए गए आलू में आयरन की मात्रा अधिक पाई गई है और स्वाद भी बेहतर है. किसानों में इस फसल को लेकर उत्साह देखा जा रहा है."

'पराली हटाओ, आलू पाओ' बना नया अनुभव
पांवटा साहिब तहसील के सालवाला, कांशीपुर, फूलपुर, भंगानी और बनेथ सहित मैदानी क्षेत्रों के किसानों ने इस तकनीक को अपनाया है. किसानों का कहना है कि खुदाई की आवश्यकता नहीं पड़ती. पराली हटाते ही जमीन के ऊपर सजे नीले आलू सीधे हाथ में आ जाते हैं. इससे श्रम लागत कम हुई है और सिंचाई की आवश्यकता भी सीमित रही है.

पराली से पैदावार तक, हिमाचल में टिकाऊ खेती की नई दिशा
सिरमौर से शुरू हुआ यह प्रयोग अब हिमाचल में प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि मॉडल की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है. पराली, जिसे पहले समस्या समझा जाता था, अब उत्पादन का माध्यम बन रही है. हिमाचल के खेतों में खड़ा यह 'नीला आलू' केवल एक फसल नहीं, बल्कि खेती की बदलती सोच और पर्यावरण संतुलन की नई दिशा का संकेत बन चुका है.

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