ETV Bharat / bharat

सोनिया गांधी ने खामेनेई पर मोदी सरकार की चुप्पी की आलोचना की, संसद में बहस की मांग की

सोनिया गांधी ने कहा ईरान मुद्दे को लेकर केंद्र में मोदी सरकार पर हमला किया. उन्होंने कहा,'मोदी सरकार की चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि कर्तव्यहीनता है.'

Sonia slams Modi govt silence
कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरपर्सन सोनिया गांधी (PTI)
author img

By ETV Bharat Hindi Team

Published : March 3, 2026 at 9:49 AM IST

5 Min Read
Choose ETV Bharat

नई दिल्ली: मोदी सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने मंगलवार को कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की टारगेटेड हत्या पर सरकार की चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि कर्तव्यहीनता है. इससे भारत की फॉरेन पॉलिसी की दिशा और क्रेडिबिलिटी पर गंभीर शक पैदा होता है.

कांग्रेस की पूर्व प्रेसिडेंट ने यह भी मांग की कि जब बजट सेशन के दूसरे हिस्से के लिए पार्लियामेंट फिर से शुरू हो, तो इंटरनेशनल ऑर्डर के टूटने पर सरकार की 'परेशान करने वाली चुप्पी' पर बिना किसी टालमटोल के खुलकर बहस होनी चाहिए.

एक अखबार में छपे अपने आर्टिकल में गांधी ने कहा कि हमें नैतिक ताकत को 'फिर से खोजने' और उसे साफ और कमिटमेंट के साथ बताने की तुरंत जरूरत है. गांधी ने कहा, '1 मार्च को ईरान ने कन्फर्म किया कि उसके सुप्रीम लीडर, अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई की हत्या पिछले दिनों अमेरिका और इजराइल के टारगेटेड हमलों में कर दी गई थी. चल रही बातचीत के बीच एक मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या आज के इंटरनेशनल रिश्तों में एक बड़ी दरार दिखाती है.'

उन्होंने कहा कि फिर भी इस घटना के सदमे के अलावा जो बात उतनी ही साफ तौर पर सामने आती है, वह है नई दिल्ली की चुप्पी. उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने हत्या या ईरानी संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा करने से परहेज किया है.

गांधी ने कहा, 'शुरुआत में अमेरिका-इजराइल के बड़े हमले को नजरअंदाज करते हुए प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) ने यूएई पर ईरान के जवाबी हमले की निंदा करने तक ही खुद को सीमित रखा, बिना उससे पहले की घटनाओं पर बात किए.

बाद में उन्होंने अपनी 'गहरी चिंता' के बारे में आम बातें कहीं और 'बातचीत और डिप्लोमेसी' की बात की -- जो कि इजराइल और अमेरिका द्वारा बिना उकसावे के किए गए बड़े हमलों से पहले ठीक यही चल रहा था.'

गांधी ने अपने आर्टिकल में कहा, 'जब किसी विदेशी नेता की टारगेटेड किलिंग से हमारे देश की तरफ से सॉवरेनिटी या इंटरनेशनल लॉ का कोई साफ बचाव नहीं होता और इम्पार्शियलिटी को छोड़ दिया जाता है, तो इससे हमारी फॉरेन पॉलिसी की दिशा और क्रेडिबिलिटी पर गंभीर शक पैदा होता है.'

उन्होंने जोर देकर कहा कि इस मामले में चुप्पी न्यूट्रल नहीं है. गांधी ने बताया कि यह हत्या बिना किसी फॉर्मल युद्ध की घोषणा के और चल रहे डिप्लोमैटिक प्रोसेस के दौरान की गई थी. उन्होंने कहा, 'यूनाइटेड नेशंस चार्टर का आर्टिकल 2 (4) किसी भी देश की प्रादेशिक अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ धमकी देने या ताकत का इस्तेमाल करने पर रोक लगाता है. किसी मौजूदा देश के हेड की टारगेटेड किलिंग इन प्रिंसिपल्स के दिल पर हमला करती है.'

उन्होंने कहा कि अगर दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी की तरफ से बिना किसी सैद्धांतिक आपत्ति के ऐसे काम होते हैं, तो इंटरनेशनल नियमों का खत्म होना नॉर्मल हो जाता है. गांधी ने कहा, 'टाइमिंग की वजह से बेचैनी और बढ़ जाती है.

हत्या से मुश्किल से 48 घंटे पहले, प्रधानमंत्री इजराइल के दौरे से लौटे थे, जहाँ उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के लिए साफ तौर पर सपोर्ट दोहराया था, जबकि गाजा संघर्ष में आम लोगों की मौत, जिनमें कई औरतें और बच्चे थे, की वजह से दुनिया भर में गुस्सा है.'

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब ग्लोबल साउथ के ज्यादातर देशों ने बड़ी ताकतों और ब्रिक्स में भारत के पार्टनर जैसे रूस और चीन ने दूरी बनाए रखी है, भारत का बिना किसी नैतिक स्पष्टता के हाई-प्रोफाइल पॉलिटिकल सपोर्ट एक साफ और परेशान करने वाला बदलाव है.

उन्होंने दावा किया, 'इस घटना के नतीजे जियोपॉलिटिक्स से कहीं ज्यादा हैं. इस दुखद घटना का असर पूरे महाद्वीपों में दिख रहा है. और भारत का रुख इस दुखद घटना को चुपचाप अपना समर्थन देने का संकेत दे रहा है.' गांधी ने बताया कि कांग्रेस ने ईरान की जमीन पर हुए बम धमाकों और टारगेटेड हत्याओं की साफ तौर पर निंदा की है और इसे एक खतरनाक बढ़ोतरी बताया है जिसके गंभीर क्षेत्रीय और ग्लोबल नतीजे होंगे.

उन्होंने कहा, 'हमने ईरानी लोगों और दुनिया भर के शिया समुदायों के प्रति अपनी संवेदनाएं जताई हैं और दोहराया है कि भारत की विदेश नीति विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित है, जैसा कि भारत के संविधान के आर्टिकल 51 में दिखाया गया है. ये सिद्धांत सॉवरेन बराबरी, दखल न देना और शांति को बढ़ावा देना', ऐतिहासिक रूप से भारत की डिप्लोमैटिक पहचान का अहम हिस्सा रहे हैं. इसलिए, अभी की चुप्पी सिर्फ टैक्टिकल नहीं, बल्कि हमारे बताए गए सिद्धांतों से अलग लगती है.'

ये भी पढ़ें-इजराइल-ईरान युद्ध पर पीएम मोदी के रूख से कांग्रेस नाराज, उठाए सवाल, कहा...पुरानी दोस्ती प्रभावित हुई