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'जांच कमेटी बनाने में कुछ कमी है...' जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर SC की टिप्पणी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने लोकसभा स्पीकर द्वारा उन्हें पद से हटाने को लेकर बनाई जांच कमेटी को चुनौती दी है.

Some infirmity in forming inquiry committee, SC on Justice Yashwant Varma plea
सुप्रीम कोर्ट (IANS)
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By Sumit Saxena

Published : January 7, 2026 at 6:12 PM IST

6 Min Read
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि ऐसा लगता है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए लोकसभा स्पीकर द्वारा बनाई गई जांच कमेटी में कुछ कमी है. कोर्ट ने कहा कि वह इस पर विचार करेगा कि क्या यह इतनी गंभीर है कि कार्रवाई खत्म करने की जरूरत है.

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले में सुनवाई की. बुधवार को सुनवाई खत्म करते हुए, जस्टिस दत्ता ने कहा, "हम स्पष्ट कर दें, पहली नजर में हम एक और दो पर मिस्टर रोहतगी के साथ नहीं हैं…वह प्रोविसो (यानी शर्त), प्रोविसो का मतलब, और चेयरमैन की गैरमौजूदगी में, क्या डिप्टी चेयरमैन…बहुत छोटी बात यह है कि अगर राज्यसभा ने भी प्रस्ताव मान लिया होता तो आपको एक जॉइंट कमेटी का फायदा मिलता."

जस्टिस दत्ता ने कहा, "यह आपके हित के लिए इतना नुकसानदायक है कि हमें आर्टिकल 32 के तहत दखल देना चाहिए, हम आपको इस बिंदु पर सोचने और कल आकर हमें बताने के लिए समय दे रहे हैं."

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका पर नोटिस जारी किया था जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति के गठन को चुनौती दी थी.

बुधवार को सुनवाई के दौरान, जस्टिस वर्मा की तरफ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि अगर दोनों सदनों में एक साथ महाभियोग प्रस्ताव पेश किए जाते हैं, तो एक कमेटी सिर्फ लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन मिलकर ही बना सकते हैं.

मुकुल रोहतगी ने लोकसभा सचिवालय की तरफ से फाइल किए गए हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव को डिप्टी चेयरमैन ने 11 अगस्त को खारिज कर दिया था और कमेटी का गठन 12 अगस्त को लोकसभा स्पीकर ने किया था. हालांकि, रोहतगी ने इस बात पर जोर दिया कि राज्यसभा और लोकसभा में प्रस्ताव एक ही दिन, 11 जुलाई को पेश किए गए थे.

धारा 3(2) के प्रावधान का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया गया कि एक सदन द्वारा प्रस्ताव को खारिज करने के बाद लोकसभा अध्यक्ष समिति का गठन नहीं कर सकते थे. पीठ ने पूछा कि अगर एक सदन ने प्रस्ताव खारिज कर दिया है, तो लोकसभा को कमेटी बनाने से कहां रोक है?

रोहतगी ने जवाब दिया कि चूंकि दोनों प्रस्ताव एक ही दिन पेश किए गए थे, इसलिए दोनों को स्वीकार किया जाना जरूरी है, और उसके बाद ही कमेटी बनाई जा सकती है, वह भी लोकसभा और राज्यसभा मिलकर.

सुनवाई गुरुवार के लिए टालते हुए, पीठ ने कहा कि पहली नजर में, हमें भी लगता है कि सेक्रेटरी जनरल के नोट में कुछ ऐसा था, जो नहीं होना चाहिए था, लेकिन उसे चुनौती नहीं दी गई है, और कहा, "कुछ कमी है...यह इस हद तक होगी कि इसके लिए पूरी कमेटी को..."

जांच कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के जज अरविंद कुमार, मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील बीवी आचार्य शामिल हैं.

जस्टिस वर्मा की याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता ने न्‍यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के तहत एकतरफा कमेटी बनाने के लोकसभा स्पीकर के कदम की आलोचना की है. यह कमेटी उन आधारों की जांच करेगी जिनके आधार पर याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट के जज के पद से हटाने की मांग की गई है. यह कार्रवाई संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है.

याचिका में कहा गया है, "ऊपर दी गई कार्रवाई और उससे होने वाली सभी कार्रवाइयों को न्‍यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के पहले प्रोविसो (प्रावधान) में दिए गए जरूरी निर्देशों के खिलाफ माना गया है, क्योंकि हालांकि न्‍यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(1) के तहत प्रस्ताव के नोटिस संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन दिए गए थे, लेकिन स्पीकर ने चेयरमैन द्वारा प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने और उस कानून में बताए गए चेयरमैन के साथ मिलकर सलाह-मशविरा किए बिना ही एकतरफा कमेटी बना दी."

जस्टिस वर्मा की याचिका में कहा गया है कि 21 जुलाई, 2025 को संसद के सदस्यों ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सामने अलग-अलग महाभियोग प्रस्ताव दिए, जिसमें संविधान के हिसाब से याचिकाकर्ता को जज के पद से हटाने की मांग की गई थी. याचिका में कहा गया है, "दोनों महाभियोग प्रस्ताव जरूरी संख्या में सदस्यों के हस्ताक्षर होने की कानूनी जरूरत को पूरा करते थे. इसके बाद, 12 अगस्त, 2025 को लोकसभा के स्पीकर ने घोषणा की कि वह 21 जुलाई को उनके सामने दिए गए महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर रहे हैं, और न्‍यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ कानूनी जांच करने के लिए तीन सदस्यों की कमेटी बना रहे हैं."

याचिका में कहा गया है कि हालांकि राज्यसभा में प्रस्ताव कभी स्वीकार नहीं किया गया, और न ही स्पीकर और चेयरमैन ने मिलकर कमेटी बनाई. याचिका में कहा गया, "स्पीकर ने न्‍यायाधीश (जांच) अधिनियम की धारा 3(2) के प्रोविसो का साफ उल्लंघन किया है, 21 जुलाई को लोकसभा में दिए गए प्रस्ताव को स्वीकार करने के बाद, 12 अगस्त को एकतरफा कमेटी बनाकर, जबकि उसी दिन राज्यसभा में एक अलग प्रस्ताव दिया गया था, जिसे स्वीकार नहीं किया गया था."

14 मार्च को दिल्ली में जज के सरकारी आवास के स्टोररूम में आग लगने के बाद जले हुए नोटों के बंडल मिले थे. सुप्रीम कोर्ट जस्टिस वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें न्‍यायाधीश जांच अधिनियम के तहत सिर्फ लोकसभा द्वारा बनाई गई तीन सदस्यों वाली कमेटी की वैधता को चुनौती दी गई है.

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