आर्थिक सर्वेक्षण की चेतावनी: क्या भारत भी ऑस्ट्रेलिया की राह पर सोशल मीडिया पर लगाएगा लगाम?
दुनिया भर के देश मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए नाबालिगों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध लगा रहे हैं, जिसका भारत में भी पुरजोर समर्थन है.

Published : February 10, 2026 at 2:44 PM IST
|Updated : February 12, 2026 at 2:12 PM IST
नई दिल्ली: किशोरों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर नियंत्रण की मुहिम भारत में तेजी पकड़ रही है. विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं का मानना है कि बच्चों और किशोरों की मानसिक और सामाजिक सुरक्षा के लिए डिजिटल दुनिया में नियम आवश्यक हैं. दुनिया के कई देशों की तरह भारत भी इस दिशा में गंभीर कदम उठा रहा है.
भारत में बढ़ती चिंता, आर्थिक सर्वेक्षण में चेतावनी
भारत में डिजिटल लत और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के कारण किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई है कि डिजिटल लत न केवल बच्चों के ध्यान और सीखने की क्षमता पर असर डालती है, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक विकास को भी बाधित कर सकती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों का मस्तिष्क विकासशील अवस्था में होता है, विशेष रूप से प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो आत्म-नियंत्रण, निर्णय लेने और भावनात्मक संतुलन के लिए जिम्मेदार है, अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता. इसलिए किशोरों में सोशल मीडिया की लत उनके मानसिक विकास पर गहरा असर डाल सकती है.
परामर्श मनोवैज्ञानिक अनिंदिता चटर्जी कहती हैं, बच्चों में डिजिटल लत वयस्कों से बिल्कुल अलग होती है. यह उनकी ध्यान अवधि, आत्म-नियंत्रण और भावनात्मक परिपक्वता पर लंबी अवधि में असर डालती है. ऐसे में बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर सीमाएं और नियम बेहद जरूरी हैं.
सरकार की पहल
भारत में मंत्रालय और नीति निर्माता इस मुद्दे पर गंभीर हैं. कुछ राज्य सरकारों ने स्कूलों और बच्चों के डिजिटल प्लेटफॉर्म उपयोग पर सख्त दिशा-निर्देश लागू करने शुरू किए हैं. मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर नियंत्रण जरूरी है.

साथ ही, विशेषज्ञों का सुझाव है कि तकनीकी प्लेटफॉर्म को भी बच्चों के लिए सुरक्षित और नियंत्रित अनुभव देना चाहिए. उदाहरण के लिए, माता-पिता की निगरानी वाले फीचर्स और समय सीमा आधारित उपयोग ऐप्स को लागू किया जा सकता है.
दुनिया भर में क्या हो रहा है
- भारत के अलावा, दुनिया के कई देशों ने किशोरों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर नियंत्रण के लिए कदम उठाए हैं
- ऑस्ट्रेलिया: 16 साल से कम उम्र के यूजर्स पर सोशल मीडिया प्रतिबंध, उल्लंघन करने पर 32 मिलियन डॉलर तक जुर्माना.
- फ्रांस: 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध पर विचार.
- स्पेन: 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध प्रस्तावित.
- ग्रीस, डेनमार्क, नॉर्वे, यूके: आयु सीमा पर चर्चा जारी.
- मलेशिया: 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध पर बहस.
इस तरह के कदमों का उद्देश्य किशोरों को साइबरबुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव से बचाना है.
तकनीकी कंपनियों का विरोध
हालांकि, तकनीकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों ने इन कदमों का विरोध किया है. टेलीग्राम के संस्थापक पावेल दुरोव और एलॉन मस्क ने स्पेन के प्रस्तावित प्रतिबंध को खतरनाक बताते हुए चेतावनी दी कि इससे सर्विलांस स्टेट बनने का खतरा है.

मेटा और टिकटॉक ने भी कहा कि किशोरों को सोशल मीडिया से पूरी तरह प्रतिबंधित करने से वे अनियंत्रित ऐप्स या डार्क वेब की ओर जा सकते हैं. उनका तर्क है कि बच्चों के लिए सुरक्षित और नियंत्रित डिजिटल अनुभव देना ज्यादा प्रभावी और सुरक्षित विकल्प होगा.
ऑनलाइन उत्पीड़न और डिजिटल स्वास्थ्य
दुनिया भर में ऑनलाइन उत्पीड़न की घटनाओं में बढ़ोतरी के कारण सरकारें इसे नजरअंदाज नहीं कर सकतीं. विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरों द्वारा सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल चिंता, अवसाद और आत्म-सम्मान से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा सकता है.
भारत में भी कई अध्ययनों ने यह दिखाया है कि सोशल मीडिया पर लंबे समय तक रहने वाले किशोरों में मानसिक और सामाजिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. इसलिए यह कदम सिर्फ सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि बच्चों के विकास और भविष्य की स्थिरता के लिए भी जरूरी है.
भारत में यह मुद्दा तेजी से प्रमुख हो रहा है, और सरकार, माता-पिता और विशेषज्ञ मिलकर किशोरों के लिए एक सुरक्षित डिजिटल वातावरण बनाने पर ध्यान दे रहे हैं. दुनिया के अन्य देशों के उदाहरण भी दिखाते हैं कि आयु-आधारित प्रतिबंध और डिजिटल सुरक्षा नीतियां न केवल किशोरों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाती हैं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार और संतुलित डिजिटल जीवन जीना भी सिखाती हैं.
जैसे-जैसे सोशल मीडिया की पहुंच बढ़ती जा रही है, भारत में इस दिशा में प्रयास और तेज होंगे. विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों और किशोरों के डिजिटल व्यवहार को सीमित और संरक्षित करना उनकी मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक सेहत के लिए अनिवार्य है.
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