पंजाब-हरियाणा में डोडा अफीम अब मसाले की तरह! घरों और ढाबों में हो रहा इस्तेमाल, झारखंड से सप्लाई
पलामू पुलिस ने बड़ा खुलासा किया है. पंजाब और हरियाणा में डोडा का मसाले की तरह इस्तेमाल हो रहा है. पढ़ें पूरी रिपोर्ट.

Published : December 4, 2025 at 3:47 PM IST
रिपोर्ट: नीरज कुमार
पलामू: पंजाब और हरियाणा के इलाकों में डोडा का इस्तेमाल हो रहा है. लाइन होटलों में चाय की पत्ती में डोडा मिलाया जा रहा है. यह चौंकाने वाला खुलासा पलामू पुलिस की हालिया कार्रवाइयों में हुआ है. पिछले 15 दिनों में पलामू पुलिस ने एनडीपीएस एक्ट के तहत अफीम और डोडा के खिलाफ चार बड़ी कार्रवाई की है. इनमें लाखों रुपये कीमत के अफीम, डोडा और नकदी बरामद हुए हैं.
2 नवंबर को सदर थाना क्षेत्र में एक कार से 100 किलो डोडा बरामद किया गया था. इस मामले में उत्तर प्रदेश के बरेली निवासी मोहम्मद चांद और जीशान को गिरफ्तार किया गया. पूछताछ में दोनों ने पुलिस को सनसनीखेज जानकारी दी. उन्होंने बताया कि पंजाब और हरियाणा में डोडा का बड़े पैमाने पर घरेलू उपयोग हो रहा है और लाइन होटलों में इसे चाय की पत्ती में मिलाकर परोसा जा रहा है.
पोस्ता के पौधे से बनता है डोडा
नवंबर में बोई गई अफीम की फसल फरवरी के मध्य तक पूरी तरह पक जाता है. इस समय पौधे पर हरे रंग का गोलाकार फल यानी “पॉपी” बन जाता है. यही वह हिस्सा है जिसमें अफीम का दूधिया रस जमा होता है. जब पॉपी हरा और कोमल होता है, तभी किसान शाम के समय विशेष तेज धार वाले छोटे ब्लेड से चीरा लगाने का काम शुरू करते हैं. एक पॉपी पर आम तौर पर 4 से 8 तक लंबवत चीरे लगाए जाते हैं. यह पॉपी के आकार पर निर्भर करता है. बड़े पॉपी पर ज्यादा चीरे, छोटे पर कम. इसके आगे एक लंबा प्रोसेस होता है, जिसके बाद अफीम बनाया जाता है.

यह पूरी प्रक्रिया फरवरी के अंत से मार्च के मध्य तक चलती है. एक किसान रोजाना सैकड़ों-हजारों पॉपी पर चीरा लगाता और अगली सुबह खुरचता है. इसके बाद जब सारे चीरे लगा लिए जाते हैं और सारा रस निकल जाता है, तो वही पॉपी सूखकर 'डोडा' या 'पोस्ता भूसी' बन जाता है, जिसकी भी अलग तस्करी होती है.
झारखंड में 1500, पंजाब-हरियाणा में 8000 रुपये किलो बिक रहा डोडा
झारखंड के चतरा, पलामू, रांची, लातेहार, खूंटी समेत कई जिलों में अवैध अफीम की खेती होती है और बड़े पैमाने पर उसे नष्ट भी किया जाता है. यही डोडा तैयार कर तस्करी की जाती है. स्थानीय स्तर पर तस्कर इसे 1400-1500 रुपये प्रति किलो बेचते हैं, जबकि पंजाब और हरियाणा पहुंचते ही यह 7 से 8 हजार रुपये प्रति किलो तक बिक जाता है.

“15 दिनों में एनडीपीएस के चार बड़े मामले हुए हैं. पूछताछ में पता चला कि पिछले क्रॉपिंग सीजन का डोडा तस्करी किया जा रहा है. पंजाब-हरियाणा में इसका घरेलू उपयोग और लाइन होटलों में चाय में मिलाकर इस्तेमाल हो रहा है.” – रीष्मा रमेशन, एसपी, पलामू
यूपी का बरेली बन रहा सबसे बड़ा खरीदार
पुलिस कार्रवाई से एक और चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश का बरेली इलाका अब अफीम और डोडा का सबसे बड़ा बाजार बनता जा रहा है. पिछले पांच बड़े मामलों में सभी तस्करों का लिंक बरेली से जुड़ा हुआ पाया गया है. पलामू से ट्रेन और सड़क मार्ग से उत्तर भारत की कनेक्टिविटी आसान होने के कारण तस्कर इसी रूट का इस्तेमाल करते हैं.

डोडा का इस्तेमाल बेहद खतरनाक, शरीर को पहुंचाता गंभीर नुकसान
डोडा का सेवन शरीर के लिए अत्यंत खतरनाक है. इससे इच्छाशक्ति कमजोर होती है, इम्यूनिटी सिस्टम प्रभावित होता है, लत लगने पर सांस लेने में तकलीफ, लिवर-किडनी डैमेज जैसी गंभीर समस्याएं होती हैं.
“डोडा या इससे जुड़ा कोई भी नशीला पदार्थ शरीर के लिए घातक है. शुरुआत में लोग इसे लेने से तरोताजा महसूस करते हैं, लेकिन लंबे समय तक सेवन से स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचता है. मसाले के रूप में घरेलू उपयोग भी बेहद खतरनाक है.” - अनिल कुमार, डॉक्टर
झारखंड में होती है अफीम की अवैध खेती
झारखंड के दुर्गम जंगलों और पहाड़ी इलाकों में पिछले एक दशक से अफीम की खेती तेजी से फैल रही है. चतरा, लातेहार, पलामू, गढ़वा, खूंटी, रांची के ग्रामीण क्षेत्र और सरायकेला-खरसावां के कुछ हिस्सों में अब अफीम के खेत आम दृश्य बन गए हैं. यह खेती सिर्फ गरीब किसानों की मजबूरी नहीं है, बल्कि इसके पीछे माओवादी संगठनों का संरक्षण और बड़े संगठित अपराधी गिरोहों का नेटवर्क काम कर रहा है.

झारखंड में ही क्यों होती है अफीम की खेती
झारखंड में अवैध अफीम की खेती जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसका सबसे बड़ा और मूल कारण आर्थिक है. राज्य के ग्रामीण और आदिवासी बहुल इलाकों में गरीबी चरम पर है, स्थायी रोजगार लगभग न के बराबर है. पारंपरिक फसलें जैसे धान, मक्का, मरुआ या गेहूं एक एकड़ से मुश्किल से 20-30 हजार रुपये सालाना दे पाते हैं, जबकि उसी एक एकड़ अफीम की खेती से किसान 2 से 3.5 लाख रुपये तक कमा लेता है. यह 8-10 गुना ज्यादा कमाई है और मेहनत भी अपेक्षाकृत कम लगती है. यही आर्थिक लालच किसानों को इस जोखिम भरे रास्ते पर धकेल रहा है.

दूसरी बड़ी वजह भौगोलिक है. चतरा, लातेहार, पलामू, गढ़वा, खूंटी और सरायकेला जैसे जिले घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों से घिरे हैं. कई गांव तो आज भी सड़क से नहीं जुड़े हैं. पुलिस की गश्त इन इलाकों में साल में एक-दो बार ही पहुंच पाती है. ज्यादातर समय ये क्षेत्र पूरी तरह निर्जन और अनियंत्रित रहते हैं. बाहर का कोई व्यक्ति भी बिना स्थानीय गाइड के इन जंगलों में जाने से डरता है. यह एक तरह से 'प्राकृतिक किला' बन जाता है, जिसमें अवैध खेती बेखौफ फलती-फूलती है.
किसान अब काफी चालाक हो गए हैं. वे अफीम के बीजों को जानबूझकर धान, मक्का या सरसों के खेतों के बीच-बीच में छिपाकर बोते हैं. ऊपर से देखने पर पूरा खेत सामान्य फसल जैसा ही लगता है. ड्रोन सर्वे या सैटेलाइट तस्वीरों में भी यह आसानी से पकड़ में नहीं आता. कई जगह तो किसान अफीम को दो-तीन लाइन में ही बोते हैं और बाकी खेत में दूसरी फसल लगा देते हैं. इससे जोखिम बहुत कम हो जाता है और निगरानी से बचना आसान.

नक्सलियों के प्रभाव वाले इलाके में होती है अफीम की खेती
जिन इलाकों में अफीम की खेती है होती है वह इलाका नक्सलियों का प्रभाव वाला रहा है. सबसे अधिक खेती प्रतिबंधित नक्सली संगठन टीएसपीसी के प्रभाव वाले इलाके में होता है. पलामू चतरा एवं लातेहार का सीमावर्ती इलाके में टीएसपीसी का प्रभाव रहा है. झारखंड में सबसे पहले पलामू चतरा सीमा पर 2006 -07 में अफीम की खेती की शुरुआत हुई थी. उसे दौरान टीएसपीसी का प्रभाव उसे इलाके में सबसे अधिक था. 2023-24 में पलामू पुलिस ने कार्रवाई की थी. इस कार्रवाई के दौरान अफीम की खेती में टीएसपीसी के नक्सलियों की भूमिका निकलकर सामने आई थी. चतरा में अफीम की खेती के खिलाफ अभियान के दौरान टीएसपीसी हमला भी कर चुका है जिसमें दो जवान शहीद हुए थे.

ग्रामीणो को दिया जाता है लोभ, चलाया जा रहा जागरूकता अभियान
अफीम की खेती करने वाले ग्रामीणों को तस्करों के तरफ से लोग दिया जाता है. कई इलाकों में बटाईदारी एवं किराए के जमीन पर अफीम की खेती के सबूत मिले हैं. अधिकतर अफीम की खेती के लिए वन भूमि का इस्तेमाल होता है ताकि कार्रवाई के दौरान वास्तविक तस्कर की पहचान नहीं हो सके. पलामू एसपी के अनुसार ग्रामीणो को लोभ लालच दिया जाता है, जिस कारण ग्रामीण गलत कदम उठा लेते है. पुलिस सभी इलाकों में जागरूकता अभियान चला रही है और अफीम की खेती से दूर रहने के लिए अपील भी कर रही है. खेती में नक्सल संगठन और उनके समर्थकों की भूमिका भी देखी गई है.
संगठित गिरोहों का अंतरराज्यीय नेटवर्क
माओवादी सिर्फ संरक्षण देते हैं, असली कमाई तस्करों और बड़े ड्रग माफिया की होती है. पलामू, लातेहार और चतरा से कच्चा अफीम निकलता है तो उसका पहला पड़ाव उत्तर प्रदेश का बरेली, मुरादाबाद, रामपुर और संभल होता है. वहां से यह पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और आगे नेपाल के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचता है. तस्कर छोटे-छोटे ग्रुप में काम करते हैं. कोई किसानों से माल खरीदता है, कोई ट्रांसपोर्ट करता है, कोई बिचौलिया है तो कोई प्रोसेसिंग लैब चलाता है. ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और अपना हिस्सा लेते हैं.

एक एकड़ से कितनी कमाई?
एक एकड़ में अच्छी किस्म के बीज, समय पर सिंचाई और खाद डालने पर 3 से 4.5 किलो तक कच्चा अफीम निकल आता है. किसान को स्थानीय तस्कर 60 से 80 हजार रुपये प्रति किलो देते हैं. यानी एक एकड़ से किसान को 2 से 3.5 लाख रुपये तक मिल जाते हैं. धान या मक्का की फसल से यह 8-10 गुना ज्यादा कमाई है. यही वजह है कि गरीब आदिवासी किसान इसकी तरफ खिंचे चले आ रहे हैं. लेकिन यह कमाई बहुत जोखिम भरी है – कभी पुलिस पकड़ ले, कभी माओवादी या तस्कर लेवी के नाम पर ज्यादा पैसे मांग लें या मारपीट कर लें.
वैध और अवैध अफीम में अंतर
भारत में मध्य प्रदेश (मंदसौर, नीमच, रतलाम), राजस्थान (चित्तौड़गढ़, झालावाड़, कोटा) और उत्तर प्रदेश (बाराबंकी, फैजाबाद) में सरकार लाइसेंस देकर अफीम की खेती करवाती है. 2023-24 में सरकार ने किसानों से 2000 से 3200 रुपये प्रति किलो की दर से अफीम खरीदी. यह अफीम पूरी तरह कानूनी है और इसका इस्तेमाल दवाइयों (मॉर्फिन, कोडीन) बनाने में होता है. लेकिन झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ के जंगली इलाकों में होने वाली खेती 100% अवैध है और इसका सारा माल नशे की दुनिया में जाता है.

डोडा और पोस्ते का अलग कारोबार
अफीम निकालने के बाद बचा हुआ सूखा पॉपी हस्क (डोडा पोस्ट) और उसका पाउडर भी बिकता है. झारखंड में यह 1200-1500 रु. किलो बिकता है, वहीं पंजाब-हरियाणा के ढाबों और घरों में 7000-9000 रु. किलो तक पहुंच जाता है. लोग इसे चाय में, दाल-सब्जी में मसाले की तरह डालकर पीते और खाते हैं. यह धीरे-धीरे लत लगा देता है और लिवर-किडनी को भारी नुकसान पहुंचाता है.

अफीम और डोडा पोस्त को लेकर भारत में कानून कितना सख्त
भारत में अफीम, डोडा पोस्त (पॉपी हस्क), कच्चा अफीम और इससे बने सभी नशीले पदार्थों पर पूरी तरह नियंत्रण Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985 यानी NDPS एक्ट के तहत है. यह देश का सबसे कठोर ड्रग विरोधी कानून माना जाता है और इसमें कोई जमानत या पैरोल का आसान प्रावधान नहीं है. अगर कोई व्यक्ति 50 किलो से ज्यादा डोडा पोस्त या 2.5 किलो से ज्यादा कच्चा अफीम रखते, बेचते, खरीदते या परिवहन करते पकड़ा जाता है तो केस सीधे 'व्यावसायिक मात्रा' का बनता है. ऐसे मामलों में निचली अदालत से जमानत लगभग नामुमकिन होती है. हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ता है. खेती करना, बीज रखना, परिवहन में मदद करना सभी अपराध इसमें शामिल हैं.

फिर भी झारखंड में कारोबार क्यों नहीं रुक रहा?
कानून भले ही कागज पर बेहद सख्त हो, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. दुर्गम जंगल, पुलिस की कम पहुंच, विशेष NDPS कोर्ट और अलग नारकोटिक पुलिस स्टेशन की कमी, और कई बार स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के आरोप – ये सारी वजहें मिलकर इस काले कारोबार को संरक्षण दे रही हैं. नतीजा यह है कि सजा का डर होने के बावजूद किसान, तस्कर और माओवादी गिरोह मिलकर हर साल हजारों हेक्टेयर में अफीम उगा रहे हैं और उसकी तस्करी कर रहे हैं.
इन जिलों में होती है अधिकांश अवैध अफीम की खेती
- खूंटी: 10,520 एकड़
- रांची: 4,624 एकड़
- पलामू: 396 एकड़
झारखंड सरकार अफीम की खेती रोकने के लिए लगातार कर रही प्रयास
मुख्य सचिव अलका तिवारी ने संबंधित अधिकारियों को पहले ही निर्देश दिया है कि वे अफीम की खेती को 100% नष्ट करें और अभियान जारी रखें. डीजीपी अनुराग गुप्ता ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दे रखा है कि है कि वे वन विभाग द्वारा अफीम की खेती को लेकर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट को आधार बनाकर संबंधित लोगों पर एफआईआर करें. अब तक वन विभाग सिर्फ अतिक्रमण का मामला दर्ज करता था.
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