बिहार में रिकॉर्डतोड़ वोटिंग के मायने, जानिए 1952 से 2020 तक कब पड़े थे सबसे ज्यादा वोट
बिहार में वोटिंग का नया रिकॉर्ड बना है. अब तक के सारे रिकॉर्ड टूट गए हैं. ज्यादा मतदान होने से किसको फायदा होगा. जानें

Published : November 6, 2025 at 8:01 PM IST
पटना: बिहार में पहले चरण के चुनाव में वोटिंग के सारे रिकॉर्ड टूट गए. या यह कहें कि, यह इतिहास में पहली बार होगा कि जब किसी विधानसभा चुनाव में इतने ज्यादा वोट पड़े हों. अब ऐसे में यह जानना जरूरी है कि, आखिर रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग के क्या मायने होते हैं. प्रथम चरण के वोटिंग में 64.46 फीसदी मतदान दर्ज किया गया जो बिहार के चुनावी इतिहास में अब तक सबसे ज्यादा मतदान है.
बिहार में पहली बार वोटिंग कब हुई थी? : बिहार में पहला आम चुनाव 1952 में 21 दिनों तक चला था. राज्य में 4 से 24 जनवरी के बीच मतदान हुआ था. दूसरी तरफ 1957 में वोटिंग 25 फरवरी से 12 मार्च के मध्य 16 दिनों में हुआ था. चुनाव आयोग ने 9 फरवरी 1969 को पूरे बिहार में राष्ट्रपति शासन के दौरान मतदान संपन्न कराया था.
साल 1980 की बात करें तो बिहार में विधानसभा चुनाव एक ही चरण 31 मई और 27 फरवरी 1990 को एक चरम में वोटिंग हुई थी. वहीं, 1962 में मतदान 4 चरणों में 18, 21, 23 और 25 फरवरी को कराया गया था. साल 1967 की बात करें तो, 15, 17, 19 और 21 फरवरी को चार चरणों में मतदान कराया गया था. उस समय लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए गए थे.
भारी वोटिंग के क्या हैं मायने: चुनाव आयोग के आंकड़ों को देखें तो 2020 में 56.9 फीसदी मतदान हुआ था. राज्य में सबसे अधिक वोटिंग की बात की जाए तो वो साल 2000 में हुई थी. उस समय 62.6 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले थे और तब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था और पूरा बिहार राजनीतिक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था.
आज 25 साल बाद जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी सत्ता के दो दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहे हैं, ऐसे में बिहार एक बार फिर से लोकतंत्र के इस महापर्व में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहा है. अब जानना जरूरी है कि, रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग का पैटर्न क्या कहता है. इस सवाल का जवाब जानना जरूरी है.
साल 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा वोटिंग हुई थी.आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. हालांकि, बहुमत से कुछ सीटें कम रह गईं. उस समय जेडीयू और बीजेपी अलायंस में थे. चुनाव में कांग्रेस और कुछ अन्य छोटे दलों को कुछ सीटें मिली थीं. राबड़ी देवी ने बहुमत होने का दावा किया और दोबारा मुख्यमंत्री बनीं. राबड़ी की सरकार 2005 तक चली, जब राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के बाद विधानसभा भंग हुई और दोबारा चुनाव कराए गए.
भारी वोटिंग के क्या मायने? : पहले चरण के मतदान में हुए बंपर वोटिंग को लेकर राजनीतिक विश्लेषक डॉ. संजय कुमार का कहना है कि, इसका बड़ा कारण SIR है. उन्होंने कहा कि, मतदाता सूची से फर्जी वोटरों के नाम हटाए जाने के बाद मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या कम हुई. निर्वाचन आयोग ने भी एक बूथ पर 1500 वोटर का लक्ष्य रखा. संख्या कम हुई तो निश्चित रूप से गिरे हुए वोट का वोटिंग परसेंट बढ़ेगा.
''इस बार महिलाओं और युवाओं ने जमकर मतदान किया है. सरकार के द्वारा महिलाओं के खाते में पैसे भेजने एवं पेंशन की राशि बढ़ाने को लेकर महिलाओं का उत्साह इस चुनाव में और ज्यादा देखने को मिल रहा है. युवा भी इस बार बढ़ चढ़कर चुनाव में भाग ले रहे हैं यही कारण है कि अधिकांश जगहों पर युवाओं एवं महिलाओं की लंबी कतार देखने को मिली. वोटिंग परसेंटेज बढ़ने का एक और कारण है कि छठ के कारण लोग बिहार आए हुए हैं और स्पेशल रिव्यु के बाद पहली बार चुनाव हो रहा है तो मतदाता भी उत्साहित थे कि वह अपनी सरकार चुनकर ही जाएं यही कारण है कि इस बार वोटिंग परसेंटेज में इजाफा देखने को मिला है.''- डॉ. संजय कुमार, राजनीतिक विश्लेषक
1952 से 2020 तक कब पड़े थे कितने वोट (% में)

आंकड़ों की मानें तो, बिहार में 1952 से अब तक विधानसभा चुनावों में मतदान का प्रतिशत सिर्फ 5 बार घटा है. बाकी हर बार बिहार के मतदाताओं ने पहले से ज्यादा उत्साह दिखाया. अब देखना है कि, 2025 में मतदान 65 प्रतिशत तक पहुंचता है, तो यह न सिर्फ रिकॉर्ड तोड़ेगा, बल्कि पिछले सात दशकों की पूरी वोटिंग ट्रेंड लाइन को ऊपर उठा देगा. दूसरे चरण का मतदान 11 नवंबर को होगा और मतगणना 14 नवंबर को की जाएगी.
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