बिहार में कफन की बढ़ी डिमांड, मातमी कपड़ा बनाने वाले फिर भी नहीं हैं खुश, जानें वजह
ठंड के मौसम में बिहार के इस गांव में कफन का कारोबार खूब फल-फूल रहा है, लेकिन फिर भी यहां के बुनकर खुश नहीं हैं.

Published : December 24, 2025 at 8:07 AM IST
गया: पटवा समाज के पूर्व अध्यक्ष व बुनकर नेता प्रेम नारायण बताते हैं कि बिहार में सिर्फ मानपुर के पटवा टोली में ही कफन बनता है और बड़े पैमाने पर इस बनाया जाता है. लेकिन कफन में मुनाफा न के बराबर है. बुनकर बोर्ड में कफन बनाने वालों की स्थिति को लेकर आवाज भी उठा चुके हैं. बुनकर बोर्ड में यह भी कहा था, कि कपड़ों पर जीएसटी सही माना जा सकता है, लेकिन कफन को जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया जाए.
"कफन को जीएसटी के दायरे से बाहर नहीं किया गया. आज गया में बना कफन देश के कई राज्यों में जाता है. देश में चुनिंदा स्थानों पर ही कफन तैयार होता है. बड़े पैमाने पर कफन बिहार के गया जी में ही बनाया जाता है. ऐसे में कफन कारोबारी की मदद जरूरी है, ताकि वह अपने पुश्तैनी धंधे को बचाकर रख सके."- प्रेम नारायण, बुनकर नेता
कफन के कारोबार में मुनाफा बेहद कम: कफन के कारोबारी पारसनाथ ने भी अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि कफन के कारोबार में मुनाफा बहुत कम है, इसलिए सब पीतांबरी (कफन) वाले भागकर दूसरे रोजगार में चले गए. एक कफन में 3-4 रुपये की बचत होती है, जबकि मेहनत बहुत ज्यादा है. दिनभर में 250-300 रुपये तक की कमायी होती है, जो एक मजदूर के एक दिन की कमायी से भी कम है.

मजाक उड़ाते हैं लोग: पारस बताते हैं, कि उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम करती आई है. वह भी अपने इस पुश्तैनी धंधे से जुड़े हुए हैं. पूरा परिवार कफन बनाने का काम करता है. कफन बेचना या उसे तैयार करना काफी मुश्किल भरा होता है. वही कभी-कभी कफन के कारोबार से मन विचलित भी हो जाता है. ऐसा लगता है, इस धंधे को अभी के अभी छोड़ दूं. कफन के कारोबार को लेकर लोग मजाक भी उड़ाते हैं.

"कफन बनाने को लेकर लोग कई तरह के ताने कसते हैं, लेकिन सब कुछ सह लेता हूं. अब इतनी सहनशक्ति आ गई है, कि कोई कुछ भी बोलते रहे, मुझे बस अपना काम करना है. अब कफन का निर्माण और उसे बेचना और अपने गृहस्थी को चलाना, यही मुख्य लक्ष्य होता है. कुछ पैसे और कैसे जोड़े जाएं, इसका जुगाड़ जरूर लगाते हैं."- पारसनाथ, कफन के कारोबारी
ठंड के मौसम में बढ़ जाती है डिमांड: ठंड के इस मौसम में कफन की बिक्री बढ़ जाती है. विभिन्न राज्यों से कफन के आर्डर आने लगते हैं. कफन कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं, कि ठंड के मौसम में मौतें ज्यादा जब होनी शुरू हो जाती है, तो कफन की बिक्री काफी बढ़ जाती है. एक तरफ ठंड का सीजन और फिर लू के सीजन में भी कफन की डिमांड बढ़ जाती है. अभी कफन की बिक्री आसमान छू रही है. प्रतिदिन हजारों पीस कफन बिक्री हो रहे हैं.
सरकारी उपेक्षा के कारण कफन बनाने का मन नहीं: कफन बनाने वाले सुरेश प्रसाद बताते हैं, कि सरकारी उपेक्षा ने हमलोगों की आर्थिक कमर तोड़ कर रख दी है. जब चुनाव आता है, तो वादे किए जाते हैं, कि सब्सिडी दी जाएगी, लेकिन कोई सुविधा नहीं दी जाती है. धागों पर सब्सिडी देने की बात होती है, लेकिन हकीकत यह है, कि हमलोगों की स्थिति को कोई देखने नहीं आता.

"कफन बनाना कितना कठिन काम है, यह समझा जा सकता है, लेकिन हमलोगों की सुध लेने वाला कोई भी नहीं है. हमें एक छोटे लोन के लिए भी तरसना पड़ता है. छोटा लोन देने वाला भी कोई नहीं है. अब हम लोग इस पेशे से ऊबे हुए हैं. यही स्थिति बनी रही, कोई सरकारी सहायता नहीं मिली, तो आने वाले दिनों में कफन के कारोबार को छोड़ देंगे. मैं अपने परिवार के साथ कई दशकों से कफन बनाने के काम में जुटा हुआ हूं."- सुरेश प्रसाद, बुनकर
स्थानीय लोगों ने क्या कहा?: वहीं, शिवचरण लेन के रहने वाले अशोक कुमार बताते हैं, कि हमारे मोहल्ले में कफन बनाने वाले कई घर के लोग हैं. हम लोग रोज कफन बनाने की जो प्रक्रिया होती है उसे देखते हैं, लेकिन कभी उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखते. हम लोग एक समाज के लोग हैं. समाज में अलग-अलग काम करने वाले लोग होते हैं.अशोक कुमार बताते हैं कि यहां का कफन निर्माण का उद्योग अब धीरे-धीरे खराब हो चला है.

"कफन निर्माण में खर्चे बढ़े हैं, लेकिन आमदनी जस की तस बनी हुई है. ऐसे में कफन के कारोबारी परेशान हैं. धागा सूत भी नहीं मिलता है. सरकार से मदद नहीं मिलती है. धागा सूत खुद खरीदते हैं. सरकार यदि सब्सिडी पर धागा सूत देती, तो इन्हें बड़ी राहत हो जाती, अच्छी खासी आमदनी हो जाती, जिससे यह अपने पुश्तैनी धंधे को खुशी-खुशी करते."- अशोक कुमार, शिवचरण लेन के निवासी
गया में सैंकड़ों सालों से कफन बनाने का कारोबार: बिहार के गया जी में कफन बनता है. संभवत: अपवाद को छोड़ दें तो बिहार में गया जी में ही सैकड़ों सालों से कफन का निर्माण होता आ रहा है. गया जी में कफन बनाने वाले परिवार इस पुश्तैनी धंधे को पुश्त दर पुश्त करते चले आ रहे हैं. किसी परिवार में यह पांचवीं पीढ़ी तो किसी की छठी पीढ़ी कफन बनाने का काम कर रही है.

कई बुनकरों ने छोड़ दिया अपना पुश्तैनी काम: गयाजी में कफन पुराने समय से यानी कि सैकड़ों सालों से बनाया जा रहा है. कभी कफन बनने वाले कारोबारी की संख्या 50 से अधिक हुआ करती थी, लेकिन कफन बनाने के काम में कम मुनाफा और ज्यादा मेहनत ने कफन के बुनकरों की कमर तोड़ कर रख दी. कई परिवारों ने कफन बनाने का काम छोड़कर छोटे-मोटे धंधे शुरू कर दिए, जो अब भी इससे जुड़े हैं. उनकी आर्थिक तंगहाली झकझोर देने वाली है.
एक दिन में कितनी होती है कमायी?: गया जी के शिवचरण लेन, पटवा टोली शिव मंदिर समेत कुछ स्थानों पर ही कफन बनाने वाले रह गए हैं. कफन बनाने वाले कारोबारी पूरे परिवार के साथ मिलकर इस पुश्तैनी काम को संभाले हुए हैं. रोज सुबह से धागे बनाना, ताना चढ़ाना, रंगना से लेकर सुखाने और प्रिंट करने तक में पूरा दिन निकल जाता है. कफन बनाने के लिए इतनी मेहनत के एवज में इन्हें बमुश्किल 300 से 400 ही हाथ में आते हैं.

परिवार का खर्च चलाना भी मुश्किल: कफन के कारोबारियों की स्थिति यह है, कि उनका अपना घर चलाना भी मुश्किल हो जाता है, जबकि पूरा परिवार चाहे वह घर की महिला हो या मर्द, कफन बनने में जुटा रहता है. हालांकि, कफन बनाने वाले बुनकर अपनी नई पीढ़ी को कफन के कारोबार से नहीं जोड़ना चाहते. वह भी चाहते हैं कि नई पीढ़ी पढ़ लिख कर नौकरी करें.
बच्चों को पढ़ा लिखाकर बना रहे इंजीनियर: यही वजह है, कि कफन बनाने वाले कई परिवार अपने बच्चों को इंजीनियर भी बना चुके हैं. धीरे-धीरे कफन के कारोबार से लोग हट रहे, किंतु जिनका इसी कारोबार से पहचान है, कमाई का सिर्फ यही जरिया है, उनके लिए इस पेशे से बाहर निकलना काफी मुश्किल है. यही वजह है, कि दर्जन भर से अधिक परिवार कफन बनाने के काम से जुड़े हैं.
रोजाना बनाया जाता है 200 से अधिक कफन: कफन के कारोबारियों का कहना है कि प्रतिदिन 200 से अधिक कफन तैयार करते हैं. पहले हैंडलूम था, अब पावरलूम से भी कफन निर्माण करता हूं. इसमें कारीगर भी लगाने पड़ते हैं, तो उनका खर्च अलग से देना पड़ता है. उनकी मजदूरी जो होती है, वह उन्हें देते हैं. कफन के साइज के अनुसार उसका मूल्य होता है.

250-300 रुपए की कमायी: एक कफन में 4 रुपए तक बच जाता है. यदि रोज बनाए सारे कफन बिक गए तो दिन अच्छा हो जाता है और नहीं बिके तो फिर आर्थिक तंगी की स्थिति बन जाती है. ऐसे में रोज एक तरह से संघर्ष झेलना पड़ता है. कभी-कभी 250-300 रुपए ही कमा पाते हैं, जो कि एक मजदूर से भी कम आमदनी है. एक मजदूर भी आज 500 कमा रहा, लेकिन कफन बनाने वाले उनसे भी कम कमा रहे हैं.
कहां-कहां से आती है डिमांड: गया में बनाया गया कफन बिहार ही नहीं, बल्कि झारखंड, पश्चिम बंगाल से लेकर हरिद्वार तक जाता है. यानी कि गया का कफन का कारोबार काफी फैला हुआ है. यही वजह है, कि देश के कई हिस्सों में गया का कफन जाता है.

ऐसे तैयार होता है कफन: कफन बनाने में काफी मेहनत है. सबसे पहले बुनकर चरखे पर धागा बुनते हैं. फिर धागे को लगाते हैं. इसके बाद उस पर रंग चढ़ाते हैं. इसके बाद उस पर माड़ी लगाना, फिर सुखाना और फिर प्रिंट करना होता है. कई प्रक्रियाओं के बाद कफन बनकर तैयार होता है.

धागों पर सब्सिडी देने की मांग: बुनकार और कारोबारी धागों पर सब्सिडी देने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि यदि धागों पर सब्सिडी दी जाती तो एक अच्छी खासी आमदनी बढ़ जाती. सुरेश प्रसाद बताते हैं, कि कफन की बिक्री में जब तेजी आती है, तब उनके घर का खर्च आराम से चलता है.
अंग्रेजों के जमाने से सप्लाई: गयाजी में कफन बनाने का लंबा इतिहास है. गयाजी में सैकड़ो सालों से यूं कहीं कि पुराने समय से कफ़न बनाने का कार्य हो रहा है. बताया जाता है, कि अंग्रेजों के जमाने में भी गया के बने कफन की सप्लाई होती थी. गया में कफन का निर्माण के पीछे एक मान्यता यह भी है, कि गया मोक्ष भूमि है. गया में पिंडदान से पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त होता है. गया जी का मोक्ष धाम होना कफन बनाने की एक कहानियों में से एक है. यही वजह है, कि पुराने समय से ही गया जी में कफन बनाने का कारोबार चला आ रहा है.
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