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Explainer: बिहार में 150 बच्चों की मौत के लिए क्या वाकई दोषी है लीची? जानें क्या कहता है साइंस

क्या मुजफ्फरपुर की शाही लीची AES का कारण हो सकती है? चमकी बुखार की दहशत और रिसर्च पर विवेक कुमार की रिपोर्ट.

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क्या बच्चों की मौत के लिए दोषी है लीची (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : May 22, 2026 at 3:11 PM IST

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मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर की लीची देश-दुनिया में प्रसिद्ध है. इसके सुगंध और स्वाद के सभी कायल हैं. लेकिन इसी लीची की मिठास में 2019 में मौत का कड़वा स्वाद भी घुल गया था. AES से मुजफ्फरपुर और उसके आस-पास के जिलों में लगभग 150 बच्चों की मौत से हड़कंप मच गया था. ऐसे में हर साल गर्मियों में लीची को लेकर ये सवाल पूछे जाते हैं कि क्या वाकई लीची खाने से एईएस होता है? गर्मी में लीची खानी चाहिए या नहीं? इन तमाम सवालों पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे, लेकिन उससे पहले कुछ केस स्टडी के जरिए उस दिन के खौफनाक मंजर से आपको रुबरु करवाते हैं.

केस स्टडी 1: मुजफ्फरपुर की सुनीता देवी बताती हैं कि करीब सात साल पहले उन्होंने अपनी पांच साल की बेटी निधि को एईएस जैसी गंभीर बीमारी में खो दिया था. वह कहती हैं, उस दिन का मंजर आज भी याद आता है तो दिल कांप उठता है.

"बेटी को तड़पते देख खुद को असहाय महसूस कर रही थी. उसकी मौत ने हमारी जिंदगी बदल दी, उस दर्द को आज तक भूल नहीं पाई हूं."- सुनीता देवी, निधि बच्ची की मां

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बच्चे की मौत पर बिलखती मां (FILE PHOTO)

केस स्टडी 2: मुजफ्फरपुर के साथ ही आस-पास के जिलों में भी मौत का तांडव मचा था. बगहा के रामनगर इलाके के धीरेंद्र मांझी बताते हैं कि मेरी 8 साल की बेटी की भी मौत हो गई थी. उन्होंने कहा कि प्रीति की तबीयत अचानक खराब हो गई थी. तेज बुखार और दस्त हो रहा था. बुखार बढ़ता चला गया.

"आज भी वह दिन मुझे अच्छे से याद है. प्रीति को आनन-फानन में उप स्वास्थ्य केंद्र रामनगर लेकर गए थे. जांच के बाद पता चला कि चमकी बुखा है. उसे जीएमसीएच रेफर कर दिया गया था.:- धीरेंद्र मांझी, प्रीति के पिता

देखें वीडियो (ETV Bharat)

केस स्टडी 3: मुजफ्फरपुर के सुबोध 2019 के उस काले दिन को याद कर आज भी रो पड़ते हैं. सुबोध बताते हैं कि उनके दस साल के बेटे राजू को तेज बुखार आ रहा था. वह लगातार चमक रहा था. आनन-फानन में उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसने दम तोड़ दिया.

"आंगनबाड़ी को पता चला तो बच्चे को लेकर अस्पताल चली गई. वहां से उसे मेडिकल के लिए रेफर कर दिया गया था. शाम को चार बजे मेरे बेटे की मौत हो गई."- सुबोध, राजू के पिता

लीची से मौत! : उस दौरान हुई बच्चों की मौतों को लेकर सभी परिजनों का कहना था कि उनके बच्चों ने लीची खाई थी. हालांकि लीची से मौत की आज तक पुष्टि नहीं हो सकी है. फिर भी लीची के नाम पर डर बना हुआ है.

बच्चों पर मंडराता खतरा: मुजफ्फरपुर और उत्तर बिहार के कुछ जिलों में AES (एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम) के मामले 1990 के दशक के मध्य से दर्ज होने लगे, लेकिन 2010 के बाद इसने गंभीर रूप लेना शुरू किया. हर साल मई-जून में छोटे बच्चों में अचानक न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखने लगे. तेज बुखार, चमकी (दौरे), बेहोशी और शरीर सुन्न पड़ना. कई मामलों में बच्चा अस्पताल पहुंचने के कुछ घंटों के भीतर दम तोड़ देता था.

मुजफ्फरपुर जिले में बीमार बच्चों व मौत का आंकड़ा: 2010 से लेकर 2021 के बीच मुजफ्फरपुर में एईएस ने कई बच्चों की जान ले ली. साल 2010 में कुल 59 बच्चे बीमार पड़े और 24 बच्चों की मौत हो गई. 2011 में 121 विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराए गए, जबकि 45 बच्चों की मौत हो गई. वहीं 2012 में आंकड़ा काफी बढ़ गया. कुल 336 बच्चे बीमार हुए और 120 बच्चों की मौत से जिला दहल उठा.

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2013 में 124 बीमार हुए और 39 बच्चों की मौत हो गई. वहीं 2014 में 701 बीमार पड़े और 90 की मौत हुई. साल 2015 में 72 बच्चों के बीमार पड़ने की खबर आई और 9 की मौत हो गई. 2016 में 72 बीमार पड़े, 4 की मौत हुई. 2017 में 17 बच्चों के बीमार होने के केस आए और 11 की मौत हुई. 2018 में 15 बीमार हुए और 8 की मौत हुई. मुजफ्फरपुर में 2019 में 431 बच्चे बीमार हुए और 111 बच्चों की मौत हुई. 2020 में 43 बीमार हुए वहीं 7 की मौत हुई. 2021 में 39 बच्चों की तबीयत बिगड़ी और 7 की मौत हुई.

वहीं 2022 से लेकर 2026 तक की आंकड़ों की बात करें तो सिर्फ 1 बच्चे की मौत हुई है. 2012 और 2019 में सबसे भयावह मंजर देखने को मिला था. 2019 में मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों में लगभग 150 बच्चों ने दम तोड़ा था. सिर्फ जिले में 111 बच्चे काल कलवित हुए थे.

हर तरफ मची थी चीख पुकार: वरिष्ठ पत्रकार उत्तम कुमार बताते हैं कि शुरुआती वर्षों की स्थिति बेहद दर्दनाक थी. अस्पतालों में भर्ती बच्चों की इलाज के दौरान ही मौत हो जाती थी. डॉक्टरों के सामने बच्चे दम तोड़ देते थे और अस्पताल परिसर परिजनों की चीख-पुकार से गमगीन रहता था.

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अस्पतालों में बेड की हो गई थी कमी (FILE PHOTO)

"उस समय डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को बीमारी का स्पष्ट कारण और इलाज समझ में नहीं आ रहा था. मुजफ्फरपुर में AES ने कई वर्षों तक बच्चों की जान ली, लेकिन 2019 सबसे भयावह साल माना गया. 2019 में उत्तर बिहार, खासकर मुजफ्फरपुर क्षेत्र में AES से 150 से अधिक बच्चों की मौत दर्ज की गई थी, जबकि सैकड़ों बच्चे अस्पतालों में भर्ती हुए."- उत्तम कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

600 से अधिक केस आए थे सामने: केवल 2019 के प्रकोप में 600 से अधिक केस दर्ज होने की जानकारी विभिन्न मेडिकल अध्ययनों और रिपोर्टों में सामने आई. 2019 में श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SKMCH) समेत कई अस्पतालों में बच्चों की भीड़ उमड़ गई थी. कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि अधिकतर बच्चे गरीब परिवारों से थे और अस्पताल देर से पहुंच रहे थे.

2014 के बाद से अध्ययन शुरू: मुजफ्फरपुर विश्व प्रसिद्ध शाही लीची उत्पादन क्षेत्र है. बीमारी के मामले भी उसी समय सामने आते थे, जब लीची का मौसम चरम पर होता था. इसी वजह से पहली बार लोगों के बीच यह चर्चा शुरू हुई कि कहीं लीची इसका कारण तो नहीं है. 2014 के बाद इस दिशा में गंभीर अध्ययन शुरू हुआ.

एक केस-कंट्रोल स्टडी में यह संभावना जताई गई कि कुछ बच्चों में खाली पेट लीची खाने और अचानक न्यूरोलॉजिकल बीमारी के बीच संबंध हो सकता है. शोध में 'MCPG' नामक प्राकृतिक तत्व का उल्लेख किया गया, जो ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकता है, खासकर उन बच्चों में जो पहले से कुपोषित हों या भूखे पेट सोए हों.

जर्नल ऑफ क्लिनिक न्यूट्रिशन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अधिक शुगर और हाई कैलोरी वाले मेटाबॉलिज्म को तेज कर देता है, जिससे शरीर का आंतरिक तापमान बढ़ सकता है. डॉ के विश्वनाथन के मुताबिक, गर्मियों में शरीर को हाइड्रेशन की जरूरत होती है,लेकिन गर्म तासीर वाले फल शरीर में पित्त बढ़ाने की प्रवृत्ति रखते हैं, जिससे डाइजेशन सिस्टम बिगड़ सकता है.

क्या कहते हैं चिकित्सक?: डॉ. पी.एन. वर्मा कहते हैं कि लीची और AES को जोड़ने वाली चर्चा पुरानी जरूर है, लेकिन वैज्ञानिक तौर पर यह साबित नहीं हुआ कि लीची इसका प्रत्यक्ष कारण है.

"2019 के बाद स्वास्थ्य विभाग ने गांव-गांव जागरूकता अभियान चलाया. अभिभावकों को बताया गया कि बच्चों को भूखे पेट नहीं सुलाना है, रात में कुछ मीठा जरूर देना है और लक्षण दिखते ही अस्पताल ले जाना है."- डॉ. पी.एन. वर्मा, चिकित्सक

सदर अस्पताल के प्रभारी अधीक्षक डॉ. ज्ञानेंदु शेखर का कहना है, "लीची खाने से AES होने का कोई स्पष्ट वैज्ञानिक आधार उनके संज्ञान में नहीं है. उनके मुताबिक बीमारी की सबसे अधिक संभावना कुपोषित और रात में भूखे पेट सोने वाले बच्चों में देखी जाती है. ब्लड शुगर का अचानक कम होना और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है."

केंद्र और राज्य ने भेजी थी मेडिकल टीमें: हालांकि, इसके साथ ही वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने यह भी कहा कि इसे सीधे-सीधे 'लीची से होने वाली बीमारी' कहना जल्दबाजी होगी. बाद के शोधों में कई गंभीर सवाल उठे कि अगर सिर्फ लीची वजह होती तो हर लीची खाने वाला बच्चा बीमार क्यों नहीं पड़ता? हर साल समान स्तर पर मौतें क्यों नहीं होतीं? मौतों का आंकड़ा बढ़ने के बाद केंद्र और राज्य स्तर पर मेडिकल टीमें बनाई गईं.

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मौत के पीछ बतायी गई ये वजहें: विशेषज्ञों ने गांवों का दौरा किया, बच्चों की मेडिकल हिस्ट्री जुटाई, ब्लड और अन्य सैंपल की जांच की तथा बीमारी के पैटर्न को समझने की कोशिश की. 2014 के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध हुए, जिनमें कुपोषण, भूखे पेट रहना, कम ब्लड शुगर (हाइपोग्लाइसीमिया), तेज गर्मी और इलाज में देरी जैसे कारणों पर जोर दिया गया.

बिना खाना खाए बच्चों को सोने नहीं देते- अभिभावक: चमकी बुखार से बच्चों की मौत के मामले सामने आने के बाद अभिभावक काफी डरे सहमे हैं और अपनों बच्चों का पूरा ख्याल रखते हैं. खासकर मई जून में बच्चों पर नजर रखी जाती है. अभिभावक मोहम्मद रियाज कहते हैं, गर्मी शुरू होते ही AES बीमारी का डर सताने लगता है. हम लोग बच्चों को बिना खाए सोने नहीं देते हैं. अगर बच्चा खाना नहीं चाहता तो कुछ मीठा जरूर खिला देते हैं.

"इस मौसम में बच्चों का खास ध्यान रखते हैं. लीची खाने से बीमारी नहीं होती, बच्चों की देखभाल जरूरी है. लीची एक फल है, जो अपने सीजन में आता है, लीची खाने से AES होता है, यह बात सही नहीं है. बच्चों की देखभाल जरूरी है."- मोहम्मद रियाज, अभिभावक

यह डर सिर्फ मोहम्मद रियाज के घर का नहीं, बल्कि मुजफ्फरपुर और उत्तर बिहार के हजारों परिवारों की कहानी है. मई-जून का महीना यहां कभी अभिभावकों के लिए दहशत लेकर आता था. अचानक बच्चे को तेज बुखार, शरीर में कंपन, बेहोशी और कुछ घंटों में हालत गंभीर होने की घटनाओं ने पूरे इलाके को झकझोर दिया था.

मीनापुर के रहने वाले लतेश्वर राय बताते हैं कि 2019 के दौरान गांवों में ऐसा माहौल था कि लोग बच्चों को लेकर डरे रहते थे. अचानक किसी घर से खबर आती कि बच्चा बीमार हो गया, फिर अस्पताल और फिर मौत की सूचना पूरे गांव में भय फैला देती थी.

"2019 में मीनापुर इलाके में बहुत बच्चे प्रभावित हुए. लोग डरे रहते थे. लेकिन अब स्थिति बदल गई है. अगर किसी बच्चे में AES जैसा लक्षण दिखता भी है तो अस्पताल में इलाज के बाद वह ठीक हो जाता है."- लतेश्वर राय, अभिभावक

बनाया गया मजबूत प्रोटोकॉल: 2019 के बाद इलाज और बचाव का प्रोटोकॉल मजबूत किया गया. अस्पतालों में ब्लड शुगर की तत्काल जांच, ग्लूकोज प्रबंधन, ICU सुविधा और जागरूकता अभियान बढ़ाए गए. गांवों में अभिभावकों को बताया गया कि बच्चों को रात में खाली पेट न सुलाएं, सोने से पहले कुछ मीठा दें और शुरुआती लक्षण दिखते ही अस्पताल ले जाएं. इससे मृत्यु दर में कमी आने की बात सरकारी और मेडिकल रिपोर्टों में कही गई.

स्वास्थ्य विभाग की एडवाइजरी: 2019 जैसी भयावह तस्वीर अब कम देखने को मिलती है. स्वास्थ्य विभाग की एडवाइजरी, गांवों में जागरूकता, बच्चों को भूखे पेट नहीं सुलाने की सलाह और अस्पतालों में बेहतर प्रबंधन के कारण AES से मौतों और गंभीर मामलों में कमी आने की बात सामने आई है. हालांकि हर साल मई-जून में कुछ मामले अभी भी सामने आते हैं, इसलिए स्वास्थ्य विभाग सतर्कता बरतने की सलाह देता है.

अभिभावकों को सलाह दी जाती है कि बच्चों को रात में खाली पेट न सुलाएं. सोने से पहले भोजन और कुछ मीठा जरूर खिलाना चाहिए. बच्चा अचानक सुस्त पड़े, चमकी आए या बेहोश हो तो तुरंत अस्पताल ले जाएं. तेज गर्मी में बच्चों को लंबे समय तक धूप में न रखें. कुपोषण से बचाने के लिए संतुलित भोजन दें.

इलाज ही सबसे बड़ा बचाव: कुल मिलाकर, मुजफ्फरपुर में AES की कहानी सिर्फ एक बीमारी की नहीं, बल्कि डर, रिसर्च, जागरूकता और चिकित्सा व्यवस्था में बदलाव की कहानी है. लीची को लेकर बहस जरूर हुई, लेकिन डॉक्टर और विशेषज्ञ आज भी यही कहते हैं कि डर नहीं, सही जानकारी और समय पर इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है.

मुजफ्फरपुर की शाही लीची आखिर इतनी खास क्यों?: शाही लीची अपनी मिठास, रस और खुशबू के लिए जानी जाती है. इसका छिलका पतला, गूदा सफेद और स्वाद सामान्य लीची से ज्यादा मीठा माना जाता है. यही वजह है कि इसे 2018 में GI टैग (Geographical Indication) भी मिला, जिससे इसकी अलग पहचान स्थापित हुई.

लीची अर्थव्यवस्था का आधार: मुजफ्फरपुर, मीनापुर, कांटी, बोचहां, मुशहरी और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर इसकी खेती होती है. हजारों किसान और मजदूर इस फसल पर निर्भर रहते हैं. गर्मी के मौसम में लीची यहां सिर्फ फल नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बन जाती है. रेलवे से लेकर ट्रांसपोर्ट कंपनियों तक की गतिविधियां तेज हो जाती हैं. देश के बड़े शहरों में मुजफ्फरपुर की लीची भेजी जाती है और निर्यात की तैयारी भी होती है.

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लीची खाने के फायदे और नुकसान: लीची विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स का बेहतरीन स्रोत है, जो शरीर को कई तरह के लाभ पहुंचाती है. इससे इम्युनिटी बढ़ती है. शरीर को हाइड्रेटेड रखती है. साथ ही बीपी को भी नियंत्रित रखती है. लीची खाने से ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है. वहीं इसके नुसकान भी है. इससे ब्लड शुगर में भारी गिरावट होती है. कुपोषित बच्चे अगर खाली पेट इसका सेवन करें तो मस्तिष्क में सूजन (चमकी बुखार) का खतरा बढ़ता है.

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