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जमीन पर कितनी बदली किसानों की किस्मत? अब कमियां दूर करने के लिए सरकार करेगी समीक्षा

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि FPOs के सामने आ रही चुनौतियों को हल करने के लिए किसानों के साथ मीटिंग की जाएगी.

Farmer Producer Organisation
शिवराज सिंह चौहान. (फाइल) (ANI)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : January 6, 2026 at 7:49 PM IST

8 Min Read
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चंचल मुखर्जी

नई दिल्ली: किसान उत्पादक संगठनों (FPO) की शुरुआत के छह साल बाद, सरकार अब इसकी समीक्षा करने की योजना बना रही है. इसका मुख्य उद्देश्य जमीनी स्तर पर आने वाली कमियों और चुनौतियों की पहचान करना है, ताकि इस योजना को किसानों के प्रति अधिक जवाबदेह और मददगार बनाया जा सके.

इस समीक्षा के तहत, संबंधित अधिकारी विभिन्न राज्यों के किसान समूहों के साथ चर्चा करेंगे ताकि उनके दैनिक कामकाज में आने वाली समस्याओं को समझा जा सके. इस दौरान कृषि मशीनरी का रखरखाव, खाद (उर्वरक) की अनियमित आपूर्ति, बैंक ऋण लेने में आने वाली बाधाएं और कृषि इकाइयां स्थापित करने के लिए उचित मार्गदर्शन की कमी जैसे प्रमुख मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है.

किसानों के साथ चर्चा के दौरान केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, "मैंने तमिलनाडु में किसान उत्पादक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की और विस्तार से चर्चा की. मैंने जमीनी स्तर पर FPOs द्वारा झेली जा रही वास्तविक समस्याओं, उनके सुझावों और अनुभवों को बहुत गंभीरता से सुना है."

चौहान ने आगे कहा, "यह बैठक केवल तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है. यह देश के अन्य हिस्सों में भी FPOs द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों को हल करने के लिए एक प्रभावी व्यवस्था (Mechanism) बनाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है."

किसानों के सामने आने वाली समस्याओं की ओर ध्यान खींचते हुए एक FPO सदस्य संजीव कुमार प्रेमी ने ईटीवी भारत को बताया, "एक FPO समूह में 300 किसान जुड़े होते हैं, लेकिन उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. उदाहरण के लिए, हमारे पास किसानों के इस्तेमाल के लिए मशीनें तो हैं, लेकिन उनका रखरखाव करने वाला कोई नहीं है, और न ही इस बात का कोई रिकॉर्ड है कि कितना डीजल इस्तेमाल हुआ."

उन्होंने आगे कहा, "हालांकि FPO के लिए खाद, बीज और कीटनाशकों को स्टोर करने का लाइसेंस लेने का प्रावधान है, लेकिन सप्लाई अनियमित होने के कारण अक्सर समय पर खाद नहीं मिल पाती. बैंक से कर्ज लेना एक और बड़ी चुनौती है, क्योंकि हमें आसानी से लोन नहीं मिलता. ये लगातार बनी रहने वाली समस्याएं FPO के कामकाज में बाधा डाल रही हैं और इनका व्यवस्थित तरीके से समाधान होना ज़रूरी है."

हरियाणा के एक अन्य FPO सदस्य सतबीर सिंह ने ईटीवी भारत को बताया, "किसानों के बीच जागरूकता की कमी अभी भी एक चिंता का विषय है. कई समस्याएं इसलिए पैदा होती हैं क्योंकि किसान अपने क्षेत्र में कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त सहायता या विभागीय सहयोग नहीं मिलता. यही कारण है कि ऐसी पहल अक्सर केवल कागजों तक ही सीमित रह जाती है."

विशेषज्ञों की राय:

कृषि विशेषज्ञ और किसान धर्मेंद्र मलिक ने ईटीवी भारत को बताया, "देश में लगभग 50,000 FPO हैं, जिनमें से करीब 10,000 सरकार द्वारा बनाए गए हैं. लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन किसानों के पास इसे चलाने के लिए पर्याप्त कौशल नहीं है. सरकार ने जो मॉडल बनाया है, उसमें एजेंसियां 'क्लस्टर आधारित व्यापार संगठनों' (CBBOs) के जरिए FPOs को पेशेवर मदद देती हैं, फिर भी FPOs में इसे चलाने की प्रोफेशनल स्किल की भारी कमी है."

मलिक ने आगे कहा, "CBBOs केवल समूह बनाते हैं और उनका पंजीकरण कराते हैं, लेकिन उसके बाद वे जरूरी ट्रेनिंग या सहायता नहीं देते. लगभग 40-45 प्रतिशत FPOs ने अभी तक रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (RoC) के पास अपने खातों की रिपोर्ट जमा नहीं की है, जिसकी वजह से उन पर जुर्माना लगाया जा रहा है. करीब 40 प्रतिशत FPOs तो चलने की स्थिति में ही नहीं हैं या बंद पड़े हैं. मुश्किल से 10 प्रतिशत FPOs ही सही से काम कर रहे हैं. इन्हें चलाने के लिए स्टार्टअप्स की तरह विशेष कौशल और अतिरिक्त फंड देने की जरूरत है."

कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना ने ईटीवी भारत को बताया, "सरकार ने FPOs के लिए ढांचा तो तैयार कर दिया, लेकिन वह किसानों को इसे प्रभावी ढंग से चलाने के लिए जरूरी प्रोफेशनल स्किल्स सिखाने में विफल रही है. किसानों को केवल दो दिन की ट्रेनिंग दी जाती है, जबकि उन्हें असल में पेशेवर कौशल की जरूरत है. समस्या फंडिंग की नहीं, बल्कि इसे चलाने के हुनर की है."

FPO क्या है?

सरकार के अनुसार, किसान उत्पादक संगठन (FPO) एक सामूहिक शब्द है जिसका उपयोग उन संस्थाओं के लिए किया जाता है जिनके मालिक स्वयं किसान होते हैं. ये संस्थाएं या तो कंपनी अधिनियम के भाग IXA के तहत या संबंधित राज्यों के सहकारी समिति अधिनियम (Cooperative Societies Act) के तहत पंजीकृत (रजिस्टर्ड) होती हैं.

इन संगठनों का गठन इसलिए किया गया है ताकि किसान अपनी सामूहिक शक्ति का लाभ उठा सकें. इसके जरिए वे खेती और उससे जुड़े क्षेत्रों में उत्पादन, खरीदारी और मार्केटिंग के स्तर पर बड़े पैमाने पर लाभ हासिल कर सकते हैं. FPO का मुख्य उद्देश्य प्राथमिक उत्पादक यानी किसानों को एक समूह के रूप में एकजुट करना है, ताकि उनकी मोलभाव करने की शक्ति बढ़े, बाजारों तक उनकी पहुंच आसान हो और उनकी कुल आय में सुधार हो सके.

सरकार की पहल:

  • देश भर में किसान समूहों को मजबूत करने के उद्देश्य से 'केंद्रीय क्षेत्र योजना' (Central Sector Scheme) के तहत लगभग 10,000 FPO पंजीकृत किए गए हैं. इस योजना के तहत, प्रत्येक FPO को वित्तीय और संस्थागत सहायता दी जाती है ताकि वे एक टिकाऊ कृषि-व्यवसाय उद्यम के रूप में कार्य कर सकें.
  • इसमें तीन वर्षों की अवधि के लिए प्रबंधन लागत (मैनेजमेंट कॉस्ट) के रूप में प्रति FPO 18 लाख रुपये, प्रति किसान 2,000 रुपये के हिसाब से अधिकतम 15 लाख रुपये तक का मैचिंग इक्विटी ग्रांट और पात्र ऋण संस्थानों से प्रोजेक्ट लोन के लिए 2 करोड़ रुपये तक की क्रेडिट गारंटी सुविधा शामिल है.
  • राज्य सरकारों के साथ मिलकर केंद्र सरकार FPO को बीज, उर्वरक, कीटनाशक और मंडियों के लिए लाइसेंस प्राप्त करने में भी मदद कर रही है, जिससे वे कृषि बाजारों में अधिक स्वतंत्र रूप से काम कर सकें.
  • बाजार तक पहुंच बढ़ाने के लिए, FPO को 'ई-नाम' (e-NAM), ओएनडीसी (ONDC) और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है.
  • सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता पैदा करने और बाजार से संपर्क (मार्केट लिंकेज) बढ़ाने के लिए साप्ताहिक वेबिनार आयोजित किए जाते हैं.
  • राज्यसभा के आंकड़ों के अनुसार, FPO को समर्थन देने के लिए की गई इन विभिन्न पहलों के परिणामस्वरूप 30 जून, 2025 तक कुल 5,035.5 करोड़ रुपये का टर्नओवर हुआ है.

FPO का प्रभाव:

सरकार के अनुसार, भारत में अधिकतर छोटे या सीमांत किसान हैं, जिनके पास औसतन एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है. अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, खाद और कीटनाशक हासिल करने से लेकर कर्ज लेने तक, उनकी मुश्किलें उत्पादन के चरण से ही शुरू हो जाती हैं. फसल तैयार होने के बाद उसे उचित दाम पर बेचना एक और बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि व्यक्तिगत रूप से किसानों के पास खरीदारों के साथ मोलभाव (Negotiate) करने की आर्थिक शक्ति नहीं होती.

यहीं पर FPO की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. एकजुट होकर, छोटे और सीमांत किसान सामूहिक शक्ति प्राप्त करते हैं. एक FPO के भीतर, सदस्य मिलकर गतिविधियों का प्रबंधन करते हैं और अपने संसाधनों व ज्ञान को साझा करते हैं. इस सहयोग से उन्हें तकनीक, ऋण (लोन), कृषि इनपुट और बाजार के उन साधनों तक बेहतर पहुंच मिलती है, जो उनके व्यवसाय को बढ़ाने और उनकी आय में सुधार करने के लिए आवश्यक हैं.

पंजीकृत FPO :

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 30 जून, 2024 तक देश भर में कुल 8,875 FPO पंजीकृत किए जा चुके हैं। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अनुसार इनकी संख्या इस प्रकार है:

अंडमान और निकोबार (7), आंध्र प्रदेश (449), अरुणाचल प्रदेश (150), असम (427), बिहार (580), छत्तीसगढ़ (213), दादरा नगर हवेली (2), गोवा (8), गुजरात (419), हरियाणा (172), हिमाचल प्रदेश (168), जम्मू और कश्मीर (318), झारखंड (355), कर्नाटक (336), केरल (137), लद्दाख (3), लक्षद्वीप (1), मध्य प्रदेश (622), महाराष्ट्र (579), मणिपुर (76), मेघालय (57), मिजोरम (49), नागालैंड (87), ओडिशा (448), पुडुचेरी (6), पंजाब (136), राजस्थान (533), सिक्किम (13), तमिलनाडु (414), तेलंगाना (302), उत्तर प्रदेश (1,246), उत्तराखंड (150) और पश्चिम बंगाल (353).

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