शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद: उत्तराखंड के संतों की प्रतिक्रिया, जानिए किसने क्या कहा
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर यौन शोषण के आरोप लगे हैं, जिसके बाद उत्तराखंड के संतों ने प्रतिक्रिया दी है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : February 25, 2026 at 1:56 PM IST
किरनकांत शर्मा
देहरादून: उत्तर प्रदेश की धार्मिक और राजनीतिक फिजा इन दिनों एक बड़े विवाद की तपिश से गुजर रही है. ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच माघ मेले से शुरू हुआ मतभेद अब तल्ख रूप लेने लगा है. स्नान व्यवस्था और प्रशासनिक दखल को लेकर उपजा विवाद बयानबाजी के बाद अब गंभीर आपराधिक आरोपों तक पहुंच गया है. हाल ही में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर लगे कथित यौन शोषण के आरोपों ने पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है. पुलिस ने मामले में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ओर से हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की गई है. पूरे विवाद के बाद संत समाज के एक बड़े तबके ने इस पर प्रतिक्रिया दी है.
माघ मेले से शुरू हुआ टकराव: माघ मेले के दौरान स्नान की व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर शंकराचार्य और स्थानीय प्रशासन के बीच मतभेद सामने आए थे. शंकराचार्य पक्ष का कहना था कि परंपराओं और धार्मिक अधिकारों की अनदेखी की जा रही है. प्रशासन व्यवस्था और सुरक्षा का हवाला दे रहा था. यह मतभेद सार्वजनिक मंचों तक पहुंचा. उसके बाद बयानबाजी का दौर शुरू हो गया.
शंकराचार्य की ओर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर दिए गए कुछ बयानों ने राजनीतिक हलकों में भी हलचल मचा दी. इसके बाद प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया. समर्थकों का आरोप है कि इसके बाद से शंकराचार्य के कार्यक्रमों और गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जाने लगी. इतना ही नहीं उनके खिलाफ लगातार किसी ना किसी रूप में कार्यवाही करने की बातें सामने आने लगी थी.
हरिद्वार और बदरीनाथ से है ज्योतिष्पीठ का नाता: ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य का एक आश्रम जोशीमठ में है जबकि दूसरा आश्रम हरिद्वार में है. वे लंबे समय तक दोनों ही आश्रमों में प्रवास करते हैं. शंकराचार्य का उत्तराखंड से गहरा नाता है. यहां के संत उन्हें मानते हैं. अब अविमुक्तेश्वरानंद पर अचानक से लगे इतने गंभीर आरोपों को लेकर संत समाज बेहद चिंतित है. संतों का यह भी कहना है कि शंकराचार्य की तरफ से भी कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जो उन्हें नहीं करना चाहिए था. कुछ संतों का कहना है कि शंकराचार्य को अपने क्रोध पर थोड़ा सा अंकुश लगाना चाहिए.
क्या बोले अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष: अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविन्द्र पुरी कहते हैं इस तरह के आरोप लगना संतों और शंकराचार्य के लिए मृत्यु सामान है. ये बहुत ही दुर्भाग्यपूण है. उन्होंने कहा संत अब बच्चों या बटुकों को भी अपने पास रखने से कतराएंगे. कहीं कोई किसी पर आरोप न लगा दें. ये सब सही नहीं है. वे कहते हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भी अपने शब्दों की मर्यादा लांघी है. शायद उन्हें उसी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.

जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर की प्रतिक्रिया आई सामने: जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर प्रमोदानंद गिरि कहते हैं शंकराचार्य के साथ जो भी कुछ हो रहा है वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. अब यह साफ दिखाई दे रहा है कि सरकार और प्रशासन द्वेष भावना के तहत कार्रवाई कर रहा है. उन्होंने कहा अच्छा होता कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ माघ मेला विवाद के बाद प्रशासन से माफी मंगवा देते, जिससे बात इतनी नहीं बढ़ती.
जिन लोगों की तहरीर पर मुकदमा हुआ है उनके खिलाफ कितने मुकदमे हैं यह जगजाहिर है. इसके साथ ही जिन बच्चों को सामने किया जा रहा है उनके माता-पिता भी इस बात से इनकार कर चुके हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि गाड़ी में उनके साथ दुष्कर्म हुआ. वहां पर तमाम कैमरे लगे हुए हैं. प्रशासन जांच कर सकता है. उन्होंने कहा माघ मेला विवाद के बाद से ही उनके ऊपर आरोप लगाये जा रहे हैं. साफ जाहिर होता है कि शंकराचार्य को फंसाया जा रहा है.
- प्रमोदानंद गिरि, महामंडलेश्वर, जूना अखाड़ा -
जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर प्रमोदानंद गिरि ने आगे कहा कि, मामले में कानून अपना काम करेगा. कोई भी किसी को ऐसे नहीं फंसा सकता. ऐसे मामलों से धर्म की हानि हो रही है. आम श्रद्धालु इन सब घटनाओं से आहत होता है. जब इतने बड़े शंकराचार्य पर इस तरह के आरोप लगाए जाते हैं तो और भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण होता है.

यह बात सही है कि योगी आदित्यनाथ और शंकराचार्य के बीच विवाद हुआ. दोनों ही साधु संतों के बीच के लोग हैं. लिहाजा कम से कम सरकार को इस बात का ज्ञान होना चाहिए था. शंकराचार्य को भी इतनी बड़ी बातें नहीं करनी चाहिए थी. अगर शंकराचार्य पर कोई भी किसी से भी आरोप लगवा सकता है तो हम संतों की औकात ही क्या है.
- प्रमोदानंद गिरि, महामंडलेश्वर, जूना अखाड़ा -
वहीं, भारत साधु समाज के प्रवक्ता, मौजूदा समय में चेतन ज्योति आश्रम के प्रमुख संजय महंत कहते हैं हम बीजेपी के हिंदुत्व को सपोर्ट करते हैं, मगर जो कुछ भी शंकराचार्य के साथ हो रहा है वह ठीक नहीं है. अब प्रशासन बहुत ज्यादा अति कर रहा है, और इससे नुकसान किसी और का नहीं बल्कि धर्म का हो रहा है. अचानक से दुष्कर्म का आरोप लगाना यह साफ बताता है कि सब कुछ जानबूझकर किया जा रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.
जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर भी आये सामने: स्वामी रामेश्वरानंद सरस्वती जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर हैं. वे कहते हैं,
मैं कभी भी राजनीति में नहीं पड़ता, मैं किसी भी राजनेता या पार्टी के लिए कोई बयान नहीं देता. हमारा काम पूजा पाठ और धर्म की बात करना है. हम धर्म की भी वह बात करते हैं जो धर्म के पक्ष में होती है, मगर मैं इस पूरे प्रकरण को बेहद करीब से रोजाना सोशल मीडिया और टीवी के माध्यम से देख रहा हूं. यह हम संतों के लिए सही नहीं है. हमारे प्रमुख संतों के ऊपर इस तरह के आरोप लगाना बहुत ही निंदनीय है. प्रशासन जानबूझकर ऐसी चीज कर रहा है.
योगी आदित्यनाथ और शंकराचार्य दोनों मिलकर बैठकर बात करें. दोनों ही धर्म के लिए कार्य कर रहे हैं. इस पूरे प्रकरण से हिंदू समाज और हिंदू समाज की आस्था को गहरा आघात पहुंच रहा है.
बदरीनाथ पुजारी समिति का बयान: बदरीनाथ धाम के पुजारी समुदाय के प्रमुख या यह कहे डिमरी मंदिर पंचायत समिति के अध्यक्ष आशुतोष डिमरी कहते हैं शंकराचार्य हमारे पूज्य हैं. बदरीनाथ से उनका गहरा नाता है. हमने उन्हें बेहद करीब से देखा है. उनके साथ बीते दिनों जो कुछ भी हुआ वह अत्याचार से कम नहीं है. हमने उन्हें कपाट खोलने की प्रक्रिया में आमंत्रित किया है. हमारे लिए वह पूजनीय है. हमेशा ही पूजनीय रहेंगे. यह सिर्फ शंकराचार्य नहीं बल्कि उनके पद की गरिमा को भी ठेस पहुंचाने जैसा है.

कौन होते हैं शंकराचार्य? हिंदू धर्म में शंकराचार्य का पद अत्यंत प्रतिष्ठित और आध्यात्मिक अधिकार से संपन्न माना जाता है. आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की पुनर्स्थापना और अद्वैत वेदांत के प्रचार प्रसार के लिए देश के चार दिशाओं में चार प्रमुख पीठों की स्थापना की थी. उत्तर में ज्योतिष पीठ, दक्षिण में शृंगेरी, पश्चिम में द्वारका और पूर्व में पुरी की नींव रखी. इन पीठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा जाता है. शंकराचार्य केवल धार्मिक अनुष्ठानों के प्रमुख नहीं होते बल्कि वेद उपनिषद और शास्त्रों के गहन ज्ञाता माने जाते हैं.
वे समाज को दार्शनिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं. हिंदू समाज में उन्हें परंपरा शास्त्र और सनात मूल्यों के संरक्षक के रूप में देखा जाता है. इसी कारण जब इस पद पर आसीन कोई संत किसी विवाद में घिरता है तो उसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं होता बल्कि व्यापक धार्मिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित करता है. वर्तमान विवाद भी इसी वजह से साधारण राजनीतिक मतभेद से आगे बढ़कर आस्था और गरिमा के प्रश्न में बदल गया है. अब देखना होगा कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह प्रकरण किस दिशा में आगे बढ़ता है.
पढे़ं- ज्योतिर्मठ के नरसिंह मंदिर में विराजमान हुई आद्य गुरु शंकराचार्य की गद्दी, होंगे शीतकालीन दर्शन

