शाला संग्रहालय में छात्रों को मिलती है व्यवहारिक और अनुभव आधारित शिक्षा, किताबी चित्रों से आगे हैं वास्तविक ज्ञान
शाला संग्रहालय पढ़ने वाले छात्रों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. बच्चे जीवनशैली, परिवेश और संस्कृति को करीब से समझ रहे हैं.

Published : January 9, 2026 at 6:39 PM IST
रांची से चंदन भट्टाचार्य की रिपोर्ट
रांची: समग्र शिक्षा अभियान के तहत शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर बच्चों के जीवन, परिवेश और संस्कृति से जोड़ने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. इसी सोच से निकली एक महत्वपूर्ण अवधारणा है शाला संग्रहालय. यह स्कूल परिसर में बनाया जाने वाला ऐसा शिक्षण केंद्र है, यहां स्थानीय जीवन, परंपरा, भाषा और पर्यावरण से जुड़ी वस्तुओं के माध्यम से बच्चों को व्यवहारिक और अनुभव आधारित शिक्षा दी जाती है.
क्या है शाला संग्रहालय?
शाला संग्रहालय कोई पारंपरिक संग्रहालय नहीं है, यहां केवल चीजें देखकर आगे बढ़ जाना होता हो. यह बच्चों के लिए जीवंत शिक्षण स्थल है, यहां वे वस्तुओं को देखकर, छूकर और उनसे जुड़ी कहानियों के माध्यम से सीखते हैं. यह संग्रहालय स्थानीय संस्कृति और ज्ञान को कक्षा से जोड़ता है.
समग्र शिक्षा अभियान में भूमिका
समग्र शिक्षा अभियान का मूल उद्देश्य समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है. शाला संग्रहालय इस लक्ष्य को मजबूत करता है, खासकर आदिवासी और बहुभाषी क्षेत्रों में. यह बच्चों को उनकी मातृभाषा, स्थानीय संदर्भ और सामाजिक परिवेश में सीखने का अवसर देता है, जिससे सीखना सहज और प्रभावी बनता है.

बहुभाषी और व्यवहारिक शिक्षा पर जोर
लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन के राष्ट्रीय सलाहकार डॉ. महेंद्र कुमार मिश्रा के अनुसार, शाला संग्रहालय आदिवासी बच्चों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है. उनका कहना है कि किताबों के चित्रों की जगह जब वास्तविक वस्तुओं से अक्षर और शब्द सिखाए जाते हैं, तो बच्चों की समझ कहीं अधिक गहरी होती है. घर में उपयोग होने वाली वस्तुए, खेती और जंगल से जुड़ी चीजें, पारंपरिक औजार, लोककला, वाद्ययंत्र और पर्व त्योहार से जुड़ी सामग्री इन सबके माध्यम से बच्चे भाषा के साथ-साथ इतिहास, पर्यावरण और सामाजिक ज्ञान भी प्राप्त करते हैं.
अन्य राज्यों का अनुभव
ओडिशा और छत्तीसगढ़ में शाला संग्रहालय की अवधारणा पहले ही सफलतापूर्वक लागू की जा चुकी है. ओडिशा के 17 जिलों में आदिवासी बहुल क्षेत्रों के करीब 300 स्कूलों में शाला संग्रहालय बनाए गए हैं जबकि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कुल 45 शाला संग्रहालय सक्रिय हैं, यहां बच्चे व्यवहारिक शिक्षा ले रहे हैं. छत्तीसगढ़ में ब्रिटिशकालीन 61 पुराने स्कूलों को भी शाला संग्रहालय के रूप में विकसित करने की योजना है.

इन जिलों में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम संचालित
बहुभाषी शिक्षा के तहत यह योजना, झारखंड की महत्वाकांक्षी शैक्षणिक योजनाओं में से एक है. इसके तहत राज्य के 8 जिलों- सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी, गुमला, लोहरदगा, लातेहार, दुमका और साहिबगंज में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है. इस कार्यक्रम के अंतर्गत संथाली, मुंडारी, खड़िया, हो और कुड़ुख इन पांच स्थानीय भाषाओं में शिक्षा दी जा रही है.

शाला संग्रहालय की अवधारणा और कार्यप्रणाली की जानकारी
वर्तमान में यह पहल 1000 से अधिक स्कूलों में लागू है, जिससे 31,000 से ज्यादा बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं. योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए इन आठ जिलों में प्रत्येक शाला संग्रहालय की अवधारणा और कार्यप्रणाली की जानकारी दी जा रही है, ताकि विद्यालय स्तर पर इसे अपनाया जा सके और बहुभाषी, व्यवहारिक तथा स्थानीय संदर्भ आधारित शिक्षा को मजबूती मिल सके.
शाला संग्रहालय शिक्षा को जीवन से जोड़ने का सशक्त माध्यम है. यह बच्चों को अपनी भाषा, संस्कृति और परिवेश पर गर्व करना सिखाता है और स्कूल को बोझ नहीं बल्कि सीखने की आनंददायक जगह बनाता है. झारखंड जैसे आदिवासी राज्य में यह मॉडल शिक्षा की दिशा और दशा दोनों बदल सकता है.
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