चाईबासा में 'खूनी हाथी' का तांडव, 22 मौतों के बाद भी रेस्क्यू विफल, ओडिशा ने वापस झारखंड खदेड़ा
चाईबासा में एक दंतैल हाथी लोगों पर कहर बनकर टूटा है. अब तक इसने 22 लोगों की जान ले ली है.

Published : January 10, 2026 at 7:22 PM IST
देवेन्द्र कुमार कुमार की रिपोर्ट
चाईबासा: 'हाथियों से दूरे रहें, रात को बाहर ना निकलें', वन विभाग लगातार लोगों से ऐसे ही अपील कर रहा है. कारण है एक जंगली हाथी, जिसके बड़े-बड़े दांत हैं. झारखंड के चाईबासा जिले में इन दिनों इस दंतैल हाथी ने आतंक मचा रखा है. इसके आतंक से मासूम लोगों की जान जा रही है और वन विभाग और जिला प्रशासन बिल्कुल बेबस नजर आ रहे हैं. इस एक हाथी ने पिछले 10 दिनों में लगभग 22 लोगों की जान ले ली. इसके बाद भी इसका गुस्सा शांत नहीं हुआ है और ये लगातार लोगों पर हमला कर रहा है. वन विभाग ने तीन बार इसे ट्रेंकुलाइज करने का प्रयास किया. लेकिन तीनों ही प्रयास विफल रहा.
जब वन विभाग का ट्रेंकुलाइज करने का भी प्रयास विफल रहा तो विभाग ने शुक्रवार देर शाम घंटों की मशक्कत के बाद हाथी को ओडिशा के जंगलों की ओर खदेड़ दिया. लेकिन पहले से ही मुस्तैद ओडिशा के वन कर्मियों ने सुरक्षा कारणों से हाथी को वापस झारखंड की ओर खदेड़ दिया. देर रात हाथी ने फिर से चाईबासा सीमा में प्रवेश कर गया, जिसके बाद से वन विभाग की टीमें 'सर्च ऑपरेशन' में जुटी हैं. वहीं लोगों में दहशत है.
इस दंतैल हाथी को काबू करने के लिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा और गुजरात से 'तारा रेस्क्यू टीम' को बुलाया गया. टीम ने आधुनिक संसाधनों के साथ मोर्चा संभाला. हालांकि, हाथी की आक्रामकता के आगे विशेषज्ञ भी बेबस नजर आए. रेस्क्यू के दौरान ही हाथी ने टीम के एक विशेषज्ञ पर जानलेवा हमला कर दिया. जिलके बाद गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.
एक जनवरी से लोगों पर हमला कर रहा गुस्सैल हाथी
यह हाथी 1 जनवरी से अब तक कुल 22 लोगों की जान ले चुका है. वन अधिकारियों के मुताबिक, झुंड से बिछड़ने के कारण यह हाथी अत्यंत हिंसक हो गया है. इसकी रफ्तार भी चिंता का विषय है. यह प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय कर रहा है, जिससे इसकी सटीक लोकेशन ट्रैक करना मुश्किल हो रहा है. यह लगातार मूव कर रहा है. और इसके बीच में जो आ रहा है, उस पर यह हमला कर रहा है.
"हाथी के दोबारा झारखंड में प्रवेश की पुष्टि हो चुकी है. हमारी टीम पूरी तरह अलर्ट पर है और उसे ट्रेंकुलाइज (बेहोश) करने का प्रयास फिर से शुरू किया जाएगा. ग्रामीणों को सख्त हिदायत दी गई है कि वे जंगलों की ओर न जाएं और सतर्क रहें." - आदित्य नारायण, डीएफओ, चाईबासा
चाईबासा में इस हाथी का आतंक एक जनवरी से शुरू है. टोंटो प्रखंड के बांडीझारी गांव निवासी 35 वर्षीय मंगल सिंह हेंब्रम, बिरसिंहहातु गांव के कुचु बासा टोली निवासी 55 वर्षीय उर्दूप बहंदा, सदर प्रखंड के रोरो गांव निवासी 57 वर्षीय विष्णु सुंडी को इसी हाथी ने जान से मार डाला. वहीं इसी दिन हाथी के हमले में मानी कुंटिया और सुखमति बहंदा गंभीर रूप से घायल हुए.
एक जनवरी के बाद से यह लगातार हमले कर रहा है. इस हाथी ने नोवामुंडी के बाबरिया गांव 6 जनवरी की रात एक ही परिवार के 5 लोगों की जान ले ली. मृतकों में पति-पत्नी, उनके दो मासूम बच्चे और दूसरे परिवार का एक सदस्य शामिल है. घटना रात करीब 10 बजे की बताई जा रही है, जब सभी लोग अपने-अपने घरों में सो रहे थे. तभी अचानक हाथी ने घर पर हमला कर दिया. इस हमले में परिवार का एक बच्चा किसी तरह जान बचाकर भागने में सफल रहा.
हाथी का आतंक सिर्फ बाबरिया गांव तक सीमित नहीं रहा. बड़ा पासीया गांव में भी हाथी के हमले में एक ग्रामीण की मौत हो गई. वहीं लांपाईसाई गांव में एक अन्य व्यक्ति को हाथी ने रौंदकर मार डाला. इन दोनों गांवों में मृतकों की पहचान अभी तक नहीं हो सकी है. वहीं इसके अलावा हाटगम्हरिया क्षेत्र में भी हाथी के हमले में एक ग्रामीण की मौत हुई.
मदद के लिए वनतारा की टीम से संपर्क
डीएफओ ने बताया कि हाथी बहुत तेजी से अपनी जगह बदल रहा है, जिससे फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की टीमों के लिए लगातार उसे ट्रैक करना एक बड़ी चुनौती बन गया है. उनके अनुसार, हाथी को ट्रेंकुलाइज कर काबू करने की प्रक्रिया में मदद के लिए पश्चिम बंगाल से एक्सपर्ट्स की एक टीम बुलाई गई है. वन्यजीव संरक्षण संगठन ‘वनतारा’ की टीम से भी संपर्क किया गया है, और उनकी टीम के आने के बाद आगे की कार्रवाई तेज की जाएगी.
क्यों आक्रामक है ये हाथी
चाईबासा में इंसानों पर हमला करने वाला हाथी बेहद गुस्से में हैं. विशेषज्ञ इसके अलग-अलग कारण बताते हैं. कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह हाथी अपने झुंड से इसलिए अलग हो गया है क्योंकि यह अभी मस्त अवस्था में है. मस्त के दौरान, हाथी के शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का लेवल बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है, जिससे वह बहुत ज़्यादा गुस्सैल, आक्रामक और खतरनाक हो जाता है. इस हालत में, वह झुंड के दूसरे हाथियों पर भी हमला कर सकता है. इसलिए, उसे झुंड से अलग कर दिया जाता है. हाथियों में मस्त का यह समय दो से तीन महीने तक रहता है. इस समय के बाद, हाथी का व्यवहार नॉर्मल हो जाता है. हालांकि, अगर इस दौरान ऐसे हाथी का सामना किसी मादा हाथी से होता है और वे मेटिंग करते हैं, तो नर हाथी तब भी शांत हो जाता है. दूसरी ओर, कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि हाथी अपने झुंड से अलग हो गया है और वह वापस अपने झुंड में जाना चाहता है, इसीलिए वह ऐसा गुस्सैल व्यवहार कर रहा है.
"हाथी का झुंड पारिवारिक झुंड होता है, जहां मां के साथ उसके बच्चे रहते हैं. बड़े होने के बाद नर अलग हो जाते हैं, लेकिन सभी मादा एक साथ रहती हैं. चाईबासा घटना में शामिल हाथी सब एडल्ट है. झारखंड में यह परिपाटी रही है कि हाथियों को अलग कर दूसरे इलाके में भेज दिया जाए. चाईबासा घटना में शामिल हाथी अपनी मां के झुंड से अलग हो गया है. वह मां के झुंड से मिलना चाहता है. हाथियों के एक झुंड को खदेड़ कर ओडिशा भेजा जा रहा था, इसी में यह सब एडल्ट बिछड़ गया है, जिस कारण यह आक्रामक हो गया है." - प्रोफेसर डीएस श्रीवास्तव, वन्य जीव विशेषज्ञ
हाथी के हमलों में मरने वाले लोगों के आंकड़े भयावह
चाईबासा में इस एक हाथी ने ही कई लोगों को मार डाला. लेकिन झारखंड में हाथियों का आतंक सिर्फ चाईबासा तक ही सीमित नहीं है. झारखंड में हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष में मरने वालों की संख्या बहुत चिंताजनक है. पिछले 18 सालों में, झारखंड में हाथियों के हमलों में लगभग 1270 लोगों की जान चली गई है. इसी दौरान, लगभग 150 हाथियों की भी मौत हुई है.
इंसान की मौत का आंकड़ा
साल 2008 से 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार वन विभाग से मिली जानकारी बताती है कि इन वर्षों में 1251 लोग हाथियों के हाथों मारे गए. साल 2025 में भी ये हादसे नहीं रुके. खासकर सर्दियों के दिनों में हाथियों का आक्रमण और तेज हो जाता है. वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 2019 से 2024 तक हाथियों के हमले में 474 लोगों की मौत हुई. इनमें 2023 में 87, 2022 में 96 और 2021 में सबसे ज्यादा 133 मौतें शामिल हैं. साल 2025 में हाथियों के हमले में 16 से ज्यादा मौतें हुई हैं. वहीं 2026 में ये आंकड़ा फिर से बढ़ रहा है.
550 से 600 की संख्या में हैं हाथी
पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ परितोष उपाध्याय ने बताया कि झारखंड में फिलहाल 550 से 600 के करीब हाथी हैं. इनमें एक ग्रुप पलामू में सक्रिय है, दूसरा झारखंड के दक्षिणी छोटानागपुर में सक्रिय है. पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ के अनुसार हाथी आबादी वाले क्षेत्रों में लगातार आ रहे हैं, इसलिए इंसान और हाथियों का संघर्ष तेज हो गया है. खासकर जंगल से सटे आबादी वाले इलाकों में हाथी दिन भर जंगल में रहते हैं, लेकिन रात के समय आबादी वाले इलाकों में पहुंच जाते हैं.
हाथी आक्रामक क्यों हो जाते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार, हाथी सदियों पुराने पारंपरिक मार्गों पर लौटते हैं, जहां अब मानवीय बस्तियां या विकास कार्य आ गए हैं. ऐसे में रास्ते में आने वाली बाधाओं को वे नष्ट करके आगे बढ़ते हैं. हाथियों का आक्रामक व्यवहार मुख्य रूप से उनके आवासीय क्षेत्र (होम रेंज) की रक्षा करने की प्रवृत्ति से जुड़ा होता है. एक झुंड का होम रेंज आमतौर पर 100 से 800 वर्ग किलोमीटर या इससे अधिक तक हो सकता है. जुलाई से सितंबर के प्रजनन काल में नर हाथियों में हार्मोनल बदलाव (मस्टह अवस्था) के कारण वे विशेष रूप से उग्र हो जाते हैं. इसके अलावा, वनों का क्षरण, खाने-पीने की कमी और जलवायु परिवर्तन से हाथी भोजन व पानी की तलाश में अधिक दूरी तय करते हैं, जिससे मानव बस्तियों के करीब पहुंचकर संघर्ष बढ़ जाता है.
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