झारखंड में राज्यसभा की दूसरी सीट बनी रोचक! क्या रिपीट होगा 2016 के चुनाव वाला एपिसोड, क्या है जानकारों की राय
राज्यसभा की दूसरी सीट के लिए लड़ाई रोचक हो गई है. सवाल है कि क्या 2016 का खेल रिपीट होगा. राजेश कुमार सिंह की रिपोर्ट.

Published : June 4, 2026 at 5:54 AM IST
रांची: झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. 18 जून को चुनाव होना है. शिबू सोरेन के निधन की वजह से 4 अगस्त 2025 से एक सीट खाली है. जबकि भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है. एक प्रत्याशी को जीत के लिए पहली प्राथमिकता के 28 वोट की दरकार है. सत्ताधारी झामुमो (34 ), कांग्रेस (16), राजद (04) और भाकपा माले (02) के पास कुल 56 विधायक हैं. इस लिहाज से एक सीट पर झामुमो की जीत तय है. आंकड़ों के लिहाज से दूसरी सीट भी इंडिया गठबंधन के खाते में जा सकती है. इसके बावजूद कांग्रेस को सहयोगी दलों से समर्थन मांगना पड़ रहा है. ऊपर से भाजपा ने प्रत्याशी देने की बात कहकर चुनाव को दिलचस्प बना दिया है.
इन सवालों ने दूसरी सीट के चुनाव को बनाया रोचक
अब सवाल है कि दूसरी सीट पर किस तरह का समीकरण देखने को मिल सकता है. क्या हो सकती है झामुमो की रणनीति. कांग्रेस प्रत्याशी के सामने कौन कौन सी चुनौतियां आ सकतीं हैं. राजद के 04 और भाकपा माले के 02 विधायकों का स्टैंड क्या हो सकता है. भाजपा आखिर किस आधार पर प्रत्याशी उतारने की बात कर रही है. क्या बाहरी-भीतरी वाला फैक्टर भी देखने को मिल सकता है. इन सवालों ने झारखंड की राजनीतिक तपिश बढ़ा दी है. क्योंकि 2016 के चुनाव में कमोबेश इसी तरह के हालात थे, जब जरुरी आंकड़ा होने के बावजूद झामुमो के बसंत सोरेन चुनाव हार गये थे.

तब झारखंड में रघुवर दास के नेतृत्व वाली भाजपा-एनडीए की सरकार थी. एक सीट पर भाजपा की जीत सुनिश्चित थी तो दूसरी पर झामुमो के नेतृत्व वाले विपक्ष की. फिर भाजपा ने मुख्तार अब्बास नकवी के साथ-साथ महेश पोद्दार को प्रत्याशी बनाया था. दूसरी ओर झामुमो के बसंत सोरेन विपक्ष के प्रत्याशी थे. लेकिन झामुमो के चमरा लिंडा और कांग्रेस के बिट्टू सिंह के अनुपस्थित रहने और दो विधायकों के क्रॉस वोटिंग के कारण बसंत सोरेन चुनाव हार गये थे. इस सीट का फैसला दूसरी वरीयता के वोट से हुआ था.
आंकड़ा होने के बावजूद ऐसे हारे थे बसंत सोरेन
भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी को 29 वोट मिले थे. वहीं, महेश पोद्दार को 26.66 वोट. बसंत सोरेन के पास कुल 30 वोट थे, पर उन्हें 26 वोट ही मिले. कुल 79 विधायकों ने डाले वोट थे. ऐसे में जीत के लिए उम्मीदवार को 27 मतों की जरूरत थी. झामुमो के उम्मीदवार बसंत सोरेन को प्रथम वरीयता के 26 और महेश पोद्दार को 24 मत मिले थे. नियम के तहत मुख्तार अब्बास नकवी को मिले 29 मतों में से दो मत महेश पोद्दार को स्थानांतरित हो गये. इस कारण महेश पोद्दार के वोट की संख्या 26 हो गई थी. इसके बाद दूसरी वरीयता के मतों की गणना हुई. महेश पोद्दार को दूसरी वरीयता के कुल तीन वोट मिले थे. गणना के बाद इनकी संख्या 0.66 आंकी गयी थी. इस आधार पर भाजपा के महेश पोद्दार महज 0.66 वोट के अंतर से बसंत सोरेन को हराने में सफल रहे थे.

वरिष्ठ पत्रकार चंदन मिश्र के मुताबिक इसकी पूरी संभावना है. उनका कहना है कि हालिया माहौल और समीकरण से यही दिख रहा है. दूसरी सीट पर हार-जीत के लिए दूसरी वरीयता के वोट की जरुरत पड़ सकती है. क्योंकि 34 विधायकों वाला झामुमो अपने प्रत्याशी को पहली प्राथमिकता का सिर्फ 28 वोट दिलाने का रिस्क नहीं लेगा. क्योंकि तकनीकी वजहों से एक वोट भी रद्द हो गया तो मुश्किल खड़ी हो जाएगी. ऐसे में झामुमो अपने प्रत्याशी को पहली वरीयता का कम से कम 30 वोट दिलाना चाहेगा. यह संख्या 32 या 34 भी हो सकती है. अगर झामुमो प्रत्याशी के 30 वोट को माइनस कर दिया जाए तो सत्ताधारी दलों के पास पहली वरीयता के (कांग्रेस-16, झामुमो-04, राजद-04 और माले-02) कुल 26 वोट बचेंगे. जबकि जीत के लिए पहली वरीयता के 28 वोट की जरुरत पड़नी है. ऐसी सूरत में खेला होना तय है.
एक सीट पर दावा ठोक रही कांग्रेस की चुनौतियां
वरिष्ठ पत्रकार वैद्यनाथ मिश्र के मुताबिक कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं. हेमंत मानेंगे की नहीं. राजद मानेगा कि नहीं. माले मानेगा की नहीं. तेजस्वी जो कहेंगे वहीं राजद करेगा. बिहार के महागठबंधन में माले है. लेकिन झारखंड में भाकपा माले को सरकार में कुछ नहीं मिला है. अब वे क्या करेंगे मालूम नहीं. ऐसे में सबकुछ हेमंत सोरेन पर निर्भर करता है.
वैद्यनाथ मिश्रा के मुताबिक हेमंत चाहते हैं कि कांग्रेस का उम्मीदवार उनकी पसंद का हो. हेमंत की पहली पसंद राजेश ठाकुर हो सकते हैं. ऊपर से राजेश ठाकुर का कांग्रेस आलाकमान के साथ अच्छे संबंध हैं. वैसे धीरज साहू भी हेमंत सोरेन से मिल चुके हैं. रही बात सुबोधकांत सहाय कि तो इस मामले में वे काफी पीछे हैं. इधर, 6 जून को ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन की बैठक बुलायी है. ऐसे में राजद का साथ मिलने की पूरी उम्मीद है. लेकिन संभावना है कि भाकपा माले चुनाव का ही बहिष्कार कर दे क्योंकि वामपंथी पार्टियों की लड़ाई केरल और बंगाल में कांग्रेस से हुई है. ऐसे में अब हेमंत सोरेन पर ही दोनों सीटें जीताने की जिम्मेदारी है. अगर कुछ पर्दे के पीछे हेमंत सोरेन की साठगांठ हुई हो तस्वीर अलग हो सकती है.

वरिष्ठ पत्रकार चंदन मिश्र के मुताबिक भाजपा आशा लकड़ा या फिर किसी दूसरे आदिवासी चेहरा को खड़ा कर सकती है. अर्जुन मुंडा रिस्क लेना नहीं चाहेंगे क्योंकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव हार चुके हैं. इससे उनकी छवि धूमिल होगी. परिमल नथवाणी अगर आते भी हैं तो बिना हेमंत की गारंटी के नहीं आना चाहेंगे. ऊपर से भाजपा अच्छी तरह समझ रही है कि इंडिया गठबंधन में सबकुछ ठीक नहीं है. असम और बंगाल चुनाव में कांग्रेस के प्रति हेमंत सोरेन की नाराजगी दिख चुकी है. लिहाजा, भाजपा दूसरी सीट पर प्रत्याशी देकर इसका फायदा उठाना चाहेगी.
बाहरी-भीतरी वाला फैक्टर कितना कारगर
वरिष्ठ पत्रकार वैद्यनाथ मिश्र के मुताबिक प्रदेश कांग्रेस सोच समझकर स्थानीय उम्मीदवार की बात कर रही है. क्योंकि प्रदेश नेतृत्व को अंदेशा है कि कहीं आलाकमान बाहर से किसी प्रत्याशी को ना उतार दे. प्रदेश कांग्रेस को यह डर भी है कि कहीं परिमल नथवाणी जैसा कोई प्रत्याशी ना आ जाए. ऐसे में सारा समीकरण बदल जाएगा. इसलिए अपने विधायकों को इमोशनली एकजुट रखने के लिए स्थानीय वाला कार्ड खेला जा रहा है.
दूसरी सीट के लिए झामुमो की रणनीति क्या हो सकती है.
वैद्यनाथ मिश्र के मुताबिक दूसरी सीट पर जीत की चाबी हेमंत सोरेन के पास है. इसी वजह से कांग्रेस द्वारा कई मनुहार के बावजूद हेमंत सोरेन अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. इसकी वजह से शक के बादल गहरे हो रहे हैं.
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