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SC की CEC और चुनाव आयुक्तों को केस से आजीवन छूट देने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने पर सहमति

याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है.

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट (ANI)
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By Sumit Saxena

Published : January 12, 2026 at 2:37 PM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संसद द्वारा बनाए गए कानून के एक प्रावधान की वैधता की जांच करने पर सहमति जताई, जो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) को मुकदमे से जीवन भर की छूट देता है.

लोक प्रहरी की ओर से उसके जनरल सेक्रेटरी एस एन शुक्ला ने यह याचिका दायर की थी, जिस पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने सुनवाई की. बेंच ने याचिका की जांच करने पर सहमति जताई और चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से जवाब मांगा.

याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी. यह प्रावधान सीईसी और ईसी को बेहिसाब असीमित शक्ति देता है जिससे उन्हें अपने पद के घोर दुरुपयोग में किए गए गलत कामों के लिए किसी भी सिविल और यहाँ तक कि आपराधिक कार्यवाही से जीवन भर के लिए पूरी तरह स्थायी छूट मिल जाती है, जो संविधान बनाने वालों ने राष्ट्रपति, राज्यपालों और जजों को भी नहीं दी थी.

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया, 'विवादित प्रावधान लेवल प्लेइंग फील्ड को खराब करता है, क्योंकि यह सीईसी और ईसी को किसी राजनीतिक पार्टी/उम्मीदवार या सरकार के पक्ष या विपक्ष में अपनी स्थिति का गलत इस्तेमाल करने की खुली छूट देता है, जैसा कि हाल ही में आरोप लगाया गया है. साथ ही यह पूरी तरह से बिना आधार के नहीं है, जैसा कि एनजेसी केस (2016) के मुख्य फैसले के पैरा 352-355 में देखा गया है.'

याचिका में दलील दी गई कि इस एक्ट की धारा 16 को रहने नहीं दिया जा सकता और इसे खत्म कर देना चाहिए, क्योंकि एस. कृष्णन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास (1951) मामले में संविधान पीठ ने जो कानून बनाया था, उसके अनुसार कोई भी कानून जो संवैधानिक प्रावधानों को हराने के मकसद से पास किया गया हो, उसे संविधान के साथ धोखा होने के आधार पर चुनौती दी जा सकती है.

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की अपील की गई है, जिसमें कहा गया है कि देश में कानून के शासन को लागू करने और लोकतंत्र के सही कामकाज और भविष्य की रक्षा के लिए यह बहुत जरूरी है. याचिका में कहा गया, 'लगातार हो रहे नुकसान को देखते हुए, विवादित प्रावधान के संचालन और प्रभाव पर रोक लगाने के लिए अंतरिम राहत भी दी जाए.'

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