मैं जद्दनबाई की हवेली हूं, 100 साल से डटकर खड़ी रही, अब कर दी गई ध्वस्त!
भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार जद्दनबाई की बिहार में स्थित 100 साल पुरानी हवेली को गिरा दिया गया. जानें क्या है इतिहास?

Published : February 11, 2026 at 2:57 PM IST
रिपोर्ट: रत्नेश कुमार
गयाजी: 'मैं जद्दनबाई की हवेली हूं..कभी मेरे आंगन में ठुमरी की तान पर राजा-रजवाड़ों की महफिलें सजती थीं, लेकिन आज मैं एक मलबा में तब्दिल हो गयी हूं. अब मैं बस लोगों के जेहन में ही याद रहूंगी.'
जद्दनबाई की हवेली ध्वस्त: यह कहानी उस हवेली की है, जिससे बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त की यादें जुड़ी थीं. जद्दनबाई संजय दत्त की नानी और नगरिस की मां थीं. गयाजी शहर के पंचायती अखाड़ा रोड (डायट परिसर) में स्थित यह हवेली पहले ही जर्जर स्थिति में थी. बची-खुची कसर सरकार ने पूरी कर दी. हवेली को ध्वस्त कर दिया गया.
सांस्कृतिक पहचान थी हवेली: दरअसल, यह खबर सिर्फ हवेली गिरने की नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्मृति टूटने की है. करीब 100 साल पुरानी यह हवेली गया शहर की सांस्कृतिक पहचान थी. हवेली में जद्दनबाई की महफिलें लगती थीं. जद्दनबाई ठुमरी गायन के लिए मशहूर थीं, जो भारतीय सिनेता में पहली महिला संगीतकार के रूप में पहचान बनायी थीं.
प्रशंसकों में नाराजगी: हवेली टूटने से प्रशंसक काफी नाराज हैं. इसे दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं. प्रशंसकों का कहना है कि हम लोगों के द्वारा लगातार इसे संरक्षित करने की मांग की जाती रही किंतु हवेली को संरक्षित नहीं किया गया. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस हवेली को संरक्षित करने के बजाए तोड़कर ध्वस्त कर दिया गया. इस तरह जद्दनबाई से जुड़ी एक बड़ी यादों को ध्वस्त कर दिया गया.
"जद्दनबाई की हवेली कला प्रेमियों की आस्था का केंद्र होती थी. किंतु, इसे तोड़ दिया गया है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. सरकार को इसे संरक्षित करने की पहल करनी चाहिए थी. हवेली का टूटना हम लोगों के लिए सदमे के समान है." -गोपाल पटवा, जद्दनबाई के प्रशंसक

आस्था का केंद्र थी हवेली: गोपाल पटवा कहते हैं कि हवेली को धरोहर के रूप में और जद्दनबाई की यादों को संजोने के रूप में देखते थे, अब उसे धराशायी कर हटा दिया गया. इस हवेली में जद्दनबाई रहा करती थीं. यहीं गया घराने से संगीत की कला में पूरी तरह से निपुण हुईं थीं. इनके अनुसार, यह सिर्फ एक इमारत नहीं बल्कि संगीत प्रेमियों की आस्था का केंद्र था.
जद्दनबाई को यहीं से मिली थी पहचान: गोपाल पटवा के अनुसार यहां गया राज घराने के रसूखदार और राजा-रजवाड़े जुटते थे. गया घराना के माधव लाल कटरियार के सान्निध्य में जद्दनबाई की शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाई मिली थी. उनकी प्रसिद्धि की शुरुआत गया से हुई थी, जो आगे चलकर मुंबई तक पहुंची और भारतीय सिनेमा जगत में अलग पहचान बनायी.

जफर नवाब ने दी थी हवेली: गया घराने से जुड़े पंडित राजेंद्र सिजुआर शास्त्रीय गायकी से संबंध रखते हैं. जद्दनबाई के संदर्भ में काफी जानकार हैं. कहते हैं कि जद्दनबाई को जफर नवाब ने ये हवेली दी थी. जफर नवाब बड़े संगीत प्रेमी थे. जफर की हवेलियों के बीच में जद्दनबाई की हवेली थी. जद्दनबाई का लगाव गया, बनारस से लेकर मुंबई तक रहा.
गया से गहरा रिश्ता था: हालांकि जद्दनबाई के इतिहास में गया से जुड़े तथ्यों को गंभीरता से अब तक रेखांकित नहीं किया गया, लेकिन जानकार कई तथ्यों को उजागर करते हैं. उनका मानना है कि संजय दत्त की नानी का बनारस और कोलकाता के साथ ही बिहार के गया से गहरा रिश्ता रहा है.
1949 जद्दनबाई का निधन: जद्दनबाई का जन्म 1892 में बनारस में हुआ था. बनारस-कोलकाता के साथ ही गया उस दौर में संगीत का बड़ा केंद्र था. इसका प्रमाण शहर में स्थित जद्दनबाई की हवेली भी है. नरगीस की मां जद्दनबाई गया घराना से ताल्लुक रखती थीं. 8 अप्रैल 1949 को जद्दनबाई ने कैंसर से जंग लड़ते हुए दुनिया को अलविदा कहा.
"नरगिस की मां और संजय दत्त की नानी जद्दनबाई का जुड़ाव गया से रहा है. वह गया में काफी समय तक रही. यहीं से उनके शास्त्रीय गायिकी में निखार हुआ और फिर आगे चलकर वह मुंबई को गई और देश की मशहूर पहली महिला संगीतकार और फिल्म अदाकारा भी बनी." -पंडित राजेंद्र सिजुआर, शास्त्रीय गायक

संजय दत्त भी आए थे गया: पंडित राजेंद्र सिजुआर बताते हैं कि संजय दत्त जब भी गया आते हैं तो परिवारिक रिश्ते की चर्चा जरूर करते हैं. 2024 में पिंडदान करने आए तो मीडिया को कहा था कि यहां उनका ननिहाल है. शास्त्रीय गायन विद्या की प्रसिद्ध गायिका जद्दनबाई का यहां गया शहर के डायट परिसर में महल था. उस महल के साथ क्या एग्रीमेंट था, उन्हें यह पता नहीं. किंतु अब सरकार की योजना से बिहार शिक्षा परियोजना की एक बिल्डिंग बन रही है और जद्दनबाई का कहा जाने वाला महल को तोड़ दिया गया है.
"फिल्म अभिनेता संजय दत्त की जो यादें गया से जुड़ी हैं, वह खत्म नहीं हो जाएगी, लेकिन अब उस हवेली को लोग देख नहीं सकेंगे. सिर्फ सुन और सुना सकेंगे. जद्दनबाई संगीत की परंपरा का निर्वहन करने वाली थी और अद्भुत प्रतिभा उनमें थी. शास्त्रीय विद्या की गायिकी जब वह करती थी, तो राजा रजवाड़े उनके कद्रदान हुआ करते थे." -पंडित राजेंद्र सिजुआर, शास्त्रीय गायक
'ऐतिहासिक धरोहर खत्म': पंडित राजेंद्र सिजुआर हवेली गिराने को लेकर कहते हैं कि यदि सरकार चाहती तो इसे संरक्षित किया जा सकता था. हवेली तोड़े जाने से बचाया जा सकता था. किंतु अब संगीत के ऐतिहासिक धरोहर खत्म हो रहे हैं. भारतीय शास्त्रीय संगीत एक अभिजात वर्गीय संगीत है. सरकार के ही कार्यक्रमों में इसे लुप्त किया जा रहा है. कला संस्कृति इस विद्या के बजाय अब लेखन आदि को शामिल कर रही है. कहीं न कहीं अब कला संस्कृति के प्रति जो रूख राजा जमींदार रईसों का हुआ करता था, वह अब नहीं है.
टिकारी स्टेट से जुड़ा है इतिहास: टिकारी स्टेट ने ईश्वरपुर गांव को बस दिया जो कि संगीत विद्या के लिए जाना जाता है. यहां हर घर में संगीत से जुड़े लोग हैं. टिकारी स्टेट ने इस गांव से इतना प्रभावित थे, कि उन्होंने हाथी छोड़ दिया था, कि जितनी जमीन में हाथी चलेगा, वह यहां के लोगों की हुई. यह कभी शान संगीत विद्या की हुआ करती थी. अब धीरे-धीरे इस तरह के विचार-सोच मिटते जा रहे हैं.
देश-विदेश से हवेली देखने आते थे लोग: स्थानीय लोगों और कला के दीवानों के लिए यह गर्व की बात थी कि जद्दन बाई की हवेली मेरे शहर में है. लोग इसे सांस्कृति धरोहर के रूप में देखते थे. देश-विदेश के संगीत प्रेमी आज से पहले तक इस हवेली को देखने आते थे. हलेवी का दीदार करते हुए इसे प्रेरणा के तौर पर पेश करते थे.

संगीत प्रेमी के लिए मंदिर थी हवेली: स्थानीय लोग कहते हैं कि हवेली को देखने आने वाले संगीत प्रेमी इसे मंदिर से कम नहीं मानते थे. जो लोग यहां आते थे, जद्दनबाई की हवेली को प्रणाम करते थे. संगीत सीखने वालों के लिए यह हवेली एक गुरुकुल के समान थी. भले आज यह खंडहर में तब्दिल हो गयी थी, लेकिन लोगों की आस्था इससे जुड़ी हुई थी.
जद्दनबाई की बसती थी आत्मा: जद्दनबाई के निधन के बाद भी लोगों का विश्वास था कि इस हवेली में उनकी आत्मा रहती है, लेकिन हवेली टूटने के बाद मानो ऐसा लगता है, जैसे अब सबकुछ बिखड़ गया है. प्रशंसक गोपाल पटवा कहते हैं कि समय के साथ हवेली की हालत खराब होती गयी. स्थानीय लोगों ने इसे संरक्षित करने की मांग उठायी, लेकिन सरकार ने इसे सहेजने के बजाय गिराने का काम किया.

अब यहां क्या बनेगा?: हवेली को ध्वस्त कर दिया गया है. गया स्थित शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान 'डायट' के प्रिंसपल कहते हैं कि इस हवेली की जगह पर नया एकेडमिक भवन बनेगा. इससे शिक्षकों के प्रशिक्षण में सुविधा होगी. डायट सेंटर में सुविधाओं का विकास होगा.
"सेन्टर ऑफ एक्सिलेंस के तहत हवेली को तोड़ दिया गया है. वही, अब यहां नया एकेडमिक भवन बनेगा. यह डायट परिसर में स्थित था, जहां शिक्षकों को ट्रेनिंग दी जाती है. सरकार के निर्देशानुसार हम लोग कार्य करते हैं." -अजय कुमार शुक्ला, प्रिंसिपल, डायट सेंटर, गया.
यादें रहेंगी, हवेली नहीं: पंडित राजेंद्र सिजुआर हवेली ध्वस्त होने से मायूस हैं. कहते हैं कि गया में अब वह हवेली नहीं रही, जहां ठुमरी की महफिलें सजती थीं. जहां एक कलाकार ने अपनी तकदीर बदली और भारतीय सिनेमा में नाम दर्ज किया, वह अवेली अब यादों में बनकर रह गयी.
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