Save Parks Save Lives: टूटी दीवारें, लोहे के ढांचे और झूले...बच्चों के लिए बनें आफत, जानें बिहार के पार्क कितने सुरक्षित?
आज हम आपको बिहार के पार्कों की स्थिति बताने जा रहे हैं, जो बच्चों के लिए खतरा बने हुए हैं.

Published : May 27, 2026 at 9:33 AM IST
गया/पटना/नालंदा: पार्क का जिक्र होते ही हरियाली, फूल-पौधे जहन में आते हैं और एक अजब-सा सुकून मिलता है. इसलिए लोग परिवार के साथ किसी अच्छे पार्क में गुणवत्तापूर्ण समय बिताना चाहते हैं. लेकिन बिहार के हर जिलों में स्थिति एक जैसी नहीं है. हम आपको राजधानी पटना से लेकर सांस्कृतिक राजधानी गया की तस्वीरों से रु-ब-रू करवाएंगे
गयाजी में पार्कों की स्थिति भयावह: सबसे पहले तस्वीर ऐतिहासिक धार्मिक मोक्ष की नगरी गयाजी शहर की दिखाते हैं. यहां के पार्क का जिक्र होते ही झुके पेड़, टूटे झूले और 11000 केवी के बिजली के झुके खंभे नजर आते हैं, जो बच्चों के साथ ही अन्य लोगों की भी जान पर आफत ला सकते हैं.
कई पार्क लेकिन...: गयाजी शहर में गांधी मैदान, कंडी नवादा रोड व अन्य स्थानों पर पार्क तो हैं, लेकिन वे इतने बड़े और व्यवस्थित नहीं हैं, जहां शहर के लोग अपने परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिता सकें. पार्कों की स्थिति भी खराब है.
झुके पेड़.. टूटे झूले.. : शहर के गांधी मैदान में हाल के विगत सालों में 4 पार्कों के निर्माण के साथ सौंदर्यकरण के काम हुए हैं. हालांकि वो भी काफी नहीं हैं. जिन पार्कों का निर्माण हुआ है वे भी उच्च सुविधाओं और मनोरंजन समेत अच्छे वातावरण वाले या फिर उत्कृष्ट पार्क नहीं कहे जा सकते हैं. इन पार्कों में मौजूद झुके पेड़ , बच्चों के खेलने किए टूटे झूले खतरा पैदा कर रहे हैं.
गांधी मैदान चिल्ड्रेन पार्क: बात सबसे पहले गांधी मैदान के चिल्ड्रन पार्क की करते हैं. ये पार्क शहर के हृदय में बसा है. प्रतिदिन 1000 से 1500 लोग आते हैं. खास कर मॉर्निंग वॉक के लिए गांधी मैदान में आने वाले लोग कुछ पल यहां गुजारते हैं, क्योंकि यहां पार्क में ओपन जिम के कुछ उपकरण लगे हुए हैं.
11000 केवी के बिजली के झुके खंभे : खासकर महिलाएं इस पर फिटनेस के लिए ऐक्टिविटी करती हैं. उनके साथ बच्चे भी होते हैं. मगर यहां सबसे बड़ा खतरा झुके पेड़ नहीं बल्कि 11000 केवी के बिजली के झुके खंभे हैं. 11000 केवी के तार को जमीन पर गिरने से रोकने के लिए लगे तार की लटकती जालियां हैं जो कभी भी बड़ी घटना पैदा कर सकते हैं.

हल्की आंधी में गिर जाते हैं पेड़: गांधी मैदान के चिल्ड्रन पार्क समेत तीनों पार्कों में हल्की आंधी या बारिश में ही अक्सर पेड़ गिरते रहते हैं. असल में यहां जिस जगह पर पार्क का निर्माण हुआ है, वहां पर पहले से शिरीष का पेड़ है. इस पेड़ की जड़ें ज्यादा मजबूत नहीं मानी जाती हैं.
कमजोर जड़ों वाले पेड़: अक्सर यहां विशाल पेड़ जड़ से गिर जाते हैं. हालांकि यहां अभी कोई बड़ी घटना नहीं हुई है, जिसमें लोगों को नुकसान पहुंचा हो. चिल्ड्रेन पार्क में सबसे ज्यादा खतरा झुकते तार और झुके खंभे हैं.
सजावटी और फूलदार पौधे नहीं: दरअसल गयाजी नगर निगम के 53 वार्डों में पार्क के नाम पर 50 से अधिक पार्क बताए जाते हैं. हालांकि इन पार्कों में एक भी पार्क ऐसा नहीं है जो क्षेत्रफल में एक एकड़ में हो, अधिकतर पार्क जो हैं वो 4-5 कट्ठा भूमि पर ही निर्मित हैं. इनमें अधिकतर ऐसे हैं जहां हरियाली नहीं है. यानि कि पेड़ पौधे और सजावटी फूलदार पौधे नहीं हैं.
पार्क नहीं ग्रीन एरिया- स्थानीय : स्थानीय निवासी शमशेर खान कहते हैं, गयाजी के जितने पार्क हैं वो पार्क के श्रेणी में तो नहीं आते हैं . हां अलबत्ता उसे हम लोग ग्रीन एरिया कह सकते हैं. गांधी मैदान में भी पार्क के नाम पर तीन-चार पार्क के निर्माण हुए हैं, लेकिन इसे भी पार्क नहीं कहा जा सकता बल्कि एक ग्रीन एरिया है, जहां सुबह-शाम आप उसके पाथवे पर टहल सकते हैं.
"छोटे बच्चों के लिए खिलौने के नाम पर दो तीन झूले और दो तीन सरकने वाले सामान लगे हैं. वहीं बड़ों के लिए ओपन जिम की तरह कुछ उपकरण लगे हुए हैं. अगर किसी से भी आप पूछेंगे कि क्या ये पार्क है, तो वे यही कहेगा नहीं, ये ग्रीन एरिया हो सकता है."- शमशेर खान, स्थानीय व्यक्ति
गया में कहीं नहीं अच्छा पार्क- वार्ड पार्षद: शहर के वार्ड नंबर 32 के वार्ड पार्षद गजेंद्र सिंह कहते हैं, पार्क का जो एक स्वरूप होना चाहिए, जैसे कि फाउंटेन, फूल, बच्चों के खेलने के लिए झूले, खाने की दुकानें, उस स्वरूप वाला पार्क गया जी शहर में कहीं पर आपको देखने को नहीं मिलेगा. उन्होंने नगर निगम के माध्यम से सरकार से ब्रह्मयोनि पहाड़ी पर हिल पार्क का निर्माण कराने की मांग की है.

ब्रह्मयोनि पहाड़ी पर हिल पार्क बनाने की मांग: उन्होंने कहा ब्रह्मयोनि पहाड़ी पर पार्क बनने से आपको प्राकृतिक नजारा देखने को मिलेगा. 3 x 1.5 किलोमीटर का वहां पर स्पेस है. वहां पर अगर हिल पार्क बना दिया जाए तो गया जी का सबसे बड़ा आय का स्रोत होगा और स्वास्थ्य के लिए भी काफी फायदेमंद होगा. बिहार सरकार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से भी इसकी मांग करते हैं कि यहां पर हिल पार्क का निर्माण हो.
"गांधी मैदान में चिल्ड्रन पार्क बनाए गए हैं. हालांकि वो पार्क के एसओपी के मानकों को पूरा नहीं करते हैं. सुविधाएं भी नहीं हैं और झुके खंभे पेड़ खतरे को दावत देते हैं. यहां पार्कों में कई तरह के काम करने की आवश्यकता है. अब तो वन विभाग के मातहत पार्क हुए हैं तो उन्हें शहर को अच्छे पार्क देने चाहिए."- गजेंद्र सिंह, वार्ड पार्षद
पार्क से ज्यादा सूखे मैदान: सामाजिक कार्यकर्ता लालजी प्रसाद कहते हैं कि यहां पार्क नहीं है. ज्यादातर पार्क तो सूखे हैं, जहां पेड़ पौधे नहीं हैं. बैकुंठ शुक्ल पार्क में गेट निर्माण और मिट्टी भरने का कार्य हो रहा है, लेकिन उसमें भी वैसे कोई सामान आवंटित नहीं हुए हैं जो एक पार्क में होने चाहिए.
"गया जी में जितने पार्क हैं, उनमें अधिकतर की हालत ठीक नहीं है, व्यवस्था ठीक नहीं होने की वजह से वह अपने अस्तित्व को खो रहे हैं. गया पटना रोड में एक चिल्ड्रन पार्क का भी निर्माण करोड़ों रुपए की लागत से हुआ था. 2019-20 में पूर्व मंत्री अश्विनी चौबे ने उसका उद्घाटन किया था, लेकिन उसकी भी स्थिति अब ठीक नहीं है."-लालजी प्रसाद ,सामाजिक कार्यकर्ता
नशेड़ियों का अड्डा बना आजाद पार्क: लालजी प्रसाद कहते हैं कि आजाद पार्क की भौगोलिक और ऐतिहासिक स्थिति को देखते हुए तो इस पार्क को मॉडल पार्क होना चाहिए था, मगर ये पार्क एक तरह से नशेड़ियों जुआरियों का अड्डा हो गया है. किसी भी समय आप जाएंगे तो वहां पर लोग ताश खेलते, गांजा पीते मिल जाएंगे. महिलाओं की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं है.
गेट पर ही शौचालय का निर्माण: कुछ समय पहले नगर निगम ने मुख्य द्वार पर ही शौचालय बना दिया है. हालांकि स्थानीय वार्ड पार्षद ने अपनी पहल पर आजाद पार्क के एक छोटे से एरिया को घेरकर उसमें पेड़ पौधे लगाए हैं, जहां पर गर्मी में लोग बैठ कर ठंडी हवा खाते हैं. लेकिन वो ज्यादा देर नहीं बैठ सकते हैं क्योंकि इतनी बदबू आती है कि लोग वहां से उठ कर चले जाते हैं.
बच्चे नहीं करते इंजॉय: चिल्ड्रन पार्क के एक गार्ड सुरेंद्र कुमार कहते हैं कि अभी पौधे व्यवस्थित ढंग से लगाए गए हैं. चिल्ड्रन पार्क तो है लेकिन यहां अभी बच्चों के लिए बहुत से खेलने के सामान नहीं हैं. हम लोगों ने इसके लिए अपने अधिकारियों को अगवत कराया है.

"यहां जो बच्चे आते हैं वो दोबारा नहीं आते हैं या फिर वो यहां आने के बाद समय नहीं बिताते हैं. वे कुछ देरी में ही निकल जाते हैं. इसलिए यहां बच्चों के खेलने के सामानों की और जरूरत है.इस पार्क में पौधे और सुगंधित फूलों की संख्या बढ़ाई गई है."- सुरेंद्र कुमार, पार्क के गार्ड
खराब हो गई है स्थिति: आजाद पार्क में बैठे एक व्यक्ति दिलीप कुमार कहते हैं कि पास की दुकान में आए थे, इसलिए यहां पर कुछ देर बैठ गए. वो कहते हैं कि हम तो इस पार्क को बचपन से देखते आ रहे हैं. पहले कुछ स्थिति ठीक थी, लेकिन अब एक दम खराब है.
"यहां पर अच्छे-अच्छे सुगंधित फूलों के पौधे लगे हुए थे, अब नहीं हैं. पूरे शहर में आप कहीं चले जाएं आपको ऐसा कोई पार्क नहीं मिलेगा जहां पर आप अपने परिवार बच्चों के साथ बैठकर समय बिता पाएं . अगर आपको पार्क घूमना है तो आपको बोधगया जाना होगा. कुछ हद तक वहां अच्छे पार्क हैं. आजाद पार्क तो एक पेशाब घर बन गया है."- दिलीप कुमार, स्थानीय निवासी
ख़ालिश पार्क की भी स्थिति खराब: शहर के ग्वाल बीघा में बाराचट्टी के पहले विधायक और स्वतंत्रता सेनानी जगेश्वर प्रसाद खालिश के नाम पर एक पार्क है. लगभग 5 कट्ठा भूमि पर बने इस पार्क का नाम खालिश है. यहां कुछ सुविधा नहीं है, ना ही यहां शौचालय है और ना ही पीने के पानी की व्यवस्था है.
बच्चों और महिलाओं ने बनायी दूरी: यहां पर जुए खेलने वालों का मजमा लगा होता है. इस पार्क में ना पेड़ हैं और ना ही पौधे हैं. जगेश्वर प्रसाद खालिश की एक प्रतिमा भी नहीं लगी है. यहां पर ना तो बच्चे जाते हैं और ना ही महिलाएं.
क्या कहते हैं मेयर: नगर निगम के मेयर गणेश पासवान कहते हैं कि पहले के अनुसार बहुत से कार्य पार्क को लेकर हुए हैं, लेकिन अब सरकार का एक आदेश आया है कि पार्कों का निर्माण या उसके सौंदर्यीकरण का कार्य वन विभाग के मातहत होगा. हम लोगों ने पहले की तुलना में काम किया है, गयाजी पटना रोड पर स्थित कंडी के पास चिल्ड्रन पार्क का निर्माण भी कराया है, जो कमी है या जहां पर देख रेख की कमी है , वहां पर अधिकारियों से निरीक्षण करा कर आगे की करवाई करेंगे. जहां तक झुके पेड़ का मामला है वो वन विभाग देखेगा और बिजली के खंभों के संबंध में बिजली विभाग के अधिकारियों से बात की जाएगी.
"गांधी मैदान में पार्क और ओपन जिम एक साथ बनाया गया है, जितनी जगह है उसके अनुसार कार्य कराए गए हैं. लेकिन जिस तरह के पार्क का कॉन्सेप्ट होना चाहिए वो सरकार के वन विभाग के माध्यम से ही हो सकता है. शहर के कई चौक चौराहों पर फाउंटेन निगम की ओर से बनाए गए हैं."- गणेश पासवान, मेयर, गयाजी नगर निगम
जयप्रकाश उद्यान में टला बड़ा हादसा: गयाजी शहर की तुलना में बोधगया में बड़े पार्कों की संख्या ज्यादा है, लेकिन यहां के भी सबसे बड़े पार्क जयप्रकाश उद्यान में झुके पेड़ समस्याओं का एक बड़ा कारण हैं. विगत 13 मई की शाम को बोधगया में एक बड़ा हादसा होते होते बचा है. महाबोधि मंदिर के जाने वाली मार्ग पर विशाल पेड़ की टहनी टूट कर अचानक गिर गई, जिसके कारण दुकानदार और यात्री बाल बाल बच गए.

पेड़ गिरने से बिजली होती है बाधित: गयाजी या बोधगया में अधिकतर पार्कों या उसकी दीवारों से सटे बिजली के खंभे गुजरे हैं, जिसकी वजह से जब भी पेड़ गिरते हैं बिजली के तार उससे प्रभावित होते हैं. पेड़ गिरने की वजह से बिजली के खंभे और तार भी टूट कर गिरते हैं, इससे बड़ा खतरा भी होने की संभावना बढ़ जाती है, घंटों बिजली भी गायब होती है.
नालंदा में पार्कों की स्थिति: गया की तरह ही नालंदा में भी पार्कों की स्थिति भयावह बनी हुई है. नगर निगम ने 2010-11 के बजट में 8 जगहों पर पार्क बनाने की महत्वाकांक्षी योजना पास की थी. जिनमें वन विभाग को सौपी गई 5 पार्कों की सूरत व सीरत दोनों बदल गई लेकिन डर बनी हुई है. जबकि 3 पार्क जो स्मार्ट सिटी के तहत है उसकी बदहाली और खौफनाक स्थिति प्रशासन के दावों की पोल खोल रही है.
पार्क बना तबेला: शहर के टिकुलीपर मुहल्ले में 20 लाख रुपए की लागत से एक पार्क का निर्माण शुरू हुआ था. 19 अगस्त 2010 को तत्कालीन प्रभारी मंत्री नरेंद्र नारायण यादव ने इसका शिलान्यास भी किया था. सोच यह थी कि घनी आबादी वाले इस इलाके के लोग यहां योग और व्यायाम करेंगे. लेकिन आज हकीकत यह है कि काम के नाम पर सिर्फ बाउंड्रीवाल और तालाब के चारों ओर एक पैदल पथ बनाया गया. जो पार्क का पूरा मैदान जंगल और झाड़ियों से भर चुका है. काम अधूरा छूटने के कारण आसपास के लोगों ने इसे अपनी निजी संपत्ति समझकर यहां अपने मवेशी (गाय-भैंस) बांधना शुरू कर दिया है.

"पार्क के नाम पर इसे 5-6 साल पहले घेरकर छोड़ दिया गया. अब यह पूरा कचरे, जंगल और झाड़ियों से भरा है. यहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगता है और शराब की खाली बोतलें पड़ी रहती हैं."- अनिल यादव , टिकुलीपर मोहल्ला निवासी
"अगर कोई बाहरी व्यक्ति इस बदहाली पर सवाल पूछता है, तो उसे डरा-धमका कर भगा दिया जाता है. इस पार्क का काम किस ठेकेदार और किस एजेंसी (राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन कार्यक्रम या स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन) के विवाद के कारण रुका है, इसका जवाब न तो विभाग के पास है और न ही कार्यपालक अभियंता के पास है."- सुरेश गोप,टिकुलीपर मोहल्ला निवासी
SOP के तहत सारी सुविधाएं: अम्बेर मोहल्ले में स्थित का चिल्ड्रेन पार्क (लागत 20 लाख) बनकर तैयार तो हो गया है. जिसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया है. पार्कों के SOP के तहत सारी सुविधाएं मिल रही है. पहले यहां घूमने के लिए पैसे नहीं लगते थे, लेकिन अब बच्चों के लिए 5 रुपए किराया और बड़ों का 10 रुपए किराया शुरुआत की गई है. साफ़ सफ़ाई, पेयजल, शौचालय एवं पेड़ पौधे पूरी तरह से संरक्षित हैं. जिसकी जनकारी पार्क के मैनेजर अजित कुमार ने दी. यहां सुबह शाम 100 से दो सौ लोग घूमने आते हैं.
तीन लोगों के टूट गए थे पैर: बिहार शरीफ शहर का सुभाष पार्क में रोज 500 से 600 लोग जबकि शुक्रवार-रविवार को 1000 तक आते हैं. इस पार्क का दृश्य मेले की तरह रहता है. यहां टिकट का दाम भी 10 से बढ़ाकर 20 रुपए कर दिया गया है. 22 कर्मचारी यहां तैनात हैं, लेकिन पार्क में जाने वालों की जान का ख़तरा सताते रहता है. यहां के माली राकेश कुमार और हरि जमादार बताते हैं कि पार्क के अंदर मौजूद पुरानी पानी की टंकी आंधी-तूफान में हिलने लगती है. साथ ही, पुराने और भारी पेड़ों की लटकती डालियां कभी भी गिर सकती हैं.

"कुछ समय पहले आंधी में एक पेड़ दीवार तोड़ता हुआ गिर गया था. उसमें तीन लोग दब गए थे और उनके पैर टूट गए थे. महीनों इलाज के बाद वे ठीक हुए. आज भी आंधी आने पर उस पानी की टंकी के पास जाने में डर लगता है कि कहीं वह भरभरा कर गिर न जाए."- हरि, जमादार, सुभाष पार्क
मामू-भगना रोड स्थित 'फिटनेस पार्क' के प्रभारी बृजेश कुमार बताते हैं कि यह पार्क शहर से थोड़ा बाहर है. यहां आने-जाने के लिए ऑटो या टोटो वाले मनमाना किराया मांगते हैं. सबसे बड़ी समस्या बाहर की खराब स्ट्रीट लाइट्स हैं, जिसके कारण लोग रात के समय यहां आने से कतराते हैं.
"फिटनेस पार्क SOP के तहत पूरी तरह से पूर्ण है. यहां 100 लोग घूमने के लिए प्रतिदिन आते जाते हैं. इस पार्क में प्रवेश करने का प्रति व्यक्ति किराया 40 रुपए है."- बृजेश कुमार,'फिटनेस पार्क' के प्रभारी
कर्मचारियों की तनख्वाह काफी कम: वहीं, 'अस्पताल चौक स्थित श्रम कल्याण केंद्र के मैदान में स्थित गोल्डन पार्क' के माली वीरेंद्र प्रसाद बताते हैं, उनका 14,000 रुपए की तनख्वाह में गुजारा नहीं होता है. इस पार्क की हालात यह है, कि बड़े-बड़े लड़के आकर झूलों पर बैठ जाते हैं, जिससे झूले टूट गए हैं.
"शाम ढलते ही यहां असामाजिक लड़के आकर नशा करते हैं. मना करने पर भी वे नहीं सुनते हैं."- वीरेंद्र प्रसाद, गोल्डन पार्क के माली
अधिकारियों ने क्या कहा?: वहीं, इस संबंध में बिहार शरीफ के नगर आयुक्त कुमार निशांत विवेक ने कहा, "मुझे इस संबंध में जानकारी नहीं है. मलमास मेले की व्यस्तता के कारण बाद में पता कर बताता हूं." वहीं वन विभाग के अधिकारी राजकुमार एस ने कहा, "हमारे अधीन जितनी पार्क हैं, वह सभी SOP के गाइडलाइंस के तहत ही हैं. जर्जर जल मीनार और झुके पेड़ों की जांच कर हटा दिए जाएंगे."
पटना में पार्कों की स्थिति: गया और नालंदा की तुलना में पटना के पार्क बेहचर स्थिति में हैं. हां छोटे पार्क होने का लोगों को मलाल जरूर है. राजधानी में लगभग 116 पार्क मौजूद हैं, जिनमें से 115 पार्क पटना पार्क प्रमंडल के अधीन हैं, जबकि एक पार्क का संचालन पटना नगर निगम की ओर से किया जा रहा है. इसके अलावा शहर के कई इलाकों में नए पार्क विकसित किए जा रहे हैं और जहां-जहां खाली सरकारी जमीन उपलब्ध है, वहां पार्क निर्माण की योजना पर काम चल रहा है. बदलते शहरी माहौल में ये पार्क अब सिर्फ हरियाली का केंद्र नहीं, बल्कि लोगों की सेहत, स्वच्छ हवा और सामाजिक जीवन की नई पहचान बनते जा रहे हैं.
प्रमंडल वन विभाग के अधीन पार्क: साल 2021 में राज्य सरकार के संकल्प के बाद बिहार के सभी 38 जिलों के शहरी निकाय क्षेत्रों के पार्कों की जिम्मेदारी पार्क प्रमंडल को सौंप दी गई थी. इसके बाद हर जिले के नाम से पार्क प्रमंडल का गठन किया गया. नगर निगम और शहरी निकायों का काम पार्कों को विकसित करना है, जबकि उनकी देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी पार्क प्रमंडल निभाता है. पार्क प्रमंडल वन विभाग के अधीन कार्य करता है और यहां प्रशिक्षित वन कर्मियों की तैनाती की जाती है, जो पौधों की देखभाल, घास की नियमित कटाई, पेड़ों की छंटाई और पार्क की समग्र स्वच्छता सुनिश्चित करते हैं.

"पटना को पार्कों का भी शहर कहा जाता है और यह पार्क अच्छी स्थिति में है. हालांकि कुछ-कुछ कोऑपरेटिव मोहल्ले में अभी भी खाली जगह बचे हुए हैं जहां प्लेग्राउंड बनाया जा सकता है क्योंकि आउटडोर गेम्स के लिए पटना शहर में खेल मैदान की काफी कमी है. पार्क में प्रवेश के लिए शुल्क निर्धारित है और मंथली पास है जिसके कारण अवांछित तत्व पार्क में नहीं जाते हैं.."- मृत्युंजय माणी,वन्य प्राणी परिषद के पूर्व सदस्य और पर्यावरणविद्
खेल मैदान की खल रही कमी: हालांकि शहर के पार्कों को लेकर एक बड़ी चिंता अब भी बनी हुई है. इन पार्कों में बच्चों के लिए आउटडोर गेम्स के बड़े प्लेग्राउंड नहीं हैं. फुटबॉल, क्रिकेट और वॉलीबॉल जैसे खेलों के लिए पर्याप्त मैदान नहीं होने से बच्चों और युवाओं को परेशानी होती है. तेजी से कंक्रीट में बदलते शहर में खेल मैदानों की कमी लगातार महसूस की जा रही है. ऐसे में कई लोग चाहते हैं कि खाली जमीनों पर सिर्फ छोटे पार्क नहीं, बल्कि बड़े खेल मैदान भी विकसित किए जाएं.
अपर नगर आयुक्त का बयान: वहीं पटना नगर निगम के अपर नगर आयुक्त कृष्ण स्वरूप ने बताया कि साल 2021 के सरकार की संकल्प के बाद नगर निगम ने सभी पार्क को पटना पार्क प्रमंडल को सौंप दिया. नगर निगम का काम है कि क्षेत्र में पार्क को अच्छे से डेवलप करके उसे देखरेख के लिए पार्क प्रमंडल को सौंपने क्योंकि वहां प्रशिक्षित कर्मी उसकी अच्छी देखभाल करते हैं. अभी पटना नगर निगम की ओर से सिर्फ वार्ड नंबर 38 में एक पार्क है जो संचालित किया जा रहा है. इसके अलावा शहरी क्षेत्र बढ़ रहा है तो कई सारे जगह है जहां जगह चिन्हित किए गए हैं और कुछ जगहों पर पार्क डेवलप करने का काम भी नगर निगम में शुरू कर दिया है.

"नगर निगम लोगों को टहलने और शुद्ध हवा में रहने का मौका मिले इसके लिए पार्क डेवलप करता है और फिर इसे नियम के तहत पार्क प्रमंडल को सौंप देता है. कुछ पार्क पुल निर्माण निगम और पथ निर्माण निगम के अंतर्गत भी बनाए जा रहे हैं. पटना के जेपी गंगा पथ से सटे क्षेत्र में यह पार्क डेवलप किया जा रहे हैं, जहां तक हर मोहल्ले के पार्क की बात है तो यह पटना पार्क प्रमंडल के जिम्मे है. क्षेत्रफल की दृष्टि से सामान्य तौर पर 5000 स्क्वायर फीट से 10000 स्क्वायर फीट के पार्क अधिक संख्या में है. मॉर्निंग वॉक करने वालों के लिए पार्क में प्रवेश निशुल्क होता है."- कृष्ण स्वरूप, अपर नगर आयुक्त,नगर निगम पटना
पार्क में फायरिंग: भले ही पटना के पार्क बेहतर हों लेकिन सुरक्षा मानकों को लेकर सवाल उठते रहे हैं. जुलाई 2025 में कंकड़बाग पार्क में हुई खुलेआम फायरिंग से भगदड़ मच गई थी. बदमाशों से 4 से 5 राउंड यहां फायरिंग की थी. मौके से पुलिस ने कट्टा बरामद किया गया था.
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मुजफ्फरपुर में 4 पार्क: मुजफ्फरपुर में 4 पार्क हैं. कंपनी बाग रोड, सुतापट्टी में मुजफ्फरपुर पार्क, मिथनपुरा, क्लब रोड में जुब्बा सहनी पार्क, कंपनीबाग, एसपी ऑफिस के पास सिटी पार्क और जूरन छपरा मेन रोड पर भारत माता नमन सतहल पार्क ये सभी पार्क नजर निगम के अधीन हैं.
बेतिया में कुल 5 पार्क: बेतिया की बात करें तो यहां कुल 5 पार्क हैं. नजरबाग पार्क, ऑफिसर पार्क, उतरवारी पार्क, लोरिया पार्क और मझवलिया पार्क. यहां कभी कोई हादसा नहीं हुआ है. तीन पार्क नगर निगम के अधीन आता है. दो नगर परिषद के अन्दर आता है.
दरभंगा में 11 पार्क: दरभंगा में छोटे-बड़े 11 पार्क और मनोरंजन स्थल हैं. इनमें कुछ प्रमुख और सबसे प्रसिद्ध पार्क शामिल हैं, फूल गाछी पार्क जो एन एच 27 मंबी पर है, यह पार्क निजी लोगों के द्वारा चलाया जाता है. वहीं ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय द्वारा संचालित महाराजा माधव सिंह पार्क यह यूनिवर्सिटी रोड पर स्थित दरभंगा के सबसे प्रमुख और लोकप्रिय पार्कों में से एक है. आनंदबाग बोटेनिकल गार्डेन यह नार्गोना पैलेस रोड पर स्थित है. प्रकृति प्रेमियों के लिए एक बेहतरीन जगह है.

मनोकामना मंदिर पार्क यह सभी विश्वविद्यालय के रेख देख में चलाया जा रहा है. वहीं नगर निगम दरभंगा के द्वारा बच्चों का पार्क जो लहेरियासराय में है. यहां विशेष रूप से बच्चों के खेलने और मनोरंजन के लिए यह एक लोकप्रिय जगह है. वहीं वोव वाटर पार्क, मॉर्निंग ग्लोरी गार्डेन, और ग्रीनपार्क रसूलपुर आदि हैं जो अलग-अलग इलाकों में मौजूद हैं. यह सभी निजी लोगों के द्वारा चलाया जाता है. बता दें कि 3 विश्वविद्यालय के अधीन शेष नगर निगम द्वारा संचालित पार्क हैं.
पार्कों के लिए SOP क्या है?: बिहार में सार्वजनिक पार्कों के संचालन, रखरखाव और सुरक्षा के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा एक विशेष मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और प्रबंधन ढांचा लागू किया गया है. सरकार ने पूरे राज्य के पार्कों के केंद्रीकृत संचालन के लिए 'पटना पार्क वन प्रमंडल' का गठन किया है, जिसके तहत एक समर्पित डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) नियमों का क्रियान्वयन देखते हैं.
पार्क का बुनियादी ढांचा और भूमि विभाजन: SOP के अनुसार किसी भी पार्क के कुल क्षेत्रफल का 85 फीसदी हिस्सा पूरी तरह से हरियाली विकसित करने के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है. इसमें छोटे-बड़े पेड़, औषधीय और रंग-बिरंगे फूल वाले पौधे और नर्सरी गार्डन शामिल हैं. वहीं पार्क में सिर्फ 15 प्रतिशत हिस्से में ही बुनियादी सुविधाएं बनाई जा सकती हैं. इसमें वॉकिंग ट्रैक, ओपन जिम, बैठने के लिए बेंच और बच्चों के खेलकूद के उपकरण शामिल हैं.
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