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वोटिंग में पुरुषों से आगे उत्तराखंड की मातृशक्ति, सत्ता की हिस्सेदारी में पिछड़ी, जानें पार्टियों के वादों का सच

उत्तराखंड में महिला वोटरों की संख्या के मुकाबले सत्ता में उनकी भूमिका बेहद कम, आंकड़ों से समझिए. धीरज सिंह सजवाण की रिपोर्ट.

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उत्तराखंड में आधी आबादी से क्या हो रहा छल, सत्ता की चौखट पर हिस्सेदारी क्यों अधूरी? (PHOTO- ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : August 28, 2026 at 2:11 PM IST

14 Min Read
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देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति में महिलाएं सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी ताकतों में भी शामिल हैं. राज्य गठन के आंदोलन से लेकर चिपको, शराबबंदी और सामाजिक आंदोलनों तक महिलाएं निर्णायक भूमिका निभाती आई हैं. लेकिन चुनावी राजनीति में टिकट से लेकर विधानसभा तक उनका प्रतिनिधित्व अब भी उनकी आबादी और राजनीतिक प्रभाव के मुकाबले काफी कम है.

उत्तराखंड की सियासत में महिलाओं की भूमिका को आंकड़ों और इतिहास के लिहाज से देखें तो दोनों में एक बड़ा विरोधाभास नजर आता है. प्रदेश की मतदाता सूची में महिलाएं कुल मतदाताओं की करीब आधी आबादी है. मतदान के मामले में भी महिलाएं लगातार पुरुषों से आगे रही हैं. लेकिन जब बात चुनाव लड़ने, राजनीतिक दलों से टिकट हासिल करने और विधानसभा में पहुंचने की आती है तो उनकी संख्या काफी कम हो जाती है. राज्य गठन के बाद से अब तक हुए विधानसभा चुनावों का इतिहास बताता है कि महिला उम्मीदवारों की संख्या में धीरे-धीरे इजाफा तो हुआ, लेकिन यह बढ़ोतरी उस गति से नहीं हुई, जिस गति से महिलाओं ने मतदाता और सामाजिक शक्ति के तौर पर अपनी जगह बनाई है.

महिलाओं को सत्ता में भागीदारी पर प्रतिक्रियाएं (ETV Bharat)

84 लाख से ज्यादा मतदाता, 40 लाख से ज्यादा महिलाएं: उत्तराखंड में महिलाओं की चुनावी ताकत का अंदाजा मौजूदा मतदाता सूची से लगाया जा सकता है. 2025 की अंतिम मतदाता सूची के मुताबिक,

'प्रदेश में 84 लाख 29 हजार 459 सामान्य मतदाता दर्ज हैं. इनमें 43 लाख 64 हजार 667 पुरुष, 40 लाख 64 हजार 488 महिलाएं और 304 थर्ड जेंडर मतदाता हैं. यानी सामान्य मतदाता सूची में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 48.22 फीसदी है. पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच अंतर करीब तीन लाख का ही रह गया है. ऐसे में विधानसभा हो या लोकसभा, उत्तराखंड के चुनाव में महिलाओं की पसंद और मतदान का रुझान किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. 2025 के बाद मतदाता सूची में बदलाव होते रहे हैं. इसलिए चुनाव के समय अंतिम आंकड़े अलग हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा तस्वीर साफ तौर पर बताती है कि प्रदेश में महिला मतदाता अब राजनीतिक रूप से निर्णायक शक्ति हैं'.

मतदान में पुरुषों को लगातार पीछे छोड़ रही महिलाएं: महिलाओं की राजनीतिक ताकत सिर्फ मतदाता सूची तक सीमित नहीं है. मतदान के दिन भी महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही है.

2022 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदान प्रतिशत 67.20 फीसदी रहा, जबकि पुरुषों का मतदान प्रतिशत 62.60 फीसदी था. यानी महिलाओं ने पुरुषों से 4.60 प्रतिशत अंक ज्यादा मतदान किया. पर्वतीय क्षेत्रों में यह अंतर और अधिक प्रभावशाली रहा. 2022 के चुनाव में 70 विधानसभा क्षेत्रों में से बड़ी संख्या में ऐसी सीटें थीं, जहां महिलाओं का मतदान पुरुषों की तुलना में अधिक रहा.

WOMEN VOTERS IN UTTARAKHAND
2002 से 2022 विधानसभा चुनाव तक महिला विधायक (ETV Bharat Graphics)

इससे साफ है कि उत्तराखंड में सरकार बनाने की प्रक्रिया में महिला मतदाता सिर्फ संख्या के लिहाज से ही नहीं, बल्कि मतदान की सक्रियता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है. यही स्थिति राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा संदेश भी है. जिस प्रदेश में करीब 40 लाख महिलाएं मतदाता हैं और मतदान के मामले में वे पुरुषों से आगे निकल रही हैं, वहां महिला मतदाताओं की पसंद को किसी भी पार्टी के चुनावी समीकरण का केंद्र बनना ही होगा.

2002 से 2022 तक टिकट बढ़े, लेकिन बेहद धीमी रफ्तार से: अगर विधानसभा चुनावों की बात करें तो, महिलाओं की स्थिति उतनी मजबूत नजर नहीं आती. राज्य गठन के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में 72 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरीं, लेकिन सिर्फ 4 महिलाएं विधानसभा पहुंच सकीं. 2007 में 56 महिला उम्मीदवारों में से 4 जीतीं. 2012 में 63 महिला उम्मीदवारों में से 5 ने जीत दर्ज की. 2017 में 62 महिलाओं ने चुनाव लड़ा और 5 विधायक बनीं. 2022 में महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़कर 63 रही और इस बार 8 महिलाओं ने जीत हासिल की, जो राज्य गठन के बाद सबसे अधिक संख्या थी.

उपलब्ध चुनावी आंकड़ों से यह भी सामने आता है कि 2022 में कुल 632 उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी रही. यानी दो दशक में महिला उम्मीदवारों की संख्या में कोई बहुत बड़ा उछाल नहीं आया. 2002 में 72 महिला उम्मीदवार थीं और 2022 में 63, यानी महिला उम्मीदवारों की प्रतिभागिता घटी है. हालांकि कुल उम्मीदवारों की संख्या में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी तक रही. इससे यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि जब महिला मतदाता प्रदेश के कुल मतदाताओं का करीब आधा हिस्सा हैं और मतदान में भी पुरुषों से आगे हैं, तो राजनीतिक दल उन्हें चुनावी टिकट देने में इतनी सावधानी क्यों बरतते हैं.

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उत्तराखंड में महिला मतदाता (ETV Bharat Graphics)

2022 में सबसे ज्यादा महिला विधायक, अब विधानसभा में 9 महिला विधायक: 2022 का विधानसभा चुनाव महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा. इस चुनाव में कुल 8 महिलाएं विधानसभा पहुंचीं. इनमें भाजपा की ऋतु खंडूड़ी भूषण (कोटद्वार), रेखा आर्या (सोमेश्वर), सरिता आर्या (नैनीताल), रेणु बिष्ट (यमकेश्वर), सविता कपूर (देहरादून कैंट) और शैलारानी रावत (केदारनाथ) और कांग्रेस की ममता राकेश (भगवानपुर) और अनुपमा रावत (हरिद्वार ग्रामीण) शामिल थीं. चुनाव के बाद भाजपा की ऋतु खंडूड़ी भूषण विधानसभा अध्यक्ष भी बनीं. इसके बाद विधानसभा की तस्वीर में बदलाव आया. बागेश्वर उपचुनाव में भाजपा की पार्वती दास (बागेश्वर) विधानसभा पहुंचीं और बाद में केदारनाथ उपचुनाव में भाजपा की आशा नौटियाल ने जीत दर्ज की. इस तरह मौजूदा पांचवीं विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 9 है. यानी 70 सदस्यीय सदन में महिलाओं की मौजूदा हिस्सेदारी करीब 12.86 फीसदी है. यह राज्य गठन के बाद अब तक का सबसे बड़ा महिला प्रतिनिधित्व है, लेकिन फिर भी यह उस अनुपात से काफी कम है, जिस अनुपात में महिलाएं मतदाता हैं.

राजनीति से पहले सामाजिक बदलाव की अगुआ रही हैं पहाड़ की महिलाएं: उत्तराखंड में महिलाओं की भूमिका को सिर्फ चुनावी राजनीति तक सीमित करना प्रदेश के इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा. अलग राज्य के आंदोलन में पहाड़ की महिलाओं ने गांवों से लेकर शहरों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1994 के आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर उतरीं और आंदोलन को सामाजिक आधार देने में अहम भूमिका निभाई. पहाड़ के दूरस्थ गांवों में आंदोलन की आवाज को घर-घर तक पहुंचाने में भी महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही. इससे पहले पर्यावरण और सामाजिक आंदोलनों में भी उत्तराखंड की महिलाओं ने राष्ट्रीय पहचान बनाई.

गौरा देवी और रैणी गांव की महिलाओं का 'चिपको आंदोलन' इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जंगल को सिर्फ लकड़ी या संसाधन नहीं, बल्कि अपने जीवन और आजीविका का आधार मानने वाली महिलाओं ने पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए पर्यावरण आंदोलन को नई दिशा दी. इसी तरह शराबबंदी के आंदोलनों में महिलाओं की सक्रियता ने यह साबित किया कि पहाड़ की महिलाएं केवल परिवार और गांव की जिम्मेदारियां संभालने वाली शक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक नीतियों और शासन के फैसलों को प्रभावित करने वाली ताकत भी है. यही वजह है कि उत्तराखंड की महिला राजनीति का इतिहास विधानसभा के आंकड़ों से कई बड़ा है. सामाजिक आंदोलनों में जिस महिला शक्ति ने सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर किया, वहीं चुनाव के समय सरकार बनाने और बदलने में भी निर्णायक भूमिका निभाती है.

WOMEN VOTERS IN UTTARAKHAND
आधी आबादी को आधा प्रतिनिधित्व भी क्यों नहीं? (ETV Bharat Graphics)

सामाजिक भूमिका के मुकाबले राजनीतिक भागीदारी कम: वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप राणा का कहना है कि,

उत्तराखंड में महिला वोटरों की संख्या करीब आधी आबादी के बराबर है और प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. समाज सुधार, शराबबंदी और पर्यावरण संरक्षण के आंदोलनों में उत्तराखंड की महिलाओं ने इतिहास बनाया है. टिंचरी माई से लेकर गौरा देवी तक महिलाओं ने अलग-अलग सामाजिक संघर्षों में अपनी पहचान बनाई और उत्तराखंड आंदोलन में भी उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही.
-कुलदीप राणा, वरिष्ठ पत्रकार-

राणा का कहना है कि, इसके बावजूद मतदान में महिलाओं की मजबूत भूमिका होने के बाद भी राजनीतिक भागीदारी उसी अनुपात में दिखाई नहीं देती. राजनीतिक दलों ने महिलाओं को टिकट देने में अभी तक उतना उत्साह नहीं दिखाया है. उनका कहना है कि मौजूदा विधानसभा में भी 70 सदस्यों के मुकाबले महिला विधायकों की संख्या सिर्फ 9 है. ऐसे में आने वाला विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि यह देखना होगा कि भाजपा और कांग्रेस दोनों प्रमुख दल महिलाओं को कितने टिकट देते हैं और क्या महिला मतदाताओं की ताकत को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलने का प्रयास किया जाता है?.

भाजपा बोली- 33 फीसदी प्रतिनिधित्व की दिशा में बढ़ रहे: भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी का कहना है कि, उत्तराखंड में आधी आबादी, महिलाएं यानी मातृशक्ति की है. राज्य निर्माण में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है. भाजपा सरकार और संगठन ने महिलाओं को लगातार आगे बढ़ाने का काम किया है.

भाजपा ने विधानसभा चुनावों में हर बार करीब 10 से 12 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का प्रयास किया है और आने वाले विधानसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने की पूरी उम्मीद है. पार्टी में महिलाओं को 33 फीसदी प्रतिनिधित्व देने का लक्ष्य है. निकाय और सहकारी चुनावों में भी महिलाओं को ज्यादा अवसर दिए गए हैं.
-मथुरा दत्त जोशी, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा-

संगठन में महिलाओं की भागीदारी का उदाहरण देते हुए मथुरा दत्त जोशी ने कहा कि,

प्रदेश संगठन में तीन महामंत्रियों में एक महिला महामंत्री है. उपाध्यक्षों में भी महिलाओं को जिम्मेदारी मिली है. प्रवक्ता टीम में महिलाओं को जगह दी गई है.
-मथुरा दत्त जोशी, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा-

महिलाओं को टिकट देते समय जीत के समीकरण को प्राथमिकता दिए जाने के सवाल पर जोशी का कहना है कि, चुनाव जीतना राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण होता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की महिला प्रत्याशियों ने खुद को मजबूत उम्मीदवार साबित किया है. छोटे चुनावों में भी महिलाएं जीतकर सामने आई हैं और विधानसभा चुनाव में भी आने वाले समय में उनकी भागीदारी बढ़ेगी.

WOMEN VOTERS IN UTTARAKHAND
विधानसभा में महिला विधायक (ETV Bharat Graphics)

कांग्रेस का हमला: कांग्रेस प्रदेश नेता गरिमा दसौनी इस पूरे मुद्दे पर भाजपा पर हमलावर हैं. उनका कहना है कि, महिला सम्मान और महिला अधिकारों की बात करने का भाजपा को नैतिक अधिकार नहीं है, क्योंकि कांग्रेस ने अपने लंबे राजनीतिक इतिहास में महिलाओं को नेतृत्व और राजनीतिक अधिकार देने का काम किया है.

कांग्रेस ने देश को महिला प्रधानमंत्री, महिला राष्ट्रपति और महिला लोकसभा अध्यक्ष दीं और स्थानीय निकायों में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की पहल को लेकर कांग्रेस लंबे समय से मांग करती रही है. 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को तत्काल प्रभाव से लागू करने के बजाय इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया, जिससे महिलाओं को इसका राजनीतिक लाभ तत्काल नहीं मिल पाया. केंद्र सरकार की ओर से 2026 में इसके प्रभावी होने को लेकर कदम उठाए गए हैं.
-गरिमा दसौनी, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस-

दसौनी का कहना है कि, भाजपा महिला आरक्षण का राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश कर रही है, जबकि इसकी अवधारणा और संघर्ष बहुत पुराना है. महिलाओं को भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में वास्तविक निर्णय लेने की प्रक्रिया में कितनी जगह दी गई है? इसका मूल्यांकन सिर्फ आरक्षण के दावों से नहीं बल्कि पार्टी की जिम्मेदारियों और टिकट वितरण से होना चाहिए. दसौनी ने आरएसएस में महिलाओं की भूमिका को लेकर भी भाजपा से सवाल करती हैं.

महिलाओं के लिए 30 फीसदी नौकरी आरक्षण और आगे की राह: उत्तराखंड में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए राजनीति के अलावा रोजगार के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं. राज्य में उत्तराखंड मूल की महिलाओं के लिए सरकारी सेवाओं में 30 फीसदी क्षैतिज आरक्षण का प्रावधान किया गया है. इसका उद्देश्य सरकारी नौकरियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना है. हालांकि इस व्यवस्था को लेकर न्यायालय में कानूनी चुनौती भी दी गई है और इस मुद्दे पर न्यायिक प्रक्रिया जारी रही है.

स्थानीय निकाय और पंचायतों में आरक्षण ने भी हजारों महिलाओं के लिए राजनीतिक नेतृत्व का रास्ता खोला है. 2025 के पंचायत चुनाव में करीब 47.7 लाख मतदाता थे, जिनमें 23.1 लाख महिलाएं थीं. तीन-स्तरीय पंचायत व्यवस्था में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों ने गांवों से राजनीतिक नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार करने का अवसर दिया है. अब चुनौती यह है कि स्थानीय राजनीति से उभरने वाला यह महिला नेतृत्व विधानसभा और संसद की राजनीति तक कितनी मजबूती से पहुंचता है.

2027 में होगी असली परीक्षा: उत्तराखंड में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका की असली परीक्षा अब 2027 के विधानसभा चुनाव में होगी. महिला मतदाताओं की संख्या 40 लाख से ज्यादा है. मतदान में महिलाएं, पुरुषों से लगातार आगे रही हैं और सामाजिक आंदोलनों में उनकी भूमिका का इतिहास भी बेहद मजबूत है. इसके बावजूद विधानसभा में महिला प्रतिनिधित्व अभी करीब 13 फीसदी है. ऐसे में 2027 का सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि महिलाएं किसे वोट देती हैं? बल्कि इससे भी बड़ा सवाल यह होगा कि राजनीतिक दल महिलाओं को कितने टिकट देते हैं और उनमें से कितनों को जीतने योग्य सीटों पर उतारती हैं.

यदि भाजपा और कांग्रेस महिला उम्मीदवारों की संख्या को मौजूदा स्तर से उल्लेखनीय रूप से बढ़ाते हैं, तो यह उत्तराखंड की राजनीति में वास्तविक बदलाव की शुरुआत मानी जाएगी. क्योंकि जिस महिला मतदाता की उंगली पर लगी स्याही सरकार बनाने की ताकत रखती है, अब समय यही सवाल पूछने का है कि उसी महिला को सत्ता के फैसले लेने वाली मेज पर उसकी आबादी और भूमिका के अनुपात में जगह कब मिलेगी?.

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