लाहौल में अटल टनल कैसे लाई बहार, सालों से हो रहे पलायन और कष्टों से लोगों को दी 'मुक्ति'
अटल टनल सिर्फ एक सुरंग नहीं, बल्कि लाहौल घाटी के लोगों की नई उम्मीद है. लाहौल के विकास के लिए ये मील का पत्थर है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : November 13, 2025 at 4:43 PM IST
कुल्लू: सर्दियों के मौसम में भारी बर्फबारी होने से रोहतांग दर्रा बर्फ का समुद्र बन जाता है. जगह-जगह हिमखंड गिरे होते है, जिससे पहले राहगीरों की राहें मुश्किल हो जाती थीं, बर्फ का पहाड़ लांघते हुए किसी की सांसें ठंडी हो जाती थी, तो कोई मदद की आस लगाए बैठा रहता था. अक्टूबर शुरू होते ही लाहौल के लोगों को यह रोहतांग दर्रा परेशान करना शुरू कर देता था. अचानक होने वाली बर्फबारी और बर्फीला तूफान हर साल किसी न किसी राहगीर की जान ले ही लेता था. कई बार अचानक हुई बर्फबारी पर्यटकों पर भी भारी पड़ती थी. लाहौल घाटी के लोग पलायन कर कुल्लू या मनाली चले जाते थे, लेकिन अटल टनल के बन जाने से यहां बहुत कुछ बदल गया है.
हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल स्पीति में अटल टनल बनने के बाद मनाली और लाहौल स्पीति की तस्वीर बदलती जा रही है. रोहतांग दर्रे पर अब न तो किसी मुसाफिर या मरीज की जान जाती है और न ही लोग पलायन को मजबूर होते हैं. टनल बनने के बाद लाहौल घाटी में विकास को पंख लगे ही हैं, लेकिन इसके साथ साथ लाहौल घाटी से लोगों का सर्दियों में होने वाला पलायन भी कम हुआ और जिंदगी भी पहले के मुकाबले आसान हो गई.
बर्फ की कैद में रहते थे लोग
टनल बनने से पहले 6 माह का राशन यहां के लोगों को भंडारण करना पड़ता था और अक्टूबर से लेकर मार्च तक बर्फ की कैद में लोगों को अपना जीवन यापन करना पड़ता था. इतना ही नहीं अगर कोई बीमार हो जाए तो बर्फ के बीच से उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए लोगों को एकमात्र हेलीकॉप्टर सेवा की राह देखनी पड़ती थी, लेकिन अब अटल टनल बनने से बीते समय की बात हो चुकी है.
जरूरी सामान का करना पड़ता था भंडारण
जनजातीय जिला लाहौल स्पीति के लाहौल घाटी के लोगों का जीवन अटल टनल बनने से पहले बड़ा मुश्किल था. भारी बर्फबारी के कारण रोहतांग दर्रा 6 महीने के लिए बंद हो जाता था. रतन कटोच का कहना है कि 'बर्फबारी के कारण लोगों को जरूरी सामान अक्टूबर से ही जमा करना पड़ता था जैसे कपड़े, दवाइयां, लकड़ियां, राशन और पशुओं के चारे का भंडारण करना पड़ता था. कुछ लोग बर्फबारी के मौसम में लाहौल घाटी से पलायन कर मनाली या कुल्लू चले जाते थे, ताकि आपात या किसी बीमारी की स्थिति में समय पर मदद मिल सके, क्योंकि बर्फबारी के मौसम में लाहौल घाटी में मरीजों को इलाज या अन्य आपात स्थिति में मदद बहुत देरी से मिलती थी. बर्फबारी के कारण यहां तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता हेलीकॉप्टर ही था. कई बार समय पर हेलीकॉप्टर न पहुंचने के कारण मरीजों की जान तक चली जाती थी, लेकिन अटल टनल बनने से अब हेलीकॉप्टर की बहुत कम जरूरत पड़ती है. राशन भी दो तीन महीनों के लिए ही स्टोर करना पड़ता है, कुछ लोगों को इसकी जरूरत भी नहीं पड़ती.'
पीठ पर उठाकर ले जाने पड़ते थे मरीज
किसी भी तरह की आपात स्थिति से बचने के लिए लोग कई बार बर्फबारी या उससे पहले मनाली आने के लिए 14000 फीट ऊंचे रोहतांग दर्रा को भी पैदल पार करते थे. कई बार रोहतांग दर्रा पार करते समय लोगों की जानें भी जा चुकी हैं. लाहौल घाटी के स्थानीय निवासी रतन कटोच का कहना है कि 'हमने भी अपने जीवन में कई बार पैदल रोहतांग दर्रा पार किया है. सबसे ज्यादा मुश्किल तब होती थी जब कोई घाटी में बीमार पड़ता था. भारी बर्फबारी के चलते यहां पर हेलीकॉप्टर का आना भी कई बार मुश्किल होता था, तो ग्रामीण मिलकर मरीज को पीठ पर उठाकर रोहतांग दर्रा पैदल पार कर मनाली पहुंचते थे.'
रतन कटोच आगे कहते हैं कि कई बार रोहतांग दर्रे में भारी बर्फ के चलते हमारे अपनों की भी मौत हुई है, लेकिन अब अटल टनल बनने के बाद लाहौल घाटी में लोगों का पलायन रुक गया है. यहां पर सर्दियों में भारी बर्फबारी के चलते सुविधाओं का भी काफी अभाव रहता था. लेकिन अब लाहौल में भी डॉक्टरों की संख्या बढ़ी है और टनल के माध्यम से मरीज को कुल्लू ले जाना भी आसान हुआ है. अब हेलीकॉप्टर की उतनी जरूरत नहीं पड़ती. राशन, पानी मिलता रहता है.
60 प्रतिशत से अधिक की आबादी करती थी पलायन
जिला लाहौल स्पीति की लाहौल घाटी की बात करें तो यहां पर कुल 16 पंचायतें हैं और करीब 18000 की आबादी यहां पर रहती है. टनल बनने से पहले इन गांवों से 60 प्रतिशत से अधिक की आबादी कुल्लू की ओर पलायन करती थी, ताकि सर्दियों में खुद को सुरक्षित रख सकें. परिवार के कुछ लोग पशुओं, बीमार लोगों और बुजुर्गों की देखभाल के लिए यहीं पर ही रहते थे, क्योंकि रोहतांग होते हुए पशुओं, मरीजों और बुजुर्गों को मनाली पहुंचा असंभव था, लेकिन अब टनल के बन जाने से ये समस्याएं खत्म हो गई हैं. अब बहुत ही कम लोग कुल्लू या मनाली की तरफ पलायन करते हैं. ज्यादातर परिवार अपने गांव और घरों में ही रुकते हैं.

देश दुनिया से कट जाता था इलाका
बर्फबारी के दौरान मनाली से बस सेवा और छोटी गाड़ियां भी लाहौल स्पीति के लिए बंद हो जाती थी, हिमाचल परिवहन निगम का केलांग डिपो भी मनाली शिफ्ट हो जाता था. पेट्रोल-डीजल और अन्य दूसरे सामान की सप्लाई भी पूरी तरह से ठप हो जाती थी. पूरा इलाका देश-दुनिया से कट जाता था. रोहतांग टनल बनने के बाद भी बर्फबारी के सीजन में बस सेवा बंद हो जाती है, लेकिन मनाली से छोटी गाड़ियों की आवाजाही लाहौल या केलांग तक होती है. बर्फबारी के बाद दो या तीन दिन में बीआरओ केलांग तक सड़क मार्ग को बहाल कर देता है.

अब 12 महीने होती है गाड़ियों की आवाजाही
रतन कटोच कहते हैं कि 'यहां अब गाड़ियों आवाजाही 12 महीने होती है. बीच बीच में पेट्रोल डीजल की गाड़ियां भी लाहौल घाटी में भेजी जाती हैं. इससे जीवन आसान हुआ है. इसके साथ ही किसी आपात स्थिति में मरीज को रोहतांग टनल होते हुए कुल्लू लाना आसान होता है. पहले बर्फबारी मरीज या किसी आपात स्थिति में लाहौल से निकलने के लिए सिर्फ हेलीकॉप्टर ही एक मात्र सहारा था.'
अटल टनल बनने से सफर हुआ आसान
अटल टनल बनने के बाद लाहौल घाटी का सफर आसान और सुविधाजनक हुआ है. साथ ही मनाली से दूरी भी कम हुई है. इससे समय की भी बचत हो रही है. अटल टनल बनने से पहले मनाली से लाहौल के सिस्सू तक पहुंचने के लिए 6 घंटे लग जाते थे. वहीं, अटल टनल बनने के बाद सिस्सू पहुंचने के लिए मात्र 45 मिनट लगते हैं. इसके अलावा मनाली से लाहौल-स्पीति के जिला मुख्यालय केलांग पहुंचने के लिए अटल टनल बनने से पहले जहां आठ घंटे लगते थे. वहीं, ये दूरी अब कम होकर मात्र डेढ़ घंटे की रह गई है.

पर्यटन को मिला बढ़ावा
अटल टनल बनने से जहां घाटी में पर्यटकों और लोगों की आवाजाही आसान हुई है. इससे लोगों को रोजगार भी मिला है. इससे कुछ हद तक रोजगार की समस्या भी हल हुई है. यहां सैलानियों की संख्या में भी खासी वृद्धि हुई है. हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक साल 2018 में लाहौल-स्पीति में 1.72 लाख सैलानी, साल 2019 में 1.18 लाख, साल 2020 में 15 हजार, साल 2021 में 70 हजार, साल 2022 में 2 लाख, साल 2023 में 8.23 लाख, साल 2024 में 10 लाख 55 हजार सैलानी आए हैं. दारचा सिस्सू, कोकसर, जांस्कर, शिंकुला तक पहुंचना आसान हो गया है
कृषि में हुआ विस्तार
रोहतांग टनल बनने से घाटी में टूरिज्म के साथ कृषि के क्षेत्र में भी काफी विस्तार हुआ है और अब लोगों की फसल खेतों में खराब नहीं हो रही हैं. लाहौल घाटी के स्थानीय निवासी शेर सिंह का कहना है कि 'टनल बनने से अब सबसे ज्यादा फायदा यहां के किसानों को हुआ है. क्योंकि अब उनके फसले रोहतांग दर्रा के ट्रैफिक जाम में नहीं फंसती है. टनल बनने से बाहरी राज्यों के व्यापारी भी अब लाहौल घाटी पहुंच रहे हैं और लोगों को उनकी फसलों का भी अच्छा दाम मिल रहा है. हम कहीं भी कभी भी अपनी फसल बेच सकते हैं, लेकिन पहले ये सुविधा नहीं थी. पहले सर्दियां आने से पहले अपनी फसल बेच देते थे. '
लोगों को मिल रही अच्छी चिकित्सा सुविधा
अटल टनल के बनने से पहले लोगों को सही इलाज भी नहीं मिल पाता था, लेकिन अब चिकित्सा सुविधाओं में काफी बदलाव आया है. लाहौल निवासी शेर सिंह ने बताया कि 'पहले ना लाइट होती थी और न ही कोई टेलीफोन होता था. लोग खुद स्ट्रेचर बनाकर ही मरीजों को पीठ पर उठाकर मरीजों को कुल्लू पहुंचाते थे. पहले रोहतांग दर्रे पर एंबुलेंस कई घंटों जाम में फंसी रहती थी, लेकिन अब आसानी से यहां से निकला जा सकता है, जाम की कोई समस्या नहीं है. पहले यहां डॉक्टर की भी कमी होती थी, लेकिन अब यहां डॉक्टर भी उपलब्ध हैं.'
हादसों पर लगा विराम
रोहतांग दर्रे पर बहुत से हादसे भी हुए हैं. 20 नवंबर 2009 को रोहतांग दर्रे में अचानक आए तूफान से बीआरओ के 16 मजदूर मारे गए थे. 30 मई 2012 को ट्रैकिंग करते हुए लुधियाना के पर्यटक की मौत हुई थी. 23 मई 2014 को रोहतांग में अचानक बर्फबारी से 194 पर्यटक फंस गए थे. इसके बाद 13 दिसंबर 2014 को अचानक हुई भारी बर्फबारी से रोहतांग दर्रे में 2500 पर्यटक फंस गए थे और 4 नवंबर 2015 को बर्फबारी से 200 पर्यटक फंस गए थे.
कोकसर पंचायत में अभी भी 'अंधेरा'
भले ही पूरी लाहौल घाटी का जीवन अटल टनल बनने के बाद बदल गया हो, लेकिन रोहतांग दर्रा से करीब 16 किलोमीटर दूर कोकसर पंचायत के कोकसर, डिंफुक और रामथांग गांवों के लोग आज भी दिसंबर से मार्च माह तक अपने गांव को छोड़कर कुल्लू का रुख करते हैं. यहां पर लोग पलायन के डर से ही पशुपालन भी नहीं करते हैं. गांव में कुल 46 घर है और करीब 350 लोगों की आबादी है. पलायन के चलते यहां के लोगों के द्वारा कुल्लू मनाली के इलाकों में भी अपने घर बनाए गए हैं. 80% लोगों के यहां अपने घर हैं और 20% लोग पलायन के दौरान या तो अपने रिश्तेदारों के घर रहते हैं या फिर उन्हें किराए के कमरों में रहना पड़ता है.
कोकसर के आस-पास के गांवों में होती है भारी बर्फबारी
रतन कटोच का कहना है कि 'कोकसर, डिंफुक और रामथांग गांव के लोग अटल टनल बनने से पहले अक्टूबर माह में ही पलायन कर जाते थे, लेकिन अब वो नवंबर या दिसंबर माह में बर्फबारी होने से पहले मनाली या फिर कुल्लू का रुख करते हैं. इन गांवों की दूरी अटल टनल से मात्र पांच किलोमीटर ही है, लेकिन यहां भारी बर्फबारी होती है. बड़े ग्लेशियर के कारण कोकसर से अटल टनल जाने वाली सड़क को खोलना मुश्किल होता है. इसे बर्फबारी का सीजन बंद और या फिर कुछ कम होने के बाद ही खोलने का काम शुरू होता है. दिसंबर से लेकर फरवरी तक ये पूरी तरह से देश-दुनिया से कट जाता है. मजबूरी में यहां आज भी लोग पलायन कर रहे हैं, लेकिन टनल बनने के बाद की पलायन की अवधि छह माह से कम हो कर दो या तीन माह तक रह गई है.'
पर्यावरण को लेकर स्थानीय लोग चिंतित
टनल से लाहौल घाटी का जीवन तो आसान हुआ है. लेकिन यहां पर सैलानियों के साथ-साथ वाहनों की संख्या भी बढ़ी है. ऐसे में यहां के भौगोलिक परिस्थितियों में भी बदलाव देखने को मिल रहा है. बढ़ती पर्यटकों और गाड़ियों की संख्या के कारण यहां के इकोसिस्टम पर असर पड़ा है.'

पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के बारे में शेर सिंह कहते हैं कि 'यहां पर टनल बनने से पहले अक्टूबर माह में भी भारी बर्फबारी शुरू हो जाती थी और अब यहां पर दिसंबर माह में बर्फबारी हो रही है. लोगों की आवाजाही का असर यहां के पर्यावरण पर भी नजर आ रहा है. आने वाले समय में सरकार को इस दिशा पर विचार करना होगा और लाहौल घाटी में कंक्रीट के जंगल को बनने से भी रोकना होगा. दो महीने तक गाड़ियों और टूरिज्म गतिविधियों को बंद रखना चाहिए, ताकि लाहौल घाटी का पर्यावरण और इकोसिस्टम बचा रहे.'
अटल सरकार ने लिया था टनल निर्माण का निर्णय
अटल सुरंग का डिजाइन प्रतिदिन तीन हजार कारों और 1500 ट्रकों के लिए तैयार किया गया है. इसमें वाहनों की अधिकतम गति 80 किलोमीटर प्रति घंटे है. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने रोहतांग दर्रे के नीचे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस सुरंग का निर्माण कराने का निर्णय किया था और सुरंग के दक्षिणी पोर्टल पर संपर्क मार्ग की आधारशिला 26 मई, 2002 को रखी गई थी. 2010 में सोनिया गांधी ने सोलंगनाला से अटल टनल तक बनने वाली सड़क की आधारशिला रखी थी. साल 2020 के अक्टूबर माह में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल टनल का शुभारंभ किया था.

अटल टनल की खासियत
यह घोड़े की नाल के आकार की, सिंगल ट्यूब, डबल लेन वाली सुरंग है. मीटर लंबी है. इसकी ओवरहेड क्लीयरेंस 5.525 मीटर है. यह 10.5 मीटर चौड़ी है. आपातकालीन संचार के लिए प्रत्येक 150 मीटर पर टेलीफोन कनेक्शन. प्रत्येक 60 मीटर पर फायर हाइड्रेंट सिस्टम. 250 मीटर पर सीसीटीवी कैमरों के साथ हर 1 किलोमीटर पर वायु गुणवत्ता निगरानी सयंत्र हैं. सुरंग का उत्तरी पोर्टल लाहौल और स्पीति जिले की ओर है, जबकि दक्षिण पोर्टल मनाली से लगभग 30 किलोमीटर दूर धुंदी की ओर है.
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