साढ़े 3 अरब साल पहले कैसी थी धरती! झारखंड का सिंहभूम कर रहा है बयां
झारखंड के सिंहभूम की चट्टानों में 3.5 अरब साल पुराने जीवन के संकेत मिले हैं. चंदन भट्टाचार्य की रिपोर्ट.

Published : August 27, 2026 at 3:52 PM IST
|Updated : August 27, 2026 at 4:22 PM IST
रांची: विश्व भर में कई थ्योरी और सिद्धांत हैं जो हमारे पृथ्वी की उत्पत्ति और यहां मौजूद जीवन के बारे में बताते हैं. इनमें सबसे प्रचलित सिद्धांतों में निहारिका परिकल्पना(Nebular hypothesis) प्रमुख है. इसके अलावा ग्रहीय या प्लैनेटेसिमल सिद्धांत, ज्वारीय सिद्धांत, गैसीय सिद्धांत और सुपरनोवा सिद्धांत हैं, जो 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी ग्रह के निर्माण से लेकर आज तक की स्थिति और परिस्थिति का जिक्र करते हैं.
झारखंड का सिंहभूम क्रेटन - इसी शोध की दिशा में एक और बड़ा माइलस्टोन खड़ा करने जा रहा है. इन्हीं चट्टानों में 3.5 अरब साल पुराने सूक्ष्म जीवन के प्रमाण मिले हैं. झारखंड अब भू-वैज्ञानिक इतिहास में अपनी एक अमिट छाप छोड़ने के लिए तैयार है. दुनिया जल्द ही इस क्षेत्र की चट्टानों और मिट्टी में संरक्षित सूक्ष्म जीवन की कहानी को देखेगी, समझेगी और उस पर शोध करेगी.
क्या है क्रेटन?
क्रेटन पृथ्वी की महाद्वीपीय भूपर्पटी का वह हिस्सा है जो भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण से बेहद पुराना और लंबे समय तक अपेक्षाकृत स्थिर रहा है. पृथ्वी की सतह पर मौजूद कई आधुनिक भूभाग ऐसे प्राचीन क्रेटन के ऊपर विकसित हुए हैं. करोड़ों-अरबों वर्षों के दौरान पृथ्वी पर ज्वालामुखीय गतिविधियां, समुद्री हलचल, प्लेटों की गति और अन्य भूगर्भीय परिवर्तन होते रहे, लेकिन कुछ क्षेत्र इन बदलावों के बावजूद अपनी प्राचीन संरचना को काफी हद तक बचाए रखने में सफल रहे.
सिंहभूम क्रेटन ऐसा ही एक अत्यंत प्राचीन भूगर्भीय क्षेत्र है. झारखंड के कोल्हान क्षेत्र और इसके आसपास का यह भूभाग भूवैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से खास महत्व रखता है. यहां मौजूद चट्टानों में पृथ्वी के शुरुआती इतिहास की कई परतें पढ़ी जा सकती हैं. यही वजह है कि सिंहभूम क्रेटन को लेकर लगातार वैज्ञानिक अध्ययन होते रहे हैं और नई रिपोर्ट ने इसके महत्व को और बढ़ा दिया है.

हाल की रिसर्च
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिसर्चर त्रिस्रोता चौधरी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर हाल ही में सिंहभूम क्रेटन पर की गई अपनी रिसर्च प्रकाशित की है. उन्हें यहां की चट्टानों में जिरकॉन क्रिस्टल मिले हैं. ये जिरकॉन लगभग उसी समय बने जब यह चट्टान जमा हो रहे थे यानी ठीक 3.5 अरब साल पहले. यह पूरा शोध पूर्वी सिंहभूम जिले के भीतरदारी गांव में हुआ है.
रिसर्चर्स ने इस गांव की चट्टान का अध्ययन किया, जिसे भीतरदारी चर्ट कहा जाता है. इसमें कार्बनयुक्त पदार्थ (carbonaceous matter या CM) मिला, जिसे केरोजेन भी कहते हैं. केरोजेन प्राचीन जीवों के अवशेष होते हैं जो चट्टानों में सुरक्षित रह जाते हैं. इस रिसर्च ने सिंहभूम क्रेटन में करीब 3.5 अरब वर्ष पुराने सूक्ष्म जीवन के होने के संकेत दिए हैं.

संकेत मिलने की रिपोर्ट ने न केवल भारत, बल्कि झारखंड के भूवैज्ञानिक इतिहास को लेकर भी नई संभावनाओं का दरवाजा खोल दिया है. यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस दौर के साक्ष्य सामने आए हैं, वो पृथ्वी के शुरुआती इतिहास का वह समय था, जब आज जैसी जीवन की जटिल परिस्थितियां विकसित नहीं हुई थीं.
वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि उस दौर में पृथ्वी पर जीवन किस रूप में मौजूद था, वह किन परिस्थितियों में विकसित हुआ और उसने किस तरह अपना अस्तित्व बनाए रखा. सिंहभूम क्रेटन से मिले चट्टानी साक्ष्य इन सवालों के जवाब तलाशने की दिशा में महत्वपूर्ण कड़ी माने जा रहे हैं. हालांकि, इस खोज से जुड़े हर निष्कर्ष की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए आगे विस्तृत शोध जरूरी है.

रिसर्च और इसके निष्कर्ष
भीतरदारी चर्ट चट्टान के अंदर ज्वालामुखी से बने जिरकॉन क्रिस्टल मिले. इन जिरकॉन की उम्र का पता लगाने पर इनकी उम्र 3,497 ± 5 मिलियन साल (लगभग 3.5 अरब साल) निकली, जिससे पता चलता है कि चट्टान और उसमें मौजूद कार्बन, दोनों ही उसी समय के हैं. जीवन के सबूत खोजने के लिए चट्टानों का विश्लेषण भी किया गया.
इनमें बारीक काली और सफेद परतें दिखाई देती हैं, जिनमें काली परतें कार्बन से बनी हैं. कार्बन आइसोटोप वैल्यू (δ¹³C) -30.9‰ पाई गई. यह वैल्यू जीवित जीवों (जैसे बैक्टीरिया) से बने कार्बन की एक खास पहचान है, क्योंकि इतनी ज्यादा नेगेटिव वैल्यू आसानी से निर्जीव तरीकों (abiotic processes) से नहीं बनती. नतीजतन, वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकालते हुए इसे जैविक उत्पति (biogenic) माना.

यह रिसर्च महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि यह सबसे पुरानी ऐसी चट्टान है जिसकी उम्र का सीधे तौर (Direct dating)पर पता लगाया गया है और जिसमें जीवन का पक्का सबूत (बायोसिगनेचर) मिला है. इससे पता चलता है कि पृथ्वी पर लगभग 3.5 अरब साल पहले जीवन मौजूद था और उसमें अपेक्षाकृत उन्नत मेटाबोलिक प्रक्रियाएं (जैसे कि केल्विन चक्र) होती थीं.
चट्टानों में कैसे मिलते हैं जीवन के संकेत?
करीब 3.5 अरब साल पुराने समय की कल्पना करना आज के दौर में बेहद कठिन है. पृथ्वी उस समय आज जैसी नहीं थी. वातावरण, समुद्र, तापमान और रसायनिक परिस्थितियां पूरी तरह अलग रही होंगी. ऐसे में उस समय के जीवों का कोई प्रत्यक्ष रिकॉर्ड मिलना लगभग असंभव है. वैज्ञानिक इसलिए चट्टानों में सुरक्षित रह गए सूक्ष्म संकेतों, संरचनाओं और रसायनिक प्रमाणों का अध्ययन करते हैं.

सिंहभूम क्रेटन से जुड़े शोध भी चट्टानों में मिले ऐसे साक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिनसे शुरुआती सूक्ष्म जीवन की मौजूदगी की संभावना सामने आती हैं. ये सूक्ष्मजीव आज के जटिल जीवों की तरह नहीं रहे होंगे. संभव है कि वे बेहद साधारण माइक्रोऑर्गेनिज्म रहे हों, जो उस समय उपलब्ध सीमित संसाधनों और अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित रहे.
भूगर्भीय विशेषज्ञ नीतीश प्रियदर्शी के मुताबिक, इस रिपोर्ट को अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय इसे आगे के शोध की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखना चाहिए. वे कहते हैं, “सिंहभूम विश्व के सबसे प्राचीन भूगर्भीय क्षेत्रों में से एक है. यहां जिस तरह के साक्ष्य सामने आए हैं, वे बेहद महत्वपूर्ण हैं. अभी इन साक्ष्यों का विस्तृत अध्ययन और जांच जरूरी है. हमारे पास हर तरह की जांच के लिए पर्याप्त प्रयोगशाला क्षमता नहीं है, इसलिए वैज्ञानिक स्तर पर और विस्तृत शोध की आवश्यकता है. रिपोर्ट जिस दिशा की ओर इशारा कर रही है, वह निश्चित तौर पर बेहद दिलचस्प है.”

ऑक्सीजन के बिना जीवन की संभावना
इस पूरी खोज का एक अहम पहलू ऑक्सीजन से जुड़ा है. पृथ्वी के शुरुआती इतिहास में वातावरण आज जैसा ऑक्सीजन-समृद्ध नहीं था. इसलिए वैज्ञानिकों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि उस समय जीवन किस तरह की परिस्थितियों में विकसित हुआ होगा.
प्रारंभिक पृथ्वी के सूक्ष्मजीवों को समझने से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि जीवन ने पृथ्वी पर अपने शुरुआती दौर में किन परिस्थितियों का सामना किया. यदि चट्टानों में सुरक्षित संरचनाएं और अन्य साक्ष्य आगे के अध्ययन में शुरुआती माइक्रोऑर्गेनिज्म से जुड़ते हैं, तो यह पृथ्वी पर जीवन के विकास की कहानी को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है.

नीतीश प्रियदर्शी का कहना है कि इस विषय पर जल्दबाजी में अंतिम दावा करने के बजाय वैज्ञानिक जांच को आगे बढ़ाना जरूरी है. उन्होंने कहा, “यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि वास्तव में कौन सा माइक्रोऑर्गेनिज्म था और वह किस वातावरण में विकसित हुआ. जो एविडेंस चट्टानों में मिले हैं, वे जांच के विषय हैं. संभव है कि उस समय ऐसे सूक्ष्मजीव रहे हों जो बिना ऑक्सीजन के भी सर्वाइव करते रहे हों. आने वाले शोध से यह स्पष्ट हो सकता है कि उस समय की जलवायु कैसी थी और जीवन किस परिस्थिति में विकसित हुआ.”
सिर्फ सिंहभूम ही नहीं, पूरा झारखंड बन सकता है प्रयोगशाला
इस खोज का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि शोध का दायरा केवल सिंहभूम क्रेटन तक सीमित रखने की जरूरत नहीं है. झारखंड में कई ऐसे भूगर्भीय क्षेत्र हैं जिनकी वैज्ञानिक दृष्टि से अभी व्यापक पड़ताल बाकी है. छोटानागपुर पठार से लेकर हजारीबाग और राज्य के दूसरे प्राचीन भूभागों तक चट्टानों और भूगर्भीय संरचनाओं में पृथ्वी के अतीत के महत्वपूर्ण प्रमाण छिपे हो सकते हैं.

झारखंड की भूगर्भीय विविधता इसे वैज्ञानिकों के लिए खास बनाती है. यहां अलग-अलग प्रकार की चट्टानें, प्राचीन भू-संरचनाएं और खनिज संपदा लंबे समय से अध्ययन का विषय रहे हैं. लेकिन अब जरूरत इस बात की है कि खनिज संसाधनों से आगे बढ़कर इन क्षेत्रों को पृथ्वी और जीवन के शुरुआती इतिहास के अध्ययन से भी जोड़ा जाए.
नीतीश प्रियदर्शी कहते हैं, “सिर्फ सिंहभूम में ही नहीं, झारखंड के दूसरे प्राचीन क्षेत्रों में भी शोध की जरूरत है. छोटानागपुर और हजारीबाग जैसे क्षेत्रों में व्यवस्थित रिसर्च हो तो करोड़ों-अरबों साल पुराने कई और एविडेंस सामने आ सकते हैं. उस समय की जलवायु कैसी थी, कौन से माइक्रोऑर्गेनिज्म थे और वे किन परिस्थितियों में जीवित रहे इन सवालों के जवाब यहां की चट्टानों से मिल सकते हैं.”
समुद्री हलचल से लेकर शुरुआती जीवन तक
सिंहभूम क्षेत्र का महत्व केवल इसकी उम्र तक सीमित नहीं है. इसकी चट्टानों में पृथ्वी के शुरुआती भूगर्भीय वातावरण और उस दौर में हुई विभिन्न प्राकृतिक प्रक्रियाओं को समझने की संभावनाएं मौजूद हैं. प्राचीन समुद्री वातावरण, भूगर्भीय हलचल और पृथ्वी की सतह में हुए बदलावों के संकेतों का अध्ययन वैज्ञानिकों को उस समय की परिस्थितियों की तस्वीर बनाने में मदद कर सकता है.

यही कारण है कि सिंहभूम क्रेटन का अध्ययन केवल झारखंड के लिए स्थानीय महत्व का विषय नहीं है. यह पृथ्वी के शुरुआती इतिहास को समझने वाले वैश्विक वैज्ञानिक शोध का हिस्सा है. अगर आगे के शोध से चट्टानों में मिले साक्ष्यों की प्रकृति और स्पष्ट होती है, तो यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि पृथ्वी के शुरुआती समुद्री और भूगर्भीय वातावरण में जीवन के लिए कैसी परिस्थितियां मौजूद थीं.
झारखंड में चाहिए आधुनिक रिसर्च की सुविधा
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी खोजों के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि झारखंड में आगे का वैज्ञानिक शोध कैसे और कहां होगा. अगर राज्य में ही आधुनिक प्रयोगशालाएं, अत्याधुनिक उपकरण और विशेषज्ञों के लिए शोध का वातावरण उपलब्ध हो, तो वैज्ञानिकों को नमूनों की जांच के लिए बाहर निर्भरता कम करनी पड़ेगी.

नीतीश प्रियदर्शी ने झारखंड सरकार से वैज्ञानिक शोध के लिए बेहतर आधारभूत संरचना विकसित करने की जरूरत बताई. उन्होंने कहा “झारखंड सरकार से मेरी अपील है कि वैज्ञानिक शोध के लिए यहां बेहतर और सुरक्षात्मक वातावरण तैयार किया जाए. रिमोट एरिया में काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए सुविधाएं और लैब की जरूरत है. झारखंड में ऐसी कई जगहें हैं जहां अभी रिसर्च हुआ ही नहीं है. पुराने जियोलॉजिस्ट के रिसर्च को दोबारा पढ़ने के साथ-साथ नए सिरे से आधुनिक तकनीक के जरिए अध्ययन करने की जरूरत है.”
उनका कहना है कि झारखंड में वैज्ञानिकों के लिए शोध के रास्ते खोलने की जरूरत है. राज्य के कई दुर्गम और प्राचीन भूभाग अभी भी व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन की प्रतीक्षा कर रहे हैं. झारखंड के भूगर्भीय इतिहास को नए सिरे से पढ़ने का मौका सिंहभूम क्रेटन से जुड़े इस शोध ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि झारखंड की धरती के नीचे आखिर कितने पुराने रहस्य सुरक्षित हैं. अब तक राज्य की पहचान मुख्य रूप से खनिज संपदा, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के लिए होती रही है. लेकिन भूगर्भीय दृष्टि से झारखंड की पहचान इससे कहीं ज्यादा व्यापक है.

यहां की प्राचीन चट्टानें पृथ्वी के उस दौर की कहानी अपने भीतर समेटे हो सकती हैं, जब वर्तमान महाद्वीपों का स्वरूप भी आज जैसा नहीं था. ऐसे में सूक्ष्मजीवों के संभावित साक्ष्य केवल जीवाश्म या चट्टान का अध्ययन भर नहीं हैं, बल्कि वे यह समझने का जरिया हो सकते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत और विकास किन परिस्थितियों में हुआ.
नीतीश प्रियदर्शी के शब्दों में, “झारखंड का भूगर्भीय इतिहास इतना पुराना और समृद्ध है कि अगर यहां व्यवस्थित तरीके से रिसर्च किया जाए तो कई अद्भुत चीजें सामने आ सकती हैं. संभव है कि आने वाले समय में झारखंड के भूगर्भीय इतिहास को नए सिरे से लिखने की जरूरत पड़े. यहां वैज्ञानिकों के लिए बहुत कुछ खोजने को है.”

आगे की राह
अब सबसे जरूरी है कि इस रिपोर्ट को शुरुआती वैज्ञानिक संकेत के रूप में लेते हुए व्यापक और बहु-विषयक शोध शुरू किया जाए. भूविज्ञान, जीवाश्म विज्ञान, सूक्ष्मजीव विज्ञान और पृथ्वी विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञ मिलकर यदि सिंहभूम क्रेटन और झारखंड के अन्य प्राचीन भूभागों का अध्ययन करें, तो शुरुआती पृथ्वी की परिस्थितियों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हो सकती है.

झारखंड की धरती अब जीवन की खोज और इतिहास की प्रयोगशाला बनने जा रही है. सिंहभूम क्रेटन की यह कहानी झारखंड को केवल खनिजों की धरती नहीं बल्कि पृथ्वी के इतिहास की एक जीवित प्रयोगशाला के रूप में सामने लाती है. 3.5 अरब साल पुराने संभावित जीवन के संकेत अगर आगे के वैज्ञानिक परीक्षणों में और पुष्ट होते हैं, तो झारखंड का नाम पृथ्वी पर जीवन के शुरुआती अध्याय को समझने वाले वैश्विक शोध में और मजबूती से दर्ज हो सकता है.
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