कहीं आप बच्चों का बचपन तो छीन नहीं रहे, घंटों स्क्रॉल करते हैं रील्स तो ये खबर आपके लिए
सोशल मीडिया के दौर में रील्स का प्रचलन बढ़ा है. जो पेरेंट्स बच्चों के साथ रील्स बना रहे उसको लेकर आगे पढ़ें महत्वपूर्ण खबर

Published : December 22, 2025 at 8:46 PM IST
पटना : आज रील्स केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि आय का एक बड़ा जरिया भी बन चुका है. खासकर युवा वर्ग लड़के और लड़कियां रील्स के जरिए पहचान, लोकप्रियता और अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं. हालांकि इस चमकदार दुनिया के पीछे एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है क्या रील्स का बढ़ता प्रभाव बच्चों के मानसिक विकास के लिए खतरनाक साबित हो रहा है?
राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग का सर्वे : रील्स बनाने के बढ़ते प्रचलन को लेकर राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने एक सर्वे करवाया है. कुल 40 लाख 8 हजार 765 परिवार के लोगों से इसको लेकर ऑनलाइन सर्वेक्षण करवाया गया. इस सर्वेक्षण में 28 लाख 7 हजार से अधिक अभिभावकों ने माना कि बच्चे पर रील्स और वीडियो बनाने का रुझान बढ़ा है.
इसके पीछे यह कारण है कि बच्चों के वीडियो और रील्स लोग ज्यादा पसंद करते हैं. बच्चों के वीडियो पर ज्यादा लाइक और व्यू मिलता है. 8 लाख से अधिक लोगों ने माना कि वे रील्स बनाने की गतिविधियों से जुड़े हैं. दिन भर में औसतन 3 घंटा रील्स से जुड़े रहते हैं.

अध्ययन के आंकड़े चौंकाने वाला : राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के अध्ययन में यह बात सामने आया है कि रील्स बनाने में पुरुष से ज्यादा महिलाएं इंवॉल्व रहती हैं. इतना ही नहीं बच्चों के स्कूल आने जाने के रास्ते से लेकर घर के अंदर हर छोटे-छोटे चीजों के ऊपर रील्स बनाया जा रहा है. रील्स बनाने के कारण बच्चे चिड़चिड़े और जिद्दी हो गए हैं. किसी किसी वीडियो शूट में बच्चों का नखरा और गुस्सा देखा जा रहा है.
रील्स का प्रभाव : बिहार बाल संरक्षण आयोग के सदस्य राकेश कुमार सिंह ने ईटीवी भारत से बातचीत में बताया कि हमलोग भी राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे हैं. जहां तक रील्स बनाने की बात है तो अब हर घर में यह प्रचलन होता जा रहा है छोटे-छोटे बच्चे मोबाइल चलाने के आदी हो रहे हैं.
"माता और पिता को रील्स बनाने की आदत हो गयी है. जिसके कारण बच्चे जब स्कूल से आ रहे हैं या खेलने के लिए जा रहे हैं उस बीच में भी उनकी इच्छा होती है कि बच्चे उनके साथ रील्स बनाएं. कहीं-कहीं तो यह भी देखा जा रहा है कि अपने आप को फ्री रखने के लिए पेरेंट्स बच्चों को मोबाइल दे देते हैं."- राकेश कुमार सिंह, सदस्य, बिहार बाल संरक्षण आयोग
जागरूकता अभियान की जरूरत : राकेश कुमार सिंह ने बताया कि हम लोग अक्सर देखते हैं कि सोशल मीडिया के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है. हम लोग जहां भी बाल संरक्षण से जुड़े हुए कार्यक्रम में जाते हैं लोगों से अनुरोध करते हैं कि बच्चों के ऊपर सोशल मीडिया का जबरदस्ती दबाव न बनाया जाए.
"बिहार बाल संरक्षण आयोग इसको लेकर एक योजना बना रहा है ताकि लोगों के बीच जागरूकता पैदा की जा सके कि अपने बच्चों की भविष्य के साथ खिलवाड़ ना करें. बच्चों के भविष्य को संभालने के लिए आयोग जल्द अभियान शुरू करेगा."- राकेश कुमार सिंह, सदस्य, बिहार बाल संरक्षण आयोग

क्रिएटर्स का तर्क : पटना की रील्स क्रिएटर आशा चंद्रवंशी का कहना है कि वह बहुत दिनों से रील्स बनाती हैं. रील्स बनाने का मुख्य कारण है कि वह अपने पर्सनालिटी को लोगों को दिखा सकती हैं. हर आदमी में कुछ अपना टैलेंट होता है हर आदमी रील्स नहीं बना सकता है. सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करने के लिए जो क्रिएटर हैं उसके बीच एक कॉन्फिडेंस होता है कि जो हमने बनाया है वह लोगों को पसंद आएगा उसके बाद ही वह पोस्ट करते हैं.
"हां यह सही है कि बच्चों के अंदर लाइक और व्यू की जानकारी नहीं रहती है. बच्चे अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीना चाहते हैं. यदि खेल के बीच में उनका जबरदस्ती रील्स में इंवॉल्व किया जाता है इसके लिए वह हमेशा तैयार नहीं रहते हैं. यही कारण है कि जबरदस्ती यदि बच्चों के साथ कोई रील्स बनाता है तो उसमें चिड़चिड़ापन आ जाता है."-आशा चंद्रवंशी, रील्स क्रिएटर

सोशल मीडिया से दूरी की जरूरत : बचपन बचाओ अभियान से जुड़ी सारिका कुमारी चौहान का मानना है कि आजकल घर के पेरेंट्स खासकर महिलाएं घर में रहकर रील्स बना रही हैं. रील्स बनाने के दौरान वह लोग इसमें बच्चों को इंवॉल्व करती हैं. बच्चों के पेरेंट्स को नहीं पता रहता है कि बच्चा खेलने जाना चाह रहा है या स्कूल का होमवर्क बना रहा है. यही कारण है कि बच्चे यह नहीं चाहते हैं कि अपना समय खराब कर वह रील्स बनाये.
"यदि कोई माता-पिता खाली समय में रील्स बनाते हैं तो वह ठीक है लेकिन यदि बच्चों के समय को इग्नोर करके इसमें शामिल रहते हैं तो बच्चों में इसको लेकर गलत प्रभाव पड़ता है. माता-पिता को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि बच्चों को इसमें इतना ही इंवॉल्व करें जिससे उसके स्वभाव पर कोई प्रभाव न पड़े. पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह जरूरी है कि उन्हें बहुत ज्यादा सोशल मीडिया से दूर रखा जाए."- सारिका कुमारी चौहान, सदस्य, बचपन बचाओ अभियान

मनोचिकित्सक की राय : वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ बिंदा सिंह का मानना है कि रील्स को लेकर बच्चों के साथ जो हो रहा है वह सही नहीं है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि यदि आपको लूडो खेलने की इच्छा नहीं है और कोई आपको बार-बार जबरदस्ती कहे की चलो लूडो खेलते हैं तो आपको भी गुस्सा आएगा.
"आमतौर पर रील्स बनाने वाले क्रिएटर अपने आप को प्रमोट करने के लिए या पैसा कमाने के लिए रील्स बनाते हैं. बच्चों का मन बहुत ही चंचल होता है और उसे अपने साथ इंवॉल्व करने के लिए उसपर तरह-तरह का इंस्ट्रक्शन दिया जाता है कि ऐसे खड़े रहो ऐसे बैठो, इसका गलत प्रभाव बच्चों पर पड़ता है."- डॉ बिंदा सिंह, वरिष्ठ मनोचिकित्सक

बच्चों के मेंटल हेल्थ पर प्रभाव : डॉ बिंदा सिंह का कहना है कि इस तरीके के व्यवहार से बच्चे का कंसंट्रेशन खत्म हो जाता है. पढ़ाई की तरफ उनकी रुचि कम होने लगती है. दूसरी तरफ बच्चे छोटी उम्र से ही यह सोचने लगते हैं कि रील्स के माध्यम से भी पैसा कमाया जा सकता है. इस तरीके के व्यवहार से बच्चों के माता-पिता को बचना चाहिए. एक तरह से यह बच्चों के ऊपर बाल अपराध है. बच्चों की मासूमियत को खत्म किया जा रहा है.

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