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Yearender 2025: साल के अंत तक चरम पर पहुंचे मानव वन्यजीव संघर्ष के रिकॉर्ड्स, पर्वतीय जिले बने आतंक के गवाह

मानव आबादी के बीच वन्यजीवों की गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं, जिससे मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं.

UTTARAKHAND WILDLIFE TERROR
उत्तराखंड में हमलावर हुए वन्यजीव (Photo- ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : December 30, 2025 at 6:15 AM IST

5 Min Read
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नवीन उनियाल

देहरादून (उत्तराखंड): साल 2025 खत्म होते-होते मानव वन्यजीव संघर्ष अपने चरम पर जाता हुआ दिखाई दिया. इस बार भालू साल के अंत में काफी ज्यादा सक्रिय दिखाई दिए, नतीजा ये रहा है संघर्ष के आंकड़े बढ़ते हुए नजर आए. खासतौर पर पहाड़ी जनपद में भालू के आतंक से लोग दहशत में हैं. लोग वन विभाग से भालूओं के आतंक से निजात दिलाने की मांग कर रहे हैं.

मानव–वन्यजीव संघर्ष गंभीर चिंता का विषय: साल 2025 खत्म होते-होते उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बनकर उभरा है. इस बार साल के आखिरी महीनों में वन्यजीवों की सक्रियता में अचानक बढ़ोतरी देखने को मिली, जिसमें गुलदार के साथ-साथ भालू भी संघर्ष के केंद्र में रहे. खासतौर पर प्रदेश के पर्वतीय जनपद इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित दिखाई दिए, जहां जंगल और आबादी के बीच टकराव लगातार बढ़ता चला गया.

डरा रहे मानव वन्यजीव संघर्ष के रिकॉर्ड्स (ETV Bharat)

पर्वतीय इलाकों को खूखार होते वन्यजीव: उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन इस वर्ष इसका स्वरूप और अधिक गंभीर रहा. पहाड़ी जिलों में ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ सड़कों और बस्तियों में भी वन्यजीवों की मौजूदगी बढ़ी, जिससे लोगों में दहशत का माहौल बना. कई स्थानों पर लगातार हो रही घटनाओं के बाद ग्रामीणों का आक्रोश भी सामने आया और लोगों ने सड़कों पर उतरकर वन विभाग और सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए. कुछ क्षेत्रों में हालात इतने बिगड़ गए कि ग्रामीणों ने वन्यजीवों को मारने की मांग तक उठा दी.

क्या कह रहे जिम्मेदार अधिकारी: प्रमुख मुख्य वन संरक्षक हॉफ आरके मिश्रा का कहना है कि साल 2025 भालुओं के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील रहा. उन्होंने बताया कि भोजन की कमी के चलते भालू आबादी की ओर आए, हालांकि वन विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों में चौकसी बढ़ाकर और त्वरित कार्रवाई के जरिए घटनाओं को नियंत्रित करने का प्रयास किया.

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वन्यजीवों हमलों को रोकने में वन महकमा नाकाम (Photo - Forest Department)

भालू की धमक ने सबको किया हैरान: बढ़ते दबाव के चलते वन विभाग को कई संवेदनशील इलाकों में वन्यजीवों को ट्रेंकुलाइज करने और कुछ मामलों में मारने तक के आदेश देने पड़े. हालांकि विभाग का कहना है कि यह कदम केवल अत्यधिक आपात परिस्थितियों में ही उठाया गया. प्रदेश में गुलदार लंबे समय से मानव–वन्यजीव संघर्ष की सबसे बड़ी चुनौती रहा है और साल 2025 में भी गुलदार के हमलों से कई जिले प्रभावित हुए. लेकिन साल के अंत तक एक नई और गंभीर समस्या के रूप में भालुओं की बढ़ती सक्रियता सामने आई. दिसंबर के महीने में कई इलाकों में भालू आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंचते दिखाई दिए, जिससे संघर्ष की घटनाओं में तेज इजाफा हुआ.

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पर्वतीय अंचलों में बढ़ते जा रहे वन्यजीवों के हमले (Photo - Forest Department)

वन विभाग के प्रयासों से बढ़ी वन्यजीवों की संख्या: राजाजी टाइगर रिजर्व के ऑनरेरी वार्डन राजीव तलवार का कहना है कि वन्यजीवों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी भी संघर्ष की बड़ी वजह है. संरक्षण के बेहतर प्रयासों से वन्यजीवों की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही इंसानों और जंगलों के बीच टकराव भी बढ़ रहा है, जो अब एक गंभीर प्रबंधन चुनौती बन चुका है.

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भोजन की तलाश में आबादी का रुख (ETV Bharat Graphics)

आबादी की ओर इसलिए रुख कर रहे वन्यजीव: वन विभाग के अनुसार भालुओं के निचले इलाकों की ओर आने की प्रमुख वजह उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भोजन की कमी मानी जा रही है. प्राकृतिक खाद्य स्रोत कम होने के कारण भालू खाने की तलाश में मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं, जहां इंसानों से आमना-सामना होने पर हमले की घटनाएं सामने आ रही हैं.

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वन्यजीवों के हमले चिंता का विषय (ETV Bharat Graphics)

मानव वन्यजीव संघर्ष के चौकाने वाले आंकड़े: आंकड़ों पर नजर डालें तो जनवरी 2525 से 25 दिसंबर तक मानव–वन्यजीव संघर्ष में मरने वालों की संख्या 63 तक पहुंच चुकी थी, जबकि 470 लोग इन हमलों में घायल हुए. यानी पूरे साल में कुल 533 घटनाएं दर्ज की गईं. यह आंकड़े बताते हैं कि राज्य में औसतन हर दिन एक से अधिक मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटना सामने आई.

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आंकड़े कर रहे तस्दीक (ETV Bharat Graphics)

कई जिलों में वन्यजीवों का आतंक: पर्वतीय जनपद इस बार सबसे ज्यादा आतंक के गवाह बने, चमोली से लेकर उत्तरकाशी और पौड़ी से लेकर पिथौरागढ़, बागेश्वर और नैनीताल तक भी मानव वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं सुनने को मिलती रही. हालांकि सबसे ज्यादा उत्तरकाशी, चमोली और पौड़ी जनपद में शिकारी वन्यजीवों के दिखाने से आतंक की स्थिति बनी रही और जिला प्रशासन के साथ वन विभाग की सक्रियता भी सबसे ज्यादा इन्हीं जिलों में दिखाई दी. कुछ क्षेत्रों में तो स्कूलों की टाइमिंग भी बदलनी पड़ी और लगातार शिकारी वन्यजीवों के दिखने से कर्फ्यू जैसे भी हालत बन गए.

सीएम धामी ने जारी किया बयान: बड़ी बात यह थी कि खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को भी कई बार इसके लिए बयान जारी करने पड़े और अधिकारियों को दिशा निर्देश जारी करते हुए सख्त कार्रवाई के लिए कहा गया. इतना ही नहीं पौड़ी के डीएफओ को हटाने तक के भी आदेश मुख्यमंत्री की तरफ से दे दिए गए. यह सब बातें बताती है कि कैसे इस बार साल खत्म होते-होते यह समस्या एक बड़ी मुसीबत बन गई.

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