वजन घटाने का सुपरफ्रूट, नालंदा के पांच गांव में खेती कर लाखों कमा रहे किसान
अब दक्षिण अफ्रीका के अलावा बिहार में भी रसभरी की खेती हो रही है. नालंदा के पांच गांव के किसान लाखों का मुनाफा कमा रहे.

Published : December 10, 2025 at 7:14 PM IST
रिपोर्ट: महमूद आलम
नालंदा: आलू-प्याज और अन्य सब्जियों की खेती के लिए देशभर में मशहूर बिहार का नालंदा अब कृषि के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत कर चुका है. यहां के किसान परंपरागत फसलों की खेती को छोड़कर विदेशी फलों की खेती से नई पहचान बना रहे हैं. विदेशी फल रसभरी की मांग भी खूब होती है. रसभरी को वजन कम करने में काफी मददगार माना जाता है, क्योंकि इसमें कैलोरी कम होती है. एक कप रसभरी में करीब 64 कैलोरी होती है. इसमें फाइबर की उच्चता के कारण पेट भरा होने का एहसास होता है.
नालंदा में रसभरी की खेती: जिला मुख्यालय बिहारशरीफ से 7 किमी दूर स्थित सिलाव प्रखंड के 5 गांव में विदेशी फल की खेती हो रही है. दक्षिण अफ्रीका में पाया जाने वाला जन औषधीय गुणों से भरपूर रसभरी (मक्को) फल की खेती कर किसान बड़े पैमाने पर मुनाफा कमा खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं.
"रसभरी फल इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन-सी, पॉलीफेनॉल आदि पाए जाते हैं. इस फल में कैलोरी की मात्रा कम होती है, इसलिए नाश्ते के तौर पर भी खाया जा सकता है. इससे वजन कम करने में मदद मिलती है. इससे आंखों की रौशनी बढ़ती है, पाचन शक्ति मजबूत होता है. बीपी मरीज का ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करता है. हड्डियां को मजबूत करने के साथ वजन घटाने के अलावा सर्दी और फ्लू से बचाता है."- डॉ. चंद्र भूषण, आयुर्वेदिक चिकित्सक

इन पांच गांवों में होती है मक्को की खेती: मक्को की खेती कर रहे किसान मो. अहमद और मो. शहजाद ने ईटीवी भारत से बात कर बताया कि यहां आसपास के 5 गांव सबबैत, रानी बिगहा, रघु बिगहा, नियामतपुर और जुआफर के दर्जनों किसान इसी मक्को फल की खेती से अपने परिवार का जीविकोपार्जन चला रहे हैं.

"सबबैत गांव में 50-60 बिगहा में मक्को की खेती होती है. 40 से 50 हजार कमा लेते हैं. खेती के अलावा हम कुछ नहीं करते हैं. खेती के बाद हम दूसरा काम करते हैं. कोलकाता, हैदराबाद, दिल्ली और विदेश भी भेजते हैं."- मो. शहजाद, सबबैत गांव के किसान

किसानों को लाखों का फायदा: यह फल 3 से 4 महीने में तैयार हो जाता है और इसे खाने में खट्टा मीठा लगता है. यहां 50 से 60 बिगहा जमीन में मक्को फल की खेती होती है. एक पौधे में 5 से 10 फल लगता है. एक बिगहा में मक्को की खेती की लागत 40 हजार रुपए आती है, जबकि उसका फायदा डेढ़ से दो गुना यानी कि एक लाख से डेढ़ लाख रुपए तक का होता है.
"हम 15 साल से रसभरी की खेती कर रहे हैं. 1 बिगहा में कर रहे हैं. 10-20 हजार कमा लेते हैं.देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेश भी मक्को जाता है. बड़े व्यापारी खरीद कर ले जाते हैं. पांच महीने में फल तैयार हो जाता है."- मो. अहमद, किसान

नालंदा में इसकी कीमत 100-150 रुपए प्रति किलो : मक्को फल के बुआई जुलाई में बीज का छिड़काव कर होती है और जनवरी के मौसम में तैयार होकर बाजार में यह बिकने के लिए आता है. मक्को फल निकलने के बाद इसकी स्थानीय बाजार की कीमत 100 रुपए से लेकर 150 रुपए प्रति किलो तक होती है.
दूसरे देश में 1000 से 1200 रुपए में बिकता है रसभरी: दूसरे देश के बड़े व्यापारी, जब मक्को खरीदने आते हैं, तो इसी दर पर खरीदकर ले जाते हैं. कोलकाता, दिल्ली, झारखंड, ओडिशा, के अलावा पड़ोसी देश बांग्लादेश और गल्फ कंट्री तक से व्यापारी इसी रेट में रसभरी खरीदकर ले जाते हैं और वहां जाकर इसकी कीमत 250 रुपए किलो से लेकर 1000 से 1200 रुपए भारतीय मुद्रा के हिसाब से बिकता है.

बालसुंदरी मिट्टी रसभरी के लिए उपजाऊ: यह फल 3 से 5 दिनों तक खराब नहीं होता है. एक बिगहा मक्को की खेती में 200 से ढाई सौ किलो मक्को फल देता है. जिससे बड़े व्यापारी सालाना करोड़ों रुपए का व्यापार करते हैं. मक्को की खेती कर रहे किसान बताते हैं कि इन जगहों की मिट्टी बालसुन्दरी होने की वजह से मक्को की खेती के लिए उपजाऊ माना जाता है.
सबसे पहले बिहार के किस किसान ने की थी रसभरी की खेती?: नालंदा में रसभरी (मक्को) फल की खेती सबसे पहले इस्लामपुर के दत्तासराय निवासी किसान असगर अली ने किया था. उन्होंने शौक में छत्तीसगढ़ से बीज मंगवाकर 5 कट्ठा में खेती किया था, जिसमें बिना पूंजी के मेहनत कर 50 हज़ार रुपए फ़ायदा हुआ था. वहीं से रसभरी फल की खेती का अन्य किसानों के बीच प्रचार हुआ. अब असगर अली नहीं रहे, लेकिन उनसे बीज लेकर यहां के किसानों ने अपनी किस्मत बदलनी शुरू की, जो अब तक जारी है.

ऐसे होती है खेती: मक्को उपजाने के लिए किसान मक्को का बीज पानी में धोकर निकाल लेते हैं. फिर उसे सुखाते हैं और पौधा होने तक अच्छे से रख देते हैं और बैसाख के मौसम में फिर खेत में उसी पौधे को रोप दिया जाता है. इसके अलावा कंपोस्ट खाद का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. अच्छी फसल के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे उर्वरकों को उपयोग में लाया जा सकता है. फल आने के बाद जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए गांव के किसान पहरेदारी भी करते हैं.

सेहत के लिए लाभदायक: नूरसराय उद्यान महाविद्यालय की फ्रूट एक्सपर्ट डॉ. प्रीति बताती हैं कि "रसभरी (मक्को) पौष्टिक आहार का काम करता है. यह इम्युनिटी बूस्ट के साथ पेट की परेशानी से भी बचाता है. इसमें पॉलीफेनॉल, विटामिन-ए और सी कैल्शियम, फास्फोरस जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं."
जैम, सॉस-जेली का निर्माण: मक्को से जैम, सॉस और जेली भी बनाया जाता है. रसभरी की खेती के लिए 20 से 25 डिग्री का तापमान अच्छा माना जाता है, लेकिन 15 डिग्री सेल्सियस के तापमान में भी इसकी खेती हो सकती है. इसके पौधे में जब एक बार फल आना शुरू होता है तो 3 महीने तक भरपूर फल देता है.

खरपतवार बड़ी समस्या: रसभरी की खेती करने के लिए खेत में पानी की निकासी का पर्याप्त प्रबंधन करना होता है. खेत में ज्यादा पानी रहने की स्थिति में इसके पौधे की जड़ें गल सकती हैं. रसभरी की पौध को जमीन से 20 से 25 सेंटीमीटर ऊंची क्यारियों में लगाया जाता है. रसभरी की खेती में एक समस्या खरपतवार की आती है. इसकी पौध में खरपतवार अधिक होती है, इसलिए तीन से चार बार गुड़ाई करनी पड़ती है.

3-4 बार सिंचाई: वहीं इसके खेत में 3 से 4 बार पानी लगाना पड़ता है. रसभरी की खेती के लिए सामान्य गोबर की खाद भी काम करती है. एक हेक्टेयर एरिया में रसभरी की खेती के लिए 200 से 250 ग्राम बीज ही काफी होते हैं. दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में तो इसकी कई वैरायटी के बीज मिल जाते हैं. आजकल इनके बीजों को ऑनलाइन भी मंगवाया जा सकता है.

कहां-कहां रसभरी की होती है खेती: रसभरी (मक्को) की खेती बिहार के नालंदा के अलावा बक्सर और गया जिले के भी पहाड़ी क्षेत्रों में में भी होती है. बक्सर के डुमरावां में प्राकृतिक मार से किसान का यह पेशा खत्म हो गया. बाढ़ के कारण पूरा गांव ही गंगा में विलीन हो गया. इसके साथ ही उत्तर प्रदेश(आगरा), राजस्थान(अजमेर व जयपुर) और दिल्ली और छत्तीसगढ़ और दूसरे देशों में उत्तरी अमेरिका(यूएसए/मैक्सिको), रशिया, पोलैंड, यूके, सर्बिया, यूक्रेन, जर्मनी और उत्तर एशिया के देशों में होती है.
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