डॉ. माधवी लता को रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड, जानें- कैसे दुनिया का सबसे ऊंचा चिनाब पुल बनाने का मिला मौका
बहुत कम इंजीनियर ऐसे काम कर पाते हैं जो इतिहास बन जाता है. डॉ. माधवी लता ने बिना किसी दिखावे के ऐसा ही काम किया.

Published : November 17, 2025 at 5:15 PM IST
|Updated : November 17, 2025 at 7:10 PM IST
हैदराबादः जम्मू-कश्मीर का चिनाब रेल पुल दुनिया की सबसे ऊंची इंजीनियरिंग उपलब्धि कहा जाता है. इसे तैयार करने में डॉ. जी माधवी लता की सराहनीय भूमिका रही है. कठिन भौगोलिक हालात और जोखिम भरी परिस्थितियों के बीच सालों की मेहनत से उन्होंने इस सपने को साकार किया. एफिल टॉवर से भी ऊंचा यह पुल आज उनकी उस क्षमता का प्रतीक है, जो भूगोल, गुरुत्वाकर्षण और भू-राजनीतिक चुनौतियों- तीनों को मात देती है.
रविवार को हैदराबाद में एक भव्य कार्यक्रम में उन्हें पहला रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड 2025 प्रदान किया गया. इस मौके ईटीवी भारत संवाददाता सिद्धार्थ राव ने उनसे खास बातचीत की. डॉ माधवी लता ने गांव की लड़की से लेकर आईआईएससी (Indian Institute of Science) की पहली महिला संकाय सदस्य बनने तक के अपने 'कठिन' सफर के बारे में सहजता से बताया.
सवालः आपने वह मुकाम हासिल किया है, जहां बहुत कम लोग पहुंच पाते हैं. STEM (Science, Technology, Engineering and Mathematics) में प्रवेश करना, IISc में सिविल इंजीनियरिंग की पहली महिला प्रोफ़ेसर बनना और दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे पुल पर काम करना, कैसा रहा?
जवाबः जब आप IISc के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में पहली महिला संकाय सदस्य कहते हैं, तो मैं कहूंगी कि किसी न किसी को तो पहली महिला होना ही था, और मैं बनी. दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे पुल का डिजाइन तैयार करने वाली टीम का हिस्सा बनकर, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है और मैं गर्व से भर गई हूं.
सवालः सिविल इंजीनियरिंग ने आपको चुना, या आपने सिविल इंजीनियरिंग को चुना. खासकर जब महिलाओं के "कठिन" इंजीनियरिंग क्षेत्रों में प्रवेश को लेकर रूढ़िवादी धारणाएं हैं?
जवाबः शायद दोनों. दरअसल, सिविल इंजीनियरिंग मेरे रास्ते में आई. सच कहूं तो, मैं कभी इंजीनियर नहीं बनना चाहती थी. मैं डॉक्टर बनना चाहती थी. मैंने इंजीनियरिंग इसलिए चुनी क्योंकि मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. उन्हें लगा कि इंजीनियरिंग से मैं जल्दी सेटल्ड हो जाउंगी, जबकि मेडिकल में ज़्यादा समय और पैसा लगता है.
सिविल इंजीनियरिंग भी मेरी पहली पसंद नहीं थी. मुझे इलेक्ट्रॉनिक्स नहीं मिला, इसलिए सिविल मेरी दूसरी पसंद थी. इस क्षेत्र में महिलाओं के बारे में कुछ रूढ़िवादी धारणाएं हैं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं लगता कि लिंग के आधार पर करियर का फैसला करना चाहिए. मैं खुद को किसी भी पुरुष के बराबर मानती हूं. जुनून आपके पेशे को आगे बढ़ाएगा.

सवालः मैकेनिकल और सिविल इंजीनियरिंग को 'कठिन' और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्र माना जाता है. क्या आपको कभी लैंगिक बाधाओं का सामना करना पड़ा?
जवाबः नहीं, मुझे कभी भी महिला होने के कारण किसी भी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा. हां, इस क्षेत्र में शारीरिक श्रम करना पड़ता है, खासकर साइट पर, लेकिन महिलाएं इसे संभाल सकती हैं. महिलाएं अंतरिक्ष में जाकर महीनों तक रह सकती हैं. सिविल इंजीनियरिंग ऐसी चीज नहीं है जिससे महिलाओं को डरना चाहिए. लेकिन अगर कोई 9 से 5 बजे तक की डेस्क जॉब चाहता है, तो यह क्षेत्र उसके लिए नहीं है. अगर आप राष्ट्र निर्माण के लिए जुनूनी हैं, तो यह आपके लिए है.
सवालः आपने राष्ट्र-निर्माण का जिक्र किया और "डरावना" शब्द का भी इस्तेमाल किया, जो कि कई लोग चेनाब पुल को उसकी स्थिति, ऊंचाई और भू-राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण इसी रूप में देखते हैं. आप जैसे-जैसे आगे बढ़ती गयीं, वैसे-वैसे डिज़ाइन" दृष्टिकोण के लिए भी जानी जाती हैं. यह सब कैसे संभव हुआ?
जवाबः "डिज़ाइन-एज़-यू-गो" अवधारणा का उपयोग किसी भी बड़ी, कई वर्षों तक चलने वाली बुनियादी ढांचा परियोजना में किया जाता है. परिस्थितियां बदलती रहती हैं- जैसे चट्टानें समय के साथ अपना आकार बदलती हैं. चिनाब पुल जैसी प्राकृतिक ढलानों पर बनी परियोजनाओं के लिए, यह दृष्टिकोण आवश्यक हो जाता है. यह सिर्फ़ मेरा विचार नहीं था, यह एक वैश्विक सिविल इंजीनियरिंग पद्धति है जिसका उपयोग बहुत कम होता है. भारतीय रेलवे, निर्माण कंपनियां और मेरे जैसे डिज़ाइनर, सभी ने मिलकर काम किया. इस तरह यह पुल आज के रूप में विकसित हुआ.
सवालः तकनीक तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. आधुनिक इंजीनियरिंग में स्थिरता, सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी चिंताएं कैसे समाहित हैं?
जवाबः मैं आईआईएससी में सस्टेनेबल टेक की अध्यक्ष हूं, इसलिए मैं सस्टेनेबिलिटी को गहराई से समझती हूं. कुछ लोग तर्क देते हैं कि सीमेंट और कंक्रीट सस्टेनेबल नहीं हैं, लेकिन सस्टेनेबिलिटी सिर्फ़ सामग्री तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समग्र पर्यावरणीय प्रभाव और जीवनचक्र से भी संबंधित है.
हाल ही में जम्मू में आई बाढ़ के दौरान, चिनाब रेलवे पुल ही एकमात्र जीवनरेखा था. सड़कें बंद थीं, राहत सामग्री और पीड़ितों को इसी रास्ते से पहुंचाया गया. लाखों टन सेब जो सड़ जाते, उन्हें दिल्ली पहुंचाया गया. यही तो स्थायित्व है.
शुरुआत में लोगों ने इस परियोजना का विरोध किया. लेकिन, बाढ़ के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि इसकी क्या जरूरत है. स्थायित्व का मतलब है लोगों को उनके पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित रखना और हमने यह कर दिखाया.
सवालः तो क्या स्थिरता के और भी आयाम हैं, सामग्री और उत्सर्जन से अधिक?
जवाबः बिल्कुल! नदी दो पहाड़ियों के बीच बहती है, और हमने उनके प्राकृतिक मार्ग को प्रभावित किए बिना एक विशाल पुल बनाया है. जम्मू और श्रीनगर के बीच यात्रा का समय 50% कम हो गया है, जिसका अर्थ है सड़क यात्रा से होने वाले उत्सर्जन में भारी कमी. यह भी एक स्थायित्व है.
सवालः आपको STEM में शीर्ष 75 महिलाओं में शामिल किया गया है. महिलाओं द्वारा लैंगिक बाधाओं को तोड़ने के बारे में आपकी क्या राय है?
जवाबः बहुत प्रासंगिक बात. लैंगिक भेदभाव मौजूद है. इसमें एक सीमा है. बदलाव दोनों तरफ से आना चाहिए- महिलाओं को निडर होना चाहिए और उद्योग को महिलाओं की ताकत को पहचानना चाहिए.
महिलाएं अक्सर हर काम को बखूबी अंजाम देती हैं. मैंने पुरुषों को ज़िम्मेदारियों से बचते देखा है, जबकि जुनूनी महिलाएं हर कदम पर आगे बढ़ती हैं. उद्योग जगत समय के साथ इसे समझेगा. हम ज़्यादा महिला सीईओ और महत्वपूर्ण भूमिकाओं में महिलाओं को देख रहे हैं. बदलाव हो रहा है, आप मुझे देख सकते हैं. अभी कुछ केस स्टडीज़ हैं. आगे चलकर, हम और भी कई देखेंगे.
सवालः उन लड़कियों का क्या जिनकी 10 वीं के बाद शादी कर दी जाती है? आज उनके लिए क्या रास्ते हैं?
जवाबः यह एक बहुत ही दर्दनाक सच्चाई है. मेरी भी शादी 13 या 14 साल की उम्र में हो सकती थी. कई गांवों में, कम उम्र में शादी को आज भी एक ज़िम्मेदारी के रूप में देखा जाता है जिससे 'छुटकारा' पाना है. इन लड़कियों में निडर होने का आधार नहीं है. सरकार को उनकी शिक्षा का समर्थन करना चाहिए. व्यवस्थागत बदलाव जरूरी है.
मेरी कहानी पढ़ने के बाद, कई अभिभावकों ने मुझे पत्र लिखकर कहा है कि वे अपनी बेटियों को शिक्षित करेंगे. अभिभावकों को प्रेरित करने के लिए सच्ची कहानियां सामने लानी होंगी. लड़कियां, लड़कों के बराबर हो सकती हैं, लेकिन परिवारों और व्यवस्था को उनका साथ देना होगा.
सवालः आपकी यात्रा- एक पीएचडी, प्रोफेसर, चिनाब ब्रिज इंजीनियर, पुरस्कार विजेता- आप युवा महिलाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी?
जवाबः बड़े सपने देखो, लेकिन अपनी सीमाओं को भी समझो. आसमान में अपना एक कोना ढूंढो. मेरा जीवन उस दिन परिभाषित नहीं हुआ जिस दिन मैं पैदा हुई, बल्कि जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ी, यह विकसित होता गया. मैंने कभी भी अवसरों को नकारा नहीं. मैंने कभी भी संदेह को अपने रास्ते में नहीं आने दिया.
जब मैं उस युवा लड़की को देखती हूं जो मैं कभी थी और आज जो हूं, तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं आज जहां खड़ी हूं, वहां खड़ी हो पाऊंगी. लेकिन मेरे दिल में हमेशा एक सपना था कि मैं उड़ूंगी, कुछ बनूंगी. वो जुनून हमेशा मेरे अंदर था.
पुरस्कार अपने आप मिलते हैं. आज मुझे जो पुरस्कार मिल रहे हैं, वे सिर्फ़ चिनाब पुल के लिए नहीं, बल्कि मेरी पूरी मेहनत के लिए हैं. पुरस्कार तब मिलते हैं जब आप लगातार कड़ी मेहनत करते हैं.
सवालः अपनी पढ़ाई के बारे में बताएं
मैंने बारहवीं तक तेलुगु माध्यम से पढ़ाई की. इंजीनियरिंग में अंग्रेज़ी सीखने में दिक्कत हुई. मैं बहुत शर्मीली थी. लेकिन मैंने खुद से कहा कि मैं अपनी दुनिया जीत लूंगी. कोई भी लड़की ऐसा कर सकती है, बस हालात और हिम्मत का फर्क़ है. लगातार प्रयास करते रहो, कभी हार मत मानो. अपनी योग्यता से कम पर कभी समझौता मत करो.
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