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रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड विजेता सथुपति प्रसन्नाश्री बोलीं, 'आदिवासी समुदायों की भाषाओं का संरक्षण जरूरी, पहचान का सबसे शक्तिशाली आधार है भाषा'

रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड विजेता प्रोफेसर सथुपति प्रसन्नाश्री ने आदिवासी भाषाओं के संरक्षण में अपने अभूतपूर्व कार्य के बारे में ईटीवी भारत से बात की.

Ramoji Excellence Awards 2025 Winner Sathupati Prasanna Sree speaks on tribal identity and languages
रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड विजेता प्रोफेसर सथुपति प्रसन्ना श्री (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : November 17, 2025 at 5:05 PM IST

10 Min Read
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हैदराबाद: आंध्र प्रदेश में कुलपति के रूप में सेवा करने वाली पहली आदिवासी महिला प्रो. सथुपति प्रसन्ना श्री भारत की सबसे प्रभावशाली भाषाविदों में से एक हैं. उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासी समुदायों की भाषाओं के संरक्षण के माध्यम से उनकी गरिमा और पहचान के लिए संघर्ष करते हुए बिताया है. विलुप्त होती बोलियों का दस्तावेज तैयार करने से लेकर सिर्फ मौखिक परंपराओं के रूप में मौजूद भाषाओं के लिए लिपियां बनाने तक, उनके कार्य ने लंबे समय से हाशिये पर पड़े समूहों को सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से पहचान दिलाई है.

प्रो. सथुपति प्रसन्ना श्री को कला और संस्कृति श्रेणी में रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड 2025 से सम्मानित किया गया. उन्होंने ईटीवी भारत के सिद्धार्थ राव से भाषा विज्ञान में अपनी यात्रा, भावनात्मक और सामाजिक वास्तविकताओं के बारे में बात की, जिन्होंने उनके मिशन को आकार दिया. उन्होंने बताया कि वह क्यों मानती हैं कि भाषा पहचान का सबसे शक्तिशाली आधार बनी हुई है.

पढ़िए इंटरव्यू के कुछ अंश:

सवाल: स्टुअर्टपुरम (Stuartpuram आंध्र प्रदेश के बापटला जिले में एक गांव) से लेकर आज आप जिस ऊंचाइयों पर हैं, इस यात्रा की आपकी क्या यादें हैं?

जवाब: ज्यादातर लोग मान लेते हैं कि मैं स्टुअर्टपुरम से हूं; असल में, मैं वहां से नहीं हूं. मेरे दादाजी एक शिक्षक और एक स्कूल के प्रधानाध्यापक थे. मेरे पिता ने 14 साल की उम्र में गांव से अपनी यात्रा शुरू की. वे विशाखापत्तनम आ गए. चूंकि वे रेलवे में काम करते थे, इसलिए हमें कई जगहों पर जाना पड़ा. स्टुअर्टपुरम से मेरे पिता नहीं, बल्कि मेरे दादाजी थे.

कला और संस्कृति श्रेणी में रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड 2025 से सम्मानित प्रो. सथुपति प्रसन्ना श्री से विशेष बातचीत (ETV Bharat)

सवाल: हमारे देश में पढ़ाई का एकतरफा तरीका देखने को मिलता है, या तो इंजीनियर बनना है या डॉक्टर. किस बात ने आपको भाषाओं या भाषाविज्ञान की ओर आकर्षित किया?

जवाब: यह कोई योजनाबद्ध यात्रा नहीं थी. मुझे यह यात्रा लगभग मजबूरी में करनी पड़ी क्योंकि कुछ ऐसे मुद्दे थे जो आपको परेशान करते हैं और आपकी आंतरिक शांति को छिन्न-भिन्न कर देते हैं. ये आपकी मानसिकता के भावनात्मक ताने-बाने को तहस-नहस कर देते हैं. जब यह भटकाव शुरू होता है, और जब कोई साथी आपको इंसान के रूप में नहीं पहचानता, तो यह खुद ही आपको चीजों पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करता है.

तभी मैंने सोचना शुरू किया कि "मेरे साथ ठीक से व्यवहार क्यों नहीं किया जाता?" ऐसा नहीं है कि मैं कमतर हूं और कोई और श्रेष्ठ है. वे जैसे हैं वैसे ही हैं. हम भी एक हैं. सामाजिक ताने-बाने में ये असमानताएं, भावनात्मक उत्पीड़न... जब मुझमें सारे (जरूरी) गुण हैं, तो मुझे परेशान और विचलित क्यों किया जा रहा है? यही मेरा विचार था.

मुझे एहसास हुआ कि यह सिर्फ मेरे साथ ही नहीं है. हजारों-हजार लोगों, मेरे पूर्वजों के साथ सिर्फ इसलिए दुर्व्यवहार और उत्पीड़न किया गया क्योंकि उनकी पहचान स्टुअर्टपुरम जैसी जगह से जुड़ी थी. मूल रूप से, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई स्टुअर्टपुरम का है या बेंगलुरु का. बात यह है कि ये आदिवासी समूह हैं. उनके पास औपचारिक शिक्षा भले ही न हो, लेकिन उनके पास भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक बुद्धि है. उनका दिमाग बहुत अच्छी तरह काम करता है. लेकिन उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है, खासकर किसी लिपिबद्ध भाषा के रूप में.

जब आपके पास उस तरह की पहचान नहीं होती, तो लोग आपको महसूस कराते हैं कि आप उनके बराबर नहीं हैं. आपकी पहचान उनसे कमतर है. आपको उनके चरणों में बैठना चाहिए. इसलिए शिक्षा बहुत बड़ा अंतर लाती है. एक स्क्रिप्ट बहुत बड़ा अंतर पैदा करती है, क्योंकि जब आप शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे होते हैं, अगर आप दौड़ में आगे नहीं हैं, तो लोग आपको अपने आप नीचे धकेल देते हैं.

सवाल: आप भाषाओं को पहचान और किसी के साथ व्यवहार करने के तरीके के रूप में बता रही हैं. क्या यही बात आपको इन लुप्तप्राय भाषाओं की ओर आकर्षित करती है और इन लिपियों के निर्माण पर काम करने के लिए प्रेरित करती है?

जवाब: जब मैंने शुरुआत में ऐसा करना चाहा था, तो मैं बिना किसी मंजिल के आगे बढ़ा रही थी. लेकिन जब मैंने हालात पर नियंत्रण करना शुरू किया, तो मुझे अपने आस-पास की समस्याओं की गंभीरता का एहसास हुआ और तब मुझे एहसास हुआ कि सिर्फ मैं ही नहीं, ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी इस तरह की रोशनी नहीं देखी. उनके माता-पिता पढ़े-लिखे नहीं थे, और वे खुद भी पढ़े-लिखे नहीं थे.

जब मैंने इन सब के बारे में सोचा, तो मुझे याद आया कि भारत की लगभग 7% आबादी आदिवासी है. देश भर में, खासकर आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश में, आदिवासियों की यही दुर्दशा है. ये सभी राज्य ऐसे हैं जहां आदिवासी समुदाय छोटे-छोटे इलाकों में रहते हैं. यह लगभग उन सभी आदिवासियों की कहानी है जिनकी भाषाएं अज्ञात हैं. उनकी अपनी भाषाएं हैं जिन्हें हम मौखिक साहित्य कहते हैं.

समय के साथ, मुझे लगा कि अगर आप किसी खास क्षेत्र में एक भाषा बोल पाते हैं, तो उस भाषा में जान आ जाती है. लेकिन जब राज्य-प्रधान भाषाएं आ जाती हैं, या पड़ोसी भाषाएं आ जाती हैं, तो आपकी भाषा का मूल रूप, उसका बंधन, अपना स्वाद खो देता है. इसलिए आपको अपनी पहचान की जरूरत है, और उसके साथ ही आपको अपनी भाषा की भी जरूरत है और आपकी भाषा की एक लिपि होनी चाहिए.

सवाल: आपने कहा कि ये मौखिक परंपराएं हैं, मौखिक साहित्य है, बिना किसी लिपि के. तो जब आप मौखिक साहित्य वाली एक ऐसी भाषा लेते हैं जो पीढ़ियों से मौखिक रूप से विकसित और आगे बढ़ी है, और आप उसकी लिपि बनाने का फैसला करती हैं, तो क्या आपको बिल्कुल नए सिरे से शुरू करना होगा?

जवाब: उन दिनों आदिवासी अपने ही क्षेत्र में रहते थे, और उनके पूर्वज मौखिक साहित्य के माध्यम से, जिसे आप "परिवार व्यवस्था" कह सकते हैं, सब कुछ आगे बढ़ाते थे. लेकिन आज, हमारी आदिवासी पहचान पर दूसरी भाषाओं का दबाव बढ़ रहा है, और फिर होता यह है कि लोग धीरे-धीरे खुद को आदिवासी कहना ही छोड़ देते हैं.

एक बार जब मेरी पहचान दुनिया के सामने आ जाती है, कि मैं एक आदिवासी हूं, तो सब मुझे नीची नजरों से देखने लगते हैं. उनकी मानसिकता इतनी जड़ हो चुकी है कि वे मुझे एक शिक्षित आदिवासी के रूप में देखते ही नहीं. वे सिर्फ उस जनजाति को देखते हैं जो कभी जंगलों में रहती थी, पुरानी पारंपरिक व्यवस्थाओं के साथ. यही उनकी एकमात्र छवि है. लेकिन मैं कहती हूं: वे लोग भी बुद्धिमान थे, और उनमें उस भाषा से जुड़ने की एक विशेष क्षमता थी जिसे आप ब्रह्मांड की भाषा कह सकते हैं और वे इसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने में सक्षम रहे.

आज आप जो हैं, कल आपको याद नहीं रहेगा. हमारे मन पर, हमारी जीवनशैली पर (आधुनिक समय में) इतने सारे प्रभाव हावी हैं. इन सभी प्रभावों के बोझ तले, मुझे लगा कि हमें एक ऐसी पहचान की जरूरत है जो आपको अपनेपन का एहसास दिलाए, कि आप एक खास कुल, एक खास जनजाति से आते हैं. यही आपकी संस्कृति है.

इसे समझें: हममें से हर किसी को अपनी सांस्कृतिक पहचान की जरूरत है. भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. अमेरिकी या पश्चिमी समाज हमें जिज्ञासा से क्यों देखते हैं? क्योंकि हमारी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है. यह इस बात से ज्यादा मायने रखती है कि आप मलयाली हैं, तमिल हैं या कुछ और. जब आप विदेश जाते हैं, तो कोई नहीं पूछता कि आप आदिवासी हैं, हिंदू हैं या ब्राह्मण. वे बस कहते हैं, "आप भारतीय हैं." यही पहचान मैं चाहती हूं. लेकिन यहां, हमारे अपने समाज में, आपकी पहचान आपकी अनूठी ताकत बन जाती है. आपकी अपनी पहचान होनी चाहिए, जो आपकी भाषा और आपके पूर्वजों द्वारा दी गई संस्कृति को आगे बढ़ाने के तरीके से प्रदर्शित हो.

सवाल: आपने बताया कि भाषा पहचान और अपनेपन के लिए जरूरी है, अक्सर धर्म या नस्ल से भी ज्यादा. लुप्तप्राय और आदिवासी भाषाओं के साथ आपके काम को देखते हुए, जहां बोलने वालों को अक्सर भेदभाव का सामना करना पड़ता है, क्या आपके प्रयासों को इन समुदायों की भाषा और संस्कृति में गौरव बहाल करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है?

जवाब: हां, हां, बिल्कुल. आजकल लोग अंग्रेजी भाषा की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं, जो हमारी अपनी नहीं है. फिर भी हम अंग्रेजी में बोलते और सोचते हैं. लेकिन हमारी मूल भावनाएं हमारी मातृभाषा ही होती हैं. हम अपनी भावनाओं को ऐसी भाषा में व्यक्त करते हैं जो सभी के सुनने के लिए ज्यादा उपयुक्त हो.

सवाल: एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाली, एक आदिवासी महिला के रूप में आपकी व्यक्तिगत पहचान ने आपके सफर को कैसे आकार दिया है? इसके अलावा, आपने नारी पुरस्कार और अब रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड जैसे कई पुरस्कार जीते हैं. ये सब आपके लिए कैसे मायने रखता है?

जवाब: मेरी पृष्ठभूमि के कारण, मेरे सभी पूर्वज रूढ़िवादी थे. लेकिन मेरे पिता बहुत उदार थे; उनका मानना ​​था कि लड़कियों को शिक्षित होना चाहिए. जब ​​कोई महिला अपनी जड़ों की तलाश में आदिवासी इलाकों में जाती है और किसी ऐसी अवधारणा को समझने की कोशिश करती है जो उसके लिए बिल्कुल नई हो, तो उसे आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता. इस तरह के माहौल में आने वाली महिलाओं को पुरुष पसंद नहीं करते थे, पितृसत्ता हमेशा से मौजूद थी, और वे इस पूरी घटना को एक वर्जित मानते थे. सामाजिक रूप से, मेरी पहचान के कारण कई लोगों ने मुझे बहिष्कृत किया. लेकिन मैंने कभी इसकी परवाह नहीं की. मैं जो करना चाहती थी, मैंने किया... और सच कहूं तो, जब मैंने ऐसा किया, तो मुझे लगा कि ब्रह्मांड मुझसे यही चाहता है. ईश्वर और स्वर्ग चाहते थे कि मैं ऐसा करूं. मैं तो बस एक उत्प्रेरक हूं.

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