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'मैं ऐसी दुनिया चाहता हूं, जहां...', रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड पाने वाले आकाश टंडन ने ईटीवी भारत से बात की

रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड समारोह के अवसर पर ईटीवी भारत ने पहचान द स्ट्रीट स्कूल के संस्थापक आकाश टंडन से बात की.

AKASH TANDON
ईटीवी भारत से बात करते आकाश टंडन (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : November 17, 2025 at 5:08 PM IST

8 Min Read
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हैदराबाद: रामोजी एक्सीलेंस अवार्ड समारोह के अवसर पर ईटीवी भारत ने पहचान द स्ट्रीट स्कूल के संस्थापक आकाश टंडन से बात की. आकाश टंडन जिनके पास अपनी जवानी के दिनों को आसान तरीके से गुजारने के लिए कई ऑप्शन थे, लेकिन उन्होंने दिल्ली-एनसीआर में हजारों वंचित बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए एक मिशन चलाया. उनका मिशन हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए सम्मान, अवसर और सशक्तिकरण का पोषण करना है.

ईटीवी भारत की कैस्मिन फर्नांडीस के साथ बातचीत करते हुए वह उन पलों का बयान करते हैं, जो उन्हें तोड़ देते थे. वह 'पहचान द स्ट्रीट स्कूल' के बारे में वैसे ही बात करते हैं, जैसे कुछ लोग अपने पसंदीदा बैंड के बारे में बात करते हैं. उन्होंने कहा, "सच कहूं तो, मैं तैयार नहीं था. मैं दिल्ली को जानता था, या मुझे लगता था कि मैं जानता हूं, लेकिन जब मैंने पहली बार आईटीओ के पास उस झुग्गी बस्ती को देखा... तो मुझे समझ नहीं आया कि उस एहसास का क्या करूं."

टंडन उस चीज की शुरुआत के बारे में बता हैं जो आगे चलकर उनके जीवन का मिशन बन गई. उन्होंने बताया, "हमारे पास को योजना नहीं थी. हम बस गए. हमने कुछ बच्चों से बात की. उनके माता-पिता भी साथ आए. गलियों से लोग हमारे आस-पास इकट्ठा हो गए. अचानक यह सिर्फ जिज्ञासा नहीं रही... बल्कि एक उम्मीद बन गई."

कैसे हुई पहचान की शुरुआत?
सबसे दिलचस्प सोशल इंटरवेंशन आमतौर पर रणनीति या विजन स्टेटमेंट से शुरू नहीं होते. वे एक ऐसे सवाल से शुरू होते हैं, जो कोई और नहीं पूछ रहा होता. टंडन के लिए, यह सवाल बेहद आसान था. ये बच्चे स्कूल क्यों नहीं जाते?

उन्हें जो जवाब मिले, वे बिल्कुल भी आसान नहीं थे. कुछ बच्चों ने कभी पेंसिल नहीं पकड़ी थी. कई दूसरे राज्यों से आकर बस गए थे, कुछ अपने माता-पिता के मौसमी काम की तलाश में शहरों के बीच भटकते रहते थे. कुछ से भीख मांगने, छोटी-मोटी चीज़ें बेचने या छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने की उम्मीद की जाती थी. स्कूल न सिर्फ दुर्गम था... बल्कि अकल्पनीय भी था. टंडन ने कहा, "तो हमने बस... पढ़ाना शुरू कर दिया. ठीक वहीं, फुटपाथ पर." वह ऐसे कंधे उचकाते हैं, मानो यह कोई ऐसा फैसला नहीं है जिसका असर अगले दशक में 5,000 बच्चों पर पड़े.

ईटीवी भारत से बात करते आकाश टंडन (ETV Bharat)

आज 'पहचान' 1,600 से अधिक एक्टिव छात्रों, 1200 इंटर्न-स्वयंसेवकों और 100 से ज्यादा संगठनात्मक सहयोगियों वाला एक स्वयंसेवी-संचालित शिक्षा आंदोलन बन गया है, लेकिन जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में सिर्फ पांच स्वयंसेवक और दस बच्चे थे.टंडन याद करते हैं, "न बेंच, न दीवारें, न ब्लैकबोर्ड. अगर हमारे पास दस नोटबुक होतीं तो हम खुश होते थे," "लेकिन बच्चे... सीखने के लिए बेताब थे. इसी वजह से हम आगे बढ़ते रहे."

पहचान को क्या अलग बनाता है?
अगर आप टंडन से इस परियोजना का एक वाक्य में वर्णन करने के लिए कहेंगे, तो वे मना कर देंगे, क्योंकि पहचान कोई प्रोजेक्ट नहीं है—यह एक वर्ल्ड व्यू है. यह सिर्फ साक्षरता को लेकर नहीं है. यह स्कूल यूनिफॉर्म या पहाड़े याद करने के बारे में नहीं है. यह इस बारे में है कि जब दुनिया उन्हें नजरअंदाज करना बंद कर देती है, तो एक बच्चे के अंदर क्या होता है. वे कहते हैं, "आप किसी को अपना नाम लिखना सिखा सकते हैं, लेकिन ज्यादा जरूरी यह है कि वे अपने नाम पर विश्वास करना सीखें. करिकुलम इसी दर्शन का पालन करता है."

एक तरह से पहचान हमेशा विषयों से कम और सम्मान से ज्यादा जुड़ी रही है. यह सम्मान स्वयंसेवकों से मिलता है—पिछले कुछ सालों में 10,000 से ज्यादा स्वयंसेवक इसमें शामिल हुए हैं और अकेले 2024 में ही 15,000 आवेदन आए हैं. यह बात तब तक रोमांटिक लगती है जब तक आपको यह एहसास न हो कि बिना किसी निश्चित वर्कफोर्स वाले संगठन को चलाने के लिए वास्तव में क्या करना पड़ता है.

टंडन कहते हैं, "स्वयंसेवक हर तरह की बैकग्राउंड से आते हैं. छात्र, यंग प्रोफेशनल, रिटायर टीचर , विदेश से आए यात्री. वे नोटबुक, टेक्स्टबुक, स्किल्स, टाइम... मूल रूप से जो कुछ भी वे ला सकते हैं, साथ लाते हैं और उन्हें कोई पेमेंट नहीं किया जाता. वैसे, यही सबसे बड़ी चुनौती है. जब आप पूरी तरह से सद्भावना पर आधारित संगठन चलाते हैं, तो आपको अप्रत्याशितता के साथ सहज रहना पड़ता है, लेकिन मैंने सीखा है कि लोग हमारी सोच से कहीं अधिक उदार होते हैं."

कहानी जो सब कुछ बयां करती है
अगर पहचान को कभी किसी संभावना के मस्कट की जरूरत पड़ी, तो वह दीपक होगा. दीपक 2015 में जुड़ने वाले शुरुआती छात्रों में से एक है. टंडन अपनी कहानी इतनी गर्मजोशी से सुनाते हैं कि यह साफ हो जाता है कि उस लड़के ने उन्हें भी उतना ही बदला जितना उसने पूरे संस्थान को बदला. दीपक ने अपनी शुरुआत कई अन्य लोगों की तरह की थी, लेकिन जल्द ही वह एक ऐसा बच्चा बन गया जो सेंटर की सफाई में मदद करने, सामान व्यवस्थित करने, छोटे बच्चों को संभालने और हर चीज को उसकी सही जगह पर रखने पर जोर देने के लिए वहीं रुकता था.

टंडन याद करते हैं, "उसने यह सब बिना किसी उम्मीद के किया. यही बात हमें हैरान करती है, लेकिन कोविड के दौरान जिंदगी मुश्किल में पड़ गई. जब आपके पास स्मार्टफोन, डेटा या स्थिर बिजली नहीं थी, तो ऑनलाइन क्लास का कोई मतलब नहीं था. दीपक की पढ़ाई लगभग बंद हो गई. हालांकि, जैसे ही सेंटर फिर से खुले, वह वापस लौट आया."

उसने टंडन को मजाक में चुनौती दी, "अगर मैं अपनी 12वीं कक्षा की परीक्षा में 75 प्रतिशत अंक लाता हूं, तो आपको मुझे एक लैपटॉप खरीद कर देना होगा." कहानी सुनाते हुए टंडन हंसते हैं, "मैंने हां कह दिया. मुझे उम्मीद थी कि मैं हार जाऊंगा." दीपक को 83 प्रतिशत अंक मिले. टंडन कहते हैं, "हमने उसे उसी दिन लैपटॉप खरीद कर दिया. सच कहूं तो, मुझे हार पर गर्व था. दीपक अपने परिवार में स्कूल पूरा करने वाला पहला लड़का है, जब वह कॉलेज जाएगा, तो उसके भाई-बहन भी उसको फॉलो करेंगे. उसके आस-पड़ोस के बच्चे भी उसको फॉलो करेंगे. इसी तरह आप पूरे समुदाय को ऊपर उठाते हैं—एक-एक करके."

आगे क्या होगा?
पहचान अब एक दशक पुराना हो गया है. हजारों छात्र, हजारों स्वयंसेवक और, शायद उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण, यह एक टेम्प्लेट है कि कैसे युवा भारतीय सेवा के बारे में नए सिरे से सोच सकते हैं. हमने उनसे पूछा कि आगे क्या होगा तो उनका जवाब खास तौर पर व्यावहारिक था. उन्होंने "हम विस्तार कर रहे हैं. इसलिए नहीं कि विकास रोमांचक है, बल्कि इसलिए कि जरूरत बहुत ज़्यादा है और हम स्वयंसेवकों को मार्गदर्शन देते हैं ताकि वे लीडर्स बन सकें. आखिरकार, भविष्य उनका ही है."

वह कहते हैं, "मैं एक ऐसी दुनिया चाहता हूं, जहां किसी बच्चे की शिक्षा उसके जन्म स्थान से तय न हो. यह एक बड़ा सपना है, लेकिन हम पहले से ही जानते हैं कि सपने कैसे हकीकत बनते हैं—पांच स्वयंसेवक, दस बच्चे और दिल्ली में एक फुटपाथ. बस यहीं से इसकी शुरुआत होती है."

कुछ प्रोफाइल ऐसी होती हैं, जो उपलब्धियों का जश्न मनाती हैं और फिर कुछ प्रोफ़ाइल ऐसी भी होती हैं जो आपको याद दिलाती हैं कि उपलब्धि सिर्फ एक पल के लिए हां कहने से भी मिल सकती है, तब भी जब आपको पता न हो कि आप क्या कर रहे हैं. आकाश टंडन के पास कोई रोडमैप नहीं था. उनके पास सामाजिक परिवर्तन का कोई बड़ा सिद्धांत नहीं था. उनके पास बेचैनी थी, जिज्ञासा थी और आगे बढ़ने की इच्छा थी. कभी-कभी दुनिया बदलने के लिए इतना काफी होता है. या कम से कम, शुरुआत करने के लिए तो काफी होता है.

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