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21 साल बाद खोला शहीद मेजर का संदूक, बहन को मिला अनमोल 'खजाना'

मेजर सुधीर वालिया के बलिदान के 21 साल बाद उनका संदूक खोलने पर मिली राखियां. पढ़िए इस वीर योद्धा के अनछुए संस्मरण. रिपोर्ट: रजनीश शर्मा

संदूक में रखी राखियों के साथ मेजर सुधीर की बहन आशा वालिया
संदूक में रखी राखियों के साथ मेजर सुधीर की बहन आशा वालिया (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : August 27, 2026 at 8:25 PM IST

14 Min Read
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शिमला: ब्रेवेस्ट ऑफ ब्रेव मेजर सुधीर वालिया के पालमपुर के बनूड़ी स्थित घर में नाजुक स्मृतियों को समेटे एक संदूक शेल्फ पर रखा है. परिवार में माता-पिता, बहन, बहनोई, भांजियों सहित मेजर सुधीर के जन्म स्थान की मिट्टी का स्पर्श हासिल करने के लिए आने वाले लोगों की निगाह उस संदूक पर जाती थी. परिवार में उसे खोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी. साल 1999 में मेजर सुधीर शहीद हुए और भाई के बलिदान के इक्कीस साल बाद 2020 में बहन आशा वालिया ने संदूक पर पड़ी समय की गर्द को झाड़ा. बहन का दिल धडक़ रहा था और हाथ कांप रहे थे. संदूक खोला तो मेजर सुधीर वालिया का सैन्य जीवन सामान के भीतर धड़क रहा था. बहन ने एक किताब उठाई. पहला पन्ना खोला तो मेजर सुधीर के शौर्य की खामोश कहानियां गूंजने लगी. कुछ और पन्ने पलटे तो बहन आशा की आंखों से अश्रुधारा बह निकली. किताबों में छिपी रही एक कहानी इक्कीस साल बाद खुल गई.

परिवार को हर दिन याद आते हैं मेजर सुधीर वालिया (ETV BHARAT)

देश के दुश्मनों के लिए अत्यंत कठोर मेजर सुधीर वालिया का दिल कितना कोमल था कि उन्होंने बहन की भेजी राखियां किताबों में सुरक्षित रखी थीं. वे राखी बांधने के कुछ दिनों बाद उन्हें खोल कर कहीं लापरवाही में इधर-उधर नहीं फेंकते थे. वे सारी राखियां किताबों में करीने से सजा कर रखी गई थीं. सामान को स्पर्श किया तो एक सूख चुका सुर्ख फूल भी वहां मौजूद था. हौले से सूखे गुलाब को उठाया तो फूल की सुर्ख पंखुडिय़ां मानो बोल उठीं... बहन, देख लो आपके प्रति मेरा स्नेह मेरी शौर्य गाथाओं की तरह ही सुरक्षित है. अब इस निश्छल प्रेम को प्रेरक कथा के रूप में सभी से साझा कर दो ताकि चेतन महादेश भारत की रिश्तों की तरलता सभी को चमत्कृत करती रहे. उसी स्मृति की राखियां अब वालिया परिवार के साथ देश की भी संपत्ति है.

संदूक में रखी राखियों के साथ मेजर सुधीर की बहन आशा वालिया
संदूक में रखी राखियों के साथ मेजर सुधीर की बहन आशा वालिया (@Asha-Walia)

हफरुदा के जंगलों में दिया सर्वोच्च बलिदान

भाई-बहन के निश्छल-निर्मल स्नेह को एक नाजुक धागे में मजबूती से बांधने वाले पर्व राखी पर ईटीवी भारत आंखों को नम कर देने वाली कहानी दर्ज कर रहा है. ये कहानी भारतीय सेना के रैंबो, दुश्मनों के काल, करगिल में जुलू टॉप के हीरो, अस्सी देशों कमांडो कोर्स में सर्वश्रेष्ठ और अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पैंटागन में भाषण का गौरव हासिल करने वाले मेजर सुधीर वालिया के जीवन के अनछुए हिस्से की है. मेजर वालिया की अनगिनत शौर्य गाथाएं विशाल महादेश भारत की अमूल्य धरोहर हैं. करगिल युद्ध में आखिरी चोटी जुलू टॉप जीतने के बाद उन्होंने आराम नहीं किया और कश्मीर में डटे रहकर आतंक रोधी अभियानों में ही डटे रहे. कश्मीर में 29 अगस्त 1999 को हफरुदा के जंगलों में आतंकियों का सफाया करते हुए मेजर सुधीर वालिया ने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया. उन्हीं मेजर सुधीर वालिया और बहन आशा वालिया के स्नेह को राखी के पर्व पर याद किया जा रहा है. इस बार राखी 28 अगस्त की है और मेजर सुधीर वालिया ने 29 अगस्त को देश पर प्राण न्यौछावर किए. यहां राखी से जुड़े पर्व पर मेजर सुधीर का अपनी बहन के प्रति स्नेह दर्ज किया जा रहा है. साथ ही उनके जीवन की सरल लेकिन अद्भुत गाथाएं साझा की जाएंगी. भाई-बहन के स्नेह का ये अद्भुत प्रेरक संस्मरण खुद बहन आशा वालिया ने ईटीवी के समक्ष बयान किया.

मेजर सुधीर वालिया की प्रतिमा के साथ उनकी बहन आशा  वालिया
मेजर सुधीर वालिया की प्रतिमा के साथ उनकी बहन आशा वालिया (@Asha-Walia)

रुंधे गले से भाई की स्मृतियां

ये संयोग ही कहा जाएगा कि ईटीवी ने मेजर सुधीर वालिया के बहनोई प्रवीण आहलूवालिया से संपर्क किया तो सारा परिवार शिमला की यात्रा पर था. एक आग्रह पर वालिया परिवार ने अपनी आगामी चंडीगढ़ यात्रा को कुछ समय के लिए टाल कर ईटीवी से बात की. भाई को याद करते हुए बहन आशा का गला रुंध गया. उन्होंने बताया कि मेजर सुधीर वालिया का सामान जब खोला गया तो किताबों में सारी राखियां सुरक्षित मौजूद थीं.

घर में लगी मेजर सुधीर वालिया की तस्वीर
घर में लगी मेजर सुधीर वालिया की तस्वीर (ETV Bharat)

बहन आशा वालिया ने बताया, "जब राखी आती थी तो भैया पहले ही बता देते थे कि राखी समय पर भेज देना. जिस तरह चलन है कि कुछ समय बाद राखी को उतार कर जल में प्रवाहित कर दिया जाता है, लेकिन मेजर सुधीर वालिया ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने सारी राखियां सुरक्षित रखी. नम आंखों से आशा ने बताया कि जब भी मेजर सुधीर छुट्टी पर आते थे तो अपना पर्स व सारा सामान मां के हाथ में रख देते थे. घर से ड्यूटी पर जाते वक्त वो मुझे कहते थे कि टीका लगाओ, कलावा बांधो और मां से कहते-मां, टिकट के पैसे दे दो. खाना खाते समय वे मुझे बीच में बिठाते थे. उनके प्रेम को हम अभी भी अनुभूत करते हैं. घर में उनका सारा सामान वर्दी, मैडल आदि सहेज कर रखे गए हैं."

शिमला में जिस समय मेजर सुधीर वालिया की स्नेहिल स्मृतियां साझा की जा रही थी, उस समय आसमान भी गर्व और पीड़ा के आंसू बहा रहा था. बीच बारिश में बहनोई प्रवीण आहलूवालिया ने कहा कि बलिदान के कोई बीस या इक्कीस साल बाद परिवार के परिचित अभिषेक गौतम राखी पर्व पर पालमपुर के घर में मौजूद थे. उस समय चर्चा चली कि मेजर साहब के सामान में क्या-क्या होगा. तब उस सामान को खोला गया तो किताबों में सारी राखियां सुरक्षित मिलीं. प्रवीण आहलूवालिया ने कहा कि मेजर सुधीर वालिया की वीरगाथाएं न केवल पालमपुर, हिमाचल बल्कि देश के लिए भी गौरव की बात है.

मेजर सुधीर वालिया और उनकी फेवपेट कार
मेजर सुधीर वालिया और उनकी फेवरेट कार (ETV Bharat)

टॉफी के रैपर से लगा लेते थे आतंकियों का पता

नाइन पैरा एसएफ के शेर कहे जाने वाले कीर्ति चक्र, सेना मैडल विजेता सूबेदार मेजर महेंद्र सिंह मेजर सुधीर वालिया को याद करते हुए अत्यंत भावुक हो जाते हैं. वे कहते हैं, "वर्ष 1992 से 1996 तक मैं लगातार सुधीर सर के साथ आतंक रोधी अभियान में रहा. वे मेरे ट्रूप कमांडर होते थे और मैं उनका बडी हुआ करता था. मेजर साहब पूरी रात चलते थे, जहां उनको लगता था कि खतरा है, वहां साहब खुद आगे हो जाते थे. सुधीर साब, टॉफी के रैपर तक देख कर बता देते थे कि यहां कोई मूवमेंट कब हुई है और कैसे हुई. मेजर सुधीर वालिया माउंटेन वॉरफेयर के अद्भुत अफसर थे."

भांजियों के खून में उतर आई शौर्य परंपरा

मेजर सुधीर वालिया की दो प्यारी भांजियां ऋषिका व नंदनी वालिया बताती हैं कि उनका बचपन अपने मामाश्री की बहादुरी के किस्सों को सुनते हुए बीता है. वे एनसीसी में हैं और डिफेंस फोर्सिज का हिस्सा बनना चाहती हैं. उन्होंने बताया कि जब भी किसी बलिदानी सैनिक की पुण्य तिथि या बलिदान दिवस आता है तो वो उनकी प्रतिमा की सफाई आदि करती हैं और सम्मान प्रकट करती हैं. भांजियों ने बताया कि मेजर सुधीर वालिया की वर्दी, मैडल और बहादुरी के किस्से उनके लिए धरोहर से कम नहीं हैं. उन्होंने जेन-जी को संदेश दिया कि अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग होना अच्छा है, लेकिन भारत देश की सेना के प्रति आदर भी जरूर होना चाहिए.

सेना में कमीशन होते मेजर सुधीर वालिया की पुरानी तस्वीर
सेना में कमीशन होते मेजर सुधीर वालिया की पुरानी तस्वीर (Source@Vikas-Manhas)

हिमाचल के छोटे से गांव से पैंटागन तक का सफर

देश के पहले परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा और करगिल हीरो परमवीर विक्रम बत्रा की धरती पालमपुर ने भारत मां को एक और लाल दिया. पालमपुर के बनूड़ी गांव के सूबेदार मेजर रुलिया राम के बेटे सुधीर वालिया ने बचपन से ही सेना में जाने का सपना देखा था. उसी सपने को साकार करने के बाद उन्होंने सेना की शौर्य परंपरा में एक के बाद एक बहादुर किस्से जड़े. मेजर सुधीर वालिया ने हमीरपुर जिला के सुजानपुर टीहरा स्थित प्रतिष्ठित सैनिक स्कूल से पढ़ाई की. वे बहुत कम आयु में ही एनडीए में चयनित हुए थे. मेजर सुधीर वालिया ने एनडीए से पासआउट होने के बाद 30 मई 1987 को भारतीय सेना में सेवाएं शुरू की.

मेजर सुधीर वालिया की बचपन की तस्वीर
मेजर सुधीर वालिया की बचपन की तस्वीर (Source@Vikas Manhas)

1990 में ज्वाइन की 9 पैरा

देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी से बीस साल की आयु में वे सेकेंड लेफ्टिनेंट बनकर निकले. बांके सजीले जवान सुधीर वालिया के सामने अब एक शानदार जीवन नई शौर्य गाथाएं लिखने के लिए तैयार खड़ा था. आरंभ में वे चार जाट बटालियन में शामिल किए गए. भारत सरकार ने श्रीलंका में शांति सेना भेजी तो सुधीर वालिया को श्रीलंका जाने के आदेश मिले. शांति सेना में उन्हें पैरा एसएफ के कमांडोज के साथ काम करने का अवसर मिला. बस, उसी समय से उनके मन में मैरून बैरे और पैरा एसएफ का आकर्षण बढ़ गया. आखिरकार सुधीर वालिया के सपनों को मैरून बैरे का रंग मिला और वे पैरा एसएफ के अंग बने. वर्ष 1990 में सुधीर वालिया नाइन पैरा एसएफ में आ गए. उसके बाद तो बहादुरी की कहानियां दर्ज होने लगीं.

मां के साथ मेजर सुधीर वालिया
मां के साथ मेजर सुधीर वालिया (Source- X @IndianDefenceFacts)

अगर सुधीर वालिया के अलग-अलग निभाए गए किरदार देखें तो तो हैरत होती है कि ये सामान्य मानव थे या कोई पुरातन महान योद्धा. मेजर सुधीर वालिया ने बेलगाम में कमांडो ट्रेनिंग कोर्स किया. मिजोरम में सीआई काउंटर इन्सर्जेंसी जंगल वॉरफेयर कोर्स किया, बैंगलोर में ऑफिसर्स ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट कोर्स, पैरा ट्रेनिंग कोर्स, गुलमर्ग में माउंटेन वॉरफेयर कोर्स... कहानियां इतनी हैं कि किताबों के पन्ने कम पड़ जाएं. पैरा एसएफ के नामी योद्धा कर्नल हेमोटो पैंगिंग, मेजर विवेक जैकोब, मेजर अभय सप्रू आदि अफसरों ने अनेक बार मेजर सुधीर वालिया के शौर्य को कई मंचों पर बयान किया है.

पैरा एसएफ के मेजर अभय सप्रू बताते हैं, "मेजर सुधीर वालिया किसी और ही मिट्टी के बने थे. नाइन पैरा एसएफ में लंबे समय तक सक्रिय रहने और कई आतंकियों को मौत के घाट उतारने के बाद मेजर का मृत्यु का भय खत्म हो चुका था. वे कहते हैं कि मेजर सुधीर की रिस्क टेकिंग कैपेसिटी अतुलनीय थी. उनके जैसा कोई हो नहीं सकता."

रैंबो नाम के पीछे कहानी

जुलाई 1993 में मेजर सुधीर वालिया ने अपना पहला ऑपरेशन राजौरी के कांडी गांव में किया था. पहले ही ऑपरेशन में तीन खतरनाक आतंकी ढेर किए और ये क्लीन ऑपरेशन था. इस आपरेशन को लीड करने वाले मेजर सुधीर वालिया (तब वे कैप्टन रैंक में थे) को सेना मैडल के रूप में वर्ष 1994 में पहला गैलेंट्री अवॉर्ड मिला. ये शौर्य सफर का आरंभ था. ब्रह्मा टू एक्सपीडिशन में आतंकितों के खिलाफ शानदार ऑपरेशन के लिए उन्हें फिर से गैलेंट्री अवॉर्ड के रूप में सेना मैडल मिला. दूसरी बार सेना मैडल हासिल करने पर कहा जाता है बार टू सेना मैडल या सेना मैडल एंड बार. इसके बाद उन्हें रैंबो नाम दिया गया. पैरा एसएफ के इस हीरो ने दो बार सियाचिन पोस्टिंग का अनुभव लिया.

सेना मेडल सम्मानित होते मेजर सुधीर वालिया की पुरानी तस्वीर
सेना मेडल सम्मानित होते मेजर सुधीर वालिया की पुरानी तस्वीर (Source@ Instagram_guts_glory_glamour)

अमेरिका में दुनियाभर के अफसरों के बीच सैन्य कोर्स में किया टॉप

वर्ष 1997 में उन्हें अमेरिका में अस्सी देशों के कमांडो अफसरों के साथ स्पेशल कोर्स का मौका मिला. अमेरिका में दुर्लभ किस्म के सैन्य कोर्स में सुधीर वालिया ने टॉप किया. उनकी प्रोफेशनल नॉलेज, फिटनेस, वारफेयर नॉलिज के कारण अस्सी देशों के अफसर प्यार से उन्हें कर्नल बुलाया करते थे. पैरा एसएफ के शानदार अफसर कर्नल कौशलेंद्र सिंह उन्हें बहुत सम्मान से इंडियन आर्मी के मोस्ट डेकोरेटिड एंड ब्रेव ऑफिसर कहते हैं.

एनडीए में मेजर सुधीर वालिया
एनडीए में मेजर सुधीर वालिया (Source@wordpressDikshank Sharma, The Rambo I Knew)

कोर्स में टॉप करने के बाद मेजर सुधीर वालिया (तब कैप्टन रैंक) को पैंटागन में अमेरिका के रक्षा मुख्यालय में स्पीच के लिए कहा गया. उनके भाषण के बाद अस्सी देशों के अफसरों ने खड़े होकर तालियां बजाई और उनका अभिवादन किया. चूंकि पैंटागन के भीतर किसी किस्म की रिकार्डिंग आदि वर्जित है, लिहाजा उस भाषण के अंश कभी सार्वजनिक नहीं किए गए, लेकिन वहां मौजूद अफसरों ने ये बताया है कि उनके भाषण के बाद वहां कम से कम पांच मिनट तक तालियां बजती रही और सभी देशों के अफसर खड़े थे. ये सामग्री भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की साइट में दर्ज दस्तावेजों और रिकार्ड पर आधारित है. अस्सी देशों के ऑफिसर उन्हें कर्नल पुकारते थे, ये तथ्य रक्षा मंत्रालय की साइट पर मौजूद है.

पैंटागन में अमेरिका के रक्षा मुख्यालय में स्पीच देते मेजर सुधीर वालिया
पैंटागन में अमेरिका के रक्षा मुख्यालय में स्पीच देते मेजर सुधीर वालिया (ETV Bharat)

करगिल के बाद आतंक रोधी ऑपरेशन में रहना चुना

करगिल युद्ध में वे तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक से जिद करके गए थे. जुलू टॉप फतह के बाद मेजर सुधीर वालिया ने पैरा एसएफ के साथ आतंक रोधी ऑपरेशन में रहना चुना. इसी दौरान अगस्त की 29 तारीख, वर्ष 1999 में हफरुदा के जंगलों में आतंकियों को खदेड़ते हुए मेजर सुधीर वालिया ने बहते पानी में टूथपेस्ट का ताजा झाग देखकर तुरंत पता लगा लिया कि आतंकी आसपास ही हैं. उनके पास केवल पांच लोगों की टुकड़ी थी. नायक खीम सिंह उनके साथ थे. इस ऑपरेशन में मेजर वालिया ने चार आतंकियों को ढेर किया. सीधी फाइट में उनके शरीर पर कई गोलियां लगी. मेजर वालिया फिर भी अपने साथियों को रेडियो सेट से निर्देश देते रहे. ऑपरेशन पूरा होने पर मेजर वालिया को रेस्क्यू किया गया, लेकिन अस्पताल पहुंचने पर वे अपने प्राण भारत मां की गोद में अर्पित कर चुके थे.

करगिल युद्ध में मेजर सुधीर वालिया जुलू टॉप फतेह करने के बाद
करगिल युद्ध में मेजर सुधीर वालिया जुलू टॉप फतेह करने के बाद (PIC Credit @Vikas Manhas)

मुंबई के रहने वाले विकास मन्हास का सेना में जाने का सपना अधूरा रहा, लेकिन वे मेजर सुधीर परिवारों से निरंतर मिलते रहते हैं. विकास मन्हास अनेक बार पालमपुर आए हैं. वे मेजर सुधीर वालिया को याद करते हुए कहते हैं- ऐसे महान योद्धा भारत मां की गोदी में ही पलते हैं. रैंबो के बलिदान दिवस और उससे पहले राखी के पर्व पर बहन आशा वालिया ही नहीं, देश की समस्त बहनें मेजर सुधीर वालिया को कृतज्ञता से स्मरण करते हुए मानो यही कहती हैं.. मेजर सुधीर अमर हैं. पालमपुर में मेजर सुधीर वालिया का घर एक मंदिर है.

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