Explainer: बिहार में छात्रों पर 2 मिनट भी भारी.. छिन रही जिंदगी.. सवाल गलती किसकी?
बिहार में कदाचार मुक्त परीक्षा को लेकर अति सख्ती के मामलों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. दो मिनट की देरी जिंदगी छीन रही.

Published : February 22, 2026 at 7:16 AM IST
रिपोर्ट: कृष्णनंदन
पटना: बिहार में परीक्षा केंद्र का बंद दरवाजा केवल एक गेट मात्र नहीं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों के भविष्य की दीवार बन गई है. 1-2 मिनट की देरी और साल भर की मेहनत पर पानी फिर जाता है. सवाल उठ रहे हैं कि ये परीक्षा है या छात्रों के धैर्य की परीक्षा? पटना के मसौढ़ी में मैट्रिक की परीक्षा में देर से पहुंचने पर एंट्री नहीं मिली तो एक छात्रा ने अपनी जान दे दी है. इसके बाद से इस मुद्दे को लेकर सदन से लेकर सड़क तक सवाल उठने लगे हैं.
छूटी मैट्रिक की परीक्षा तो दे दी जान: भविष्य के सपने देख रही 10वीं की छात्रा कोमल कुमारी (पिता मंटू यादव) ने पूरे साल जी जान से मेहनत की, लेकिन जब परीक्षा देने केंद्र पहुंची तो 2 मिनट की देरी हो गई और इसी दो मिनट ने छात्रा को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया. छात्रा मंगलवार (17 फरवरी) को मैट्रिक की परीक्षा देने बरनी स्थित परीक्षा केंद्र पहुंची थी. मसौढ़ी थाना क्षेत्र के महाराजचक गांव की छात्रा ने परीक्षा से वंचित होने के बाद आत्महत्या कर ली. उसका शव रेलवे ट्रैक के बगल में मिला था.
गिड़गिड़ाती रही छात्रा: 2 मिनट की देरी से पहुंची बच्ची को परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं दिया गया, जबकि परीक्षा शुरू होने में फिर भी 28 मिनट बाकी थे. बच्ची ने परीक्षा केंद्र के गेट पर वहां मौजूद लोगों से खूब मन्नतें की, खूब गिड़गिड़ाई, लेकिन लकीर के फकीर बने सिस्टम के आगे हार गई. किसी ने उसकी एक न सुनी और उस दिन की परीक्षा से वंचित कर दिया गया.
ट्रैफिक के कारण देरी तो कौन है कसूरवार?: मैट्रिक परीक्षा को लेकर बच्ची ने खूब तैयारी की थी और काफी उत्साहित थी, लेकिन सड़क पर ट्रैफिक होने की वजह से ऑटो वाले ने देर कर दी और वह थोड़ी लेट हो गई थी. इस घटना ने उसे अंदर से इतना तोड़ दिया कि परिवार के लाख समझाने के बावजूद उसने आत्मघाती कदम उठाते हुए अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली.
मिनटों की देरी और पूरा साल बर्बाद: बिहार में परीक्षा के दौरान स्टूडेंट्स को अगर एक मिनट की भी देरी हो जाती है, तो उन्हें प्रवेश करने नहीं दिया जाता है. ऐसी कई तस्वीरें बिहार के विभिन्न जिलों से सामने आ चुकी है. कई स्थानों पर छात्र परीक्षा केंद्र के बाहर रोते और मिन्नतें करते हुए पाए गए हैं. कहीं कोई गेट फांदकर अंदर घुसने की कोशिश करता भी पाया गया. हालांकि इस अपराध के लिए भी छात्रों पर केस किया जा चुका है.
सख्ती.. अति सख्ती.. और मौत पर सवाल : परीक्षा के दौरान छात्र परीक्षा परिणाम और तैयारी को लेकर पहले से ही तनाव में रहते हैं और इसी तनाव को बिहार बोर्ड के सख्त नियम और बढ़ा रहे हैं, जहां बिहार बोर्ड की परीक्षा में सिर्फ एक मिनट की देरी भी बच्चे को परीक्षा से वंचित कर दे रही है. हाल ही में सामने आए बच्चों के आत्महत्या के मामलों ने समाज को झकझोर कर रख दिया है और यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या परीक्षा का पड़ाव बच्चों की जान से ज्यादा बड़ा हो गया है?
बिहार बोर्ड के अलावा किसी बोर्ड में नहीं ऐसा नियम: परीक्षा शुरू होने से आधा घंटा पहले गेट बंद कर देना और ट्रैफिक जाम की वजह से 2 मिनट की देरी से परीक्षा केंद्र पहुंचना, यह घटना सामान्य लग रही है, लेकिन है नहीं. बिहार बोर्ड को छोड़ दें तो अन्य किसी बोर्ड परीक्षा में ऐसा नियम नहीं है.

एग्जाम का प्रेशर जिंदगी पर भारी: एग्जाम के प्रेशर को लेकर भी बच्चे आत्मघाती कदम उठाते हैं. भोजपुर जिले का मामला है, जहां गुरुवार देर रात सीबीएसई बोर्ड की एक इंटरमीडिएट छात्रा ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि लगता था कि वह परीक्षा में अच्छा नहीं कर पाएगी.
छात्रा का वो आखिरी खत: छात्रा ने अपनी जीवन लीला समाप्त करने से पहले एक नोट लिखा और उसमें लिखा था "मेरे से नहीं होगा अब. मैं एग्जाम नहीं दे पाउंगी. मेरी तबीयत खराब रहती है. यह सब मेरी गलती है. मेरे चलते मेरे पेरेंट्स परेशान रहते हैं. बट हो गया. अब और नहीं मैं जा रही हूं. किसी और के चलते नहीं खुद से जा रही हूं. मम्मी-पापाा अपना ध्यान रखिएगा. दीदी-बाबा तुम भी. बाय."
इन घटनाओं ने उठाए सवाल: इन घटनाओं ने यह प्रश्न उठा दिए हैं कि क्या यह परीक्षा व्यवस्था बच्चों को अनुशासन और जीवन का संघर्ष सीखा रही है या डर के साये में धकेल रही है? प्रधानमंत्री की ओर से भी बच्चों का एग्जाम प्रेशर काम करने और प्रेशर को हैंडल करने के लिए बीते कई वर्षों से परीक्षा पर चर्चा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. लेकिन यह घटनाएं यह भी सवाल पूछ रही हैं कि क्या ऐसे कार्यक्रमों का दूर ग्रामीण क्षेत्र के परिवेश वाले बच्चों पर कुछ असर हो भी रहा है? मनोवैज्ञानिकों के पास भी ऐसे कई मामले पहुंच रहे हैं, जिनमें बच्चे सिर्फ परीक्षा के डर से अवसाद में जा रहे हैं.
30 मिनट पहले गेट बंद का नियम बदले: पटना के एक परीक्षा केंद्र पर अपने बच्चे को मैट्रिक परीक्षा दिलाने पहुंचे अभिभावक सुबोध कुमार ने कहा कि बिहार बोर्ड का यह जो नियम है कि आधा घंटा पहले प्रवेश अनिवार्य है, यह बदलना चाहिए. कम से कम परीक्षा शुरू होने से 5 मिनट पहले तक एंट्री दिया जाना चाहिए.

"अभी जो नियम है कि परीक्षा शुरू होने से 30 मिनट पहले गेट बंद हो जाएगा, यह गलत नियम है. 2-5 मिनट लेट होने पर भी बच्चों को एंट्री दी जानी चाहिए क्योंकि यह उनकी जिंदगी का सवाल होता है."- सुबोध कुमार, अभिभावक
...तो नहीं जाती बच्ची की जान: उन्होंने कहा कि मसौढ़ी की बच्ची जो परीक्षा छूटने के कारण ट्रेन से कूद कर जान दे दी, तो क्या उस बच्ची के जान को यह सिस्टम लौटा देगा? बच्ची के परिवार को जीवन भर का कष्ट हो गया, जबकि गलती यह थी कि ट्रैफिक के कारण वह 2 मिनट देर हो गई थी. अभी परीक्षा हॉल में कॉपी बंटना भी शुरू नहीं हुआ था, तब तक बच्ची पहुंच चुकी थी. लेकिन उसे परीक्षा से वंचित कर दिया गया. हम यही कहेंगे कि यह नियम बदले.
केंद्राधीक्षक को विवेक से निर्णय का हक मिले: अपने बच्चों को परीक्षा दिलाने पहुंचे अभिभावक स्वराज कुमार ने कहा कि सरकार कुछ कर रही है तो ठीक ही कर रही है. अगर लेट से आने पर भी परीक्षार्थी को अनुमति मिलने लगे तो सभी परीक्षार्थी लेट करने लगेंगे. लेकिन सरकार को अपने सिस्टम में छात्रों के प्रति थोड़ी संवेदनशीलता भी रखनी चाहिए.
"2 से 5 मिनट की देरी हो रही है तो यह भी देखना चाहिए कि बच्चा कैसे आ रहा है, ऑटो से आ रहा है तो ट्रैफिक के कारण थोड़ा बहुत लेट हो सकता है. सरकार को सेंट्रल सुपरिंटेंडेंट को थोड़ी लिबर्टी देनी चाहिए कि वह अपने विवेक से यह वेरीफाई करें कि दो-तीन मिनट बच्चा अगर लेट पहुंचा है तो कारण क्या रहा और फिर कारण जानकर उसे एंट्री दें."- स्वराज कुमार,अभिभावक

केंद्राधीक्षक को हर बच्चे में दिखनी चाहिए अपने बच्चे की छवि: इस पूरे मसले पर शिक्षाविद् प्रो बीएन प्रसाद ने बताया कि इस मसले के तीन प्रमुख स्टेक होल्डर हैं. एक व्यवस्था स्वयं है जो सभी परीक्षाएं कराती है, दूसरा विद्यार्थी है और तीसरा गार्जियन है. व्यवस्था पर बहुत अधिक प्रश्न नहीं उठा सकते क्योंकि उसका फंक्शन का वही तरीका है. लेकिन परीक्षा केंद्र के जो अधीक्षक होते हैं उन्हें थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए.
"परीक्षा केंद्र के अधीक्षक को थोड़ी लिबर्टी मिलनी चाहिए. अगर कोई बच्चा 1 से 2 मिनट लेट परीक्षा केंद्र पहुंचता है तो उन बच्चों में उस सेंट्रल सुपरिंटेंडेंट को अपने बच्चों का चेहरा नजर आना चाहिए. उस संवेदना की वहां आवश्यकता है."- प्रो बीएन प्रसाद, शिक्षाविद्
आत्महत्या कोई समाधान नहीं: बीएन प्रसाद ने कहा कि दूसरा विद्यार्थी है, आज के 21वीं सदी में परीक्षा देने वाले विद्यार्थी में व्यक्तिगत तत्व की प्रधानता अधिक हो गई है. आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. जीवन संघर्षों से भरा हुआ है, खासकर विद्यार्थी जीवन तो पूरा संघर्ष से भरा होता है.
विद्यार्थी में अधिक संवेदना: उनका मानना है कि जहां संघर्ष नहीं है वहां जीवन नहीं है. अगर एक परीक्षा किसी विद्यार्थी के सारे जीवन को प्रभावित कर रही है तो विद्यार्थी के लिए यह बहुत बहादुरी की बात नहीं है. इसका मतलब है कि यह बहुत गंभीर मसला है और विद्यार्थियों में संवेदना अधिक हो गई है.

एक महीना बाद सप्लीमेंट्री एग्जाम का मौका: विद्यार्थी को अपने जीवन से अधिक समाज के प्रतिक्रिया और गार्जियन के प्रतिक्रिया की चिंता रह रही है. जबकि आज के समय विद्यार्थियों को भी यह मालूम है कि जो परीक्षा दिए हैं, इसका एक महीना बाद सप्लीमेंट्री एग्जाम भी होगा और अच्छा करने का उनके पास पूरा अवसर भी है.
असफलता ही सफलता की कुंजी: बीएन प्रसाद ने कहा कि जो विद्यार्थी यह सोचते हैं कि एग्जाम में फेल मतलब, पूरा जीवन फेल है तो यह विद्यार्थी पास करके भी जीवन में बहुत अच्छा कुछ नहीं कर सकते. असफलता ही सफलता की कुंजी होती है. तीसरा पक्ष गार्जियन का है, गार्जियन आज के समय बच्चों के पैदा होते हैं सोच रहे हैं कि उनका बेटा या बेटी आगे चलकर इंजीनियर या डॉक्टर बनेगा, मैट्रिक और इंटर परीक्षा में अच्छे अंक लाकर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाएगा.
अभिभावकों को करना होगा ये काम: गार्जियन को भी यह संवेदना थोड़ी कम करनी चाहिए. उन्हें बच्चों को सीखना चाहिए कि संघर्ष जीवन के मूल में है और बिना संघर्ष के जीवन में सफलता नहीं पाई जा सकती. यह तीनों पक्षों को आपस में सोचने समझने की आवश्यकता है तभी बच्चों में आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति पर लगाम लगाई जा सकती है.

बच्चों में परीक्षा को लेकर बहुत है दबाव : बिहार की प्रख्यात साइकोथैरेपिस्ट डॉक्टर बिंदा सिंह ने कहा कि बच्चों में परीक्षा को लेकर बहुत दबाव बना हुआ है. सामाजिक दबाव भी रहता है पारिवारिक दबाव भी रहता है और बच्चों में खुद का भी दबाव रहता है कि उन्हें अपने सहपाठियों से बेहतर करना है. बच्चों के लिए पहले घर में ही यह माहौल बनाना चाहिए कि बच्चा किसी सब्जेक्ट में बहुत अच्छा नहीं कर रहा है या पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पा रहा है तो उसे पर प्रेशर नहीं बनना चाहिए.
''बच्चों में परीक्षा को लेकर बहुत दबाव बना हुआ है. सामाजिक दबाव भी रहता है, पारिवारिक दबाव भी रहता है. बच्चा किसी सब्जेक्ट में बहुत अच्छा नहीं कर रहा है या पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पा रहा है तो उस पर प्रेशर नहीं बनना चाहिए. कई बार बच्चे अपनी पूरी कोशिश करते हैं लेकिन वह सब्जेक्ट में अच्छा नहीं कर पाए. ऐसे में माता-पिता द्वारा अनावश्यक मेंटल प्रेशर नहीं क्रिएट करना चाहिए.''- डॉक्टर बिंदा सिंह, प्रख्यात साइकोथैरेपिस्ट
मंत्री-अधिकारी भी होते हैं लेट : डॉ बिंदा सिंह ने बताया कि हर बच्चे के लिए उनका बोर्ड एग्जाम बहुत इंपोर्टेंट होता है. बच्चों को लगता है कि उनकी भविष्य इससे जुड़ी हुई है और एक डर के साए में वह जीते हैं. जो दो घटनाएं हुई है जिसमें बच्चों ने आत्मघाती कदम उठाए हैं, यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. 2 मिनट लेट होने पर परीक्षा से वंचित कर देना सही नहीं है. बहुत सारे कार्यक्रम होते हैं जहां नेता मंत्री और सरकारी अधिकारी काफी लेट करके पहुंचते हैं, बावजूद इसके उनके आने का इंतजार होता है और उनके आने पर ही कार्यक्रम शुरू होते हैं और कार्यक्रम रद्द नहीं किया जाता है.

''हर बच्चे के लिए उनका बोर्ड एग्जाम बहुत इंपोर्टेंट होता है. 2 मिनट लेट होने पर परीक्षा से वंचित कर देना सही नहीं है. बहुत सारे कार्यक्रम होते हैं जहां नेता मंत्री और सरकारी अधिकारी काफी लेट करके पहुंचते हैं, बावजूद इसके उनके आने का इंतजार होता है और उनके आने पर ही कार्यक्रम शुरू होते हैं और कार्यक्रम रद्द नहीं किया जाता.''- डॉक्टर बिंदा सिंह, प्रख्यात साइकोथैरेपिस्ट
बच्चे होते हैं बहुत सेंसिटिव : डॉ बिंदा सिंह ने बताया कि बच्चे बहुत सेंसिटिव होते हैं और बहुत इमोशनल होते हैं. जिस बच्ची ने ऐसा खौफनाक कदम उठाया वह गांव की एक बच्ची थी और सोचिए कि किस उम्मीद से वह परीक्षा देने निकली थी. ट्रेन से वह परीक्षा देने के लिए शहर पहुंची, यहां से ऑटो पकड़ के परीक्षा केंद्र पहुंची. बिहार में ट्रैफिक का हाल सभी जानते हैं, थोड़ा लेट ही हो गया तो क्या था. दो से तीन मिनट की लेट बहुत लेट नहीं होती है. थोड़ी संवेदनशीलता दिखाई गई रहती तो आज यह बच्ची जीवित होती.
अभिभावक जागरुक करें कि एक परीक्षा पूरा जीवन नहीं : डॉ बिंदा सिंह ने बताया कि और लोगों के लिए भले ही यह एक संख्या हो और बहुत मायने नहीं रखता हो, लेकिन एक मां-बाप की तो पूरी दुनिया ही उजड़ गई. सोचना चाहिए कि उसे मां-बाप पर अभी क्या गुजर रही है. इस पर वह यही कहेंगे कि मां-बाप भी बच्चों पर उतना ही प्रेशर बनाएं जितना वह हैंडल कर सके.

''बच्चों के अंदर इतना डर नहीं भरे की परीक्षा नहीं दिया तो जिंदगी खत्म हो गई. बच्चों को इस प्रकार तैयार करना चाहिए कि आज की परीक्षा छूट गई तो कोई नहीं, जल्द ही सप्लीमेंट्री एग्जाम होता है और उसमें पास कर सकते हैं. जब बच्चे इनसिक्योर हो जाते हैं तभी ऐसा कदम उठाते हैं, मानसिक रूप से मजबूत बच्चे ऐसा कदम नहीं उठाते हैं.''- डॉक्टर बिंदा सिंह, प्रख्यात साइकोथैरेपिस्ट
'जरा सोचने की है जरूरत' : एक तरफ परीक्षा पर चर्चा हो रही है की बच्चों को परीक्षा को लेकर रिलैक्स किया जाए. लेकिन परीक्षा देने वाले बच्चे अगर 5-10 मिनट लेट हो जाते हैं तो उसके लिए भी इंतजाम होना चाहिए. अधिकारियों को यह पता लगाना चाहिए कि आखिर किस कारणवश बच्चों को देर हो गई. बिहार बोर्ड में काफी दूर-दूर सेंटर दिया जाता है. अगर इतना सख्ती बरतनी है तो 5-7 किलोमीटर के दायरे में उसका सेंटर दिया जाए.
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