बिहार में शराबबंदी कानून की समीक्षा पर संग्राम, NDA के नेताओं में उभरे मतभेद
राज्य में एकबार फिर शराबबंदी पर विवाद गहरा गया है. कानून को लेकर एनडीए के नेताओं में मतभेद दिख रहे हैं.

Published : December 17, 2025 at 1:45 PM IST
|Updated : December 17, 2025 at 1:56 PM IST
पटना: बिहार चुनाव 2025 में शराबबंदी बड़ा मुद्दा रहा. प्रशांत किशोर ने खुलेआम घोषणा की थी कि 'अगर राज्य में जनसुराज की सरकार बनती है तो एक घंटे में शराबबंदी कानून हटा देंगे.' नतीजा रहा कि बिहार की जनता ने जनसुराज को नकार दिया और बिहार में करारी हार मिली.
उठते रहे हैं सवाल: साल 2016 के 05 अप्रैल से राज्य में पूर्व शराबबंदी कानून लागू है. तब से लेकर अब तक कानून में कई संसोधन हुए, लेकिन आज तक पूर्ण शराबबंदी नहीं हो सकी. राज्य में धड़ल्ले से शराब की तस्करी, जहरीली शराब से मौत का सिलसिला जारी है, यही कारण है कि इस कानून को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं.
जीतन राम मांझी सबसे आगे: विपक्ष के साथ-साथ सत्ता दल के नेता भी सवाल उठाते रहे हैं. नीतीश कुमार के साथ रहने वाले एनडीए के घटक दल हम पार्टी के नेता जीतन राम मांझी इसमें सबसे आगे हैं. जीतन राम मांझी ने कई बार शराबबंदी के खिलाफ बोले और कानून की समीक्षा करने की मांग की है. जीतन राम मांझी ने तो यहां तक कहा था कि 'हम बंद कमरे में रात को शराब पीते हैं' हालांकि इसके बाद वे अपने बयान से मुकर गए थे.
कानून की समीक्षा की मांग: केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने एक बार फिर शराबबंदी कानून को लेकर चिंता व्यक्त की है. इनका कहना है कि शराबबंदी कानून की समीक्षा होनी चाहिए. जो लोग बिहार के अलग-अलग जिलों में बंद है, उनके खिलाफ शराब पीने का अगर मुकदमा है तो सरकार को उन्हें रिहा कर देना चाहिए.
"शराबबंदी को लेकर तीसरा संशोधन हमारे आवाज उठाने के बाद हुआ था. बड़े तस्कर वह धनबल की बदौलत बच जाते हैं. मेरी आवाज उठाने के बाद नीतीश कुमार ने कहा था कि जो शराब पीकर जा रहा हो उसको पकड़ने की जरूरत नहीं है. जो ढाई सौ ग्राम शराब लेकर जा रहा हो उसको भी पकड़ने की जरूरत नहीं है." -जीतन राम मांझी, केंद्रीय मंत्री
'6 लाख से अधिक गरीबों के खिलाफ केस दर्ज': जीतन राम मांझी कहते हैं कि जो पुलिस विभाग और एक्साइज विभाग के अधिकारी हैं, शराब तस्कर को छोड़ देते हैं. गरीबों को जेल भेज देते हैं, जिसमें 6 लाख मामले गरीबों के खिलाफ दर्ज किए गए हैं. शराबबंदी के तहत कार्रवाई इस तरीके से होना चाहिए कि गरीबों पर प्रभाव न पड़े. 'संभव हो तो गरीबों के खिलाफ जो मामले दर्ज हैं उसे हटा देना चाहिए.'

शराबबंदी कानून: बता दें कि राज्य में 21 दिसंबर 2015 को नई उत्पाद नीति लागू की गयी थी. इसके बाद 01 मार्च 2016 से शराबबंदी की घोषणा हुई. 01 अप्रैल 2016 से शराबबंदी कानून लागू किया गया और 05 अप्रैल 2016 से राज्य में पूर्ण शराबबंदी हो गयी.
शराबबंदी कानून के तहत कार्रवाई: इसके बाद राज्य में शराबबंदी कानून के तहत कई कार्रवाई हुई. 2016 से 2023 तक राज्य में शराब के खिलाफ 6.61 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए, जिसमें 9 लाख से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हुई. 75 हजार से अधिक वाहनों की नीलामी की गयी. इस कार्रवाई में सरकार को 4 अरब 28 करोड़ 50 लाख रुपये राजस्व प्राप्त हुए.

इस साल 16 लाख लीटर शराब जब्त: मद्य निषेध विभाग की रिपोर्ट के अनुसार इस साल 2025 में जनवरी से जून तक 16 लाख लीटर से अधिक अवैध शराब जब्त की गयी, इसमें 8 लाख लीटर विदेशी शराब शामिल हैं. जब्त शराब की कुल कीमत 75 करोड़ के आसपास है. इसके बाद भी मद्य निषेध विभाग की ओर से कार्रवाई की जाती रही है.
6 लाख से अधिक लोगों को सजा: राज्य में शराब की तस्करी या फिर शराब पीने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी की गयी. मद्य निषेध शराबबंदी से लेकर अब तक राज्य में कुल 6 लाख 40 हजार 379 लोगों को सजा सुनाई गयी, इसमें 6 लाख 38 हजार मामले सिर्फ शराब पीने के हैं. कानून के तहत कोर्ट ने 9 लोगों को मृत्युदंड की भी सजा सुनाई. इसके अलावे 18 लोगों को आजीवन कारावास और कई दोषियों को 10 वर्ष से अधिक कई की सजा सुनाई गयी.

पिता के समर्थन में नहीं दिखे संतोष सुमन: इस तरह की कार्रवाई को लेकर जीतन राम मांझी गरीबों के समर्थन में आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन उन्हीं के बेटे बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन अपने पिता के बयान से सहमत नजर नहीं आए. संतोष सुमन का कहना है कि बिहार में शराबबंदी कानून को मजबूती से लागू करनी चाहिए. जो भी दोषी होते हैं, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए. शराबबंदी गरीबों के हित में है.
"कानून के हिसाब से कार्रवाई की जा रही है. गरीब हो या अमीर कानून सबके लिए बराबर है. कोई अगर गलत काम करता है तो हम उसके विरोध में हैं. अगर किसी को गलत तरीके से फंसाया जाएगा तो हम उसके साथ खड़े होंगे. जीतन राम मांझी ने कुछ अपवाद के बारे में कहा है, लेकिन यह सामान्य स्थिति नहीं है. कानून सबको एक चश्मे से देखा है." -संतोष सुमन, मंत्री, बिहार सरकार

क्या कहते हैं विशेषज्ञ: राजनीतिक विशेषज्ञ डॉक्टर संजय कुमार का मानना है कि शराबबंदी को लेकर बिहार में अलग-अलग दलों की अलग-अलग राय रही है. शराबबंदी कानून की सफलता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं. जीतन राम मांझी लगातार यह चिंता व्यक्त करते रहे हैं. बड़ी संख्या में दलित शराबबंदी मामले में जेल के अंदर बंद है, यह भी एक सच्चाई है.
"जीतन राम मांझी शराबबंदी को लेकर बेवाक राय रखते हैं, लेकिन उनके पुत्र और बिहार सरकार के मंत्री संतोष सुमन ने ही उनके स्टैंड को खारिज किया है. जाहिर तौर पर संतोष सुमन नीतीश कुमार के साथ हैं. वह किसी तरीके की समीक्षा या संशोधन के पक्ष में नहीं दिखते हैं." -डॉक्टर संजय कुमार, राजनीतिक विशेषज्ञ
शराबबंदी के फायदे: राज्य में शराबबंदी से जहां फायदा हुआ, वहीं इसके नुकसान भी देखने को मिले. शराबबंदी से फायदे की बात करें तो राज्य में घरेलु सिंहा में काफी गिरावट हुई. एनसीआरबी की रिपोर्ट कहती है कि 2015 में जहां 15000 के आसपास घरेलु हिंसा के मामले सामने आए थे. शराबबंदी के बाद इसमें गिरावट देखने को मिली. 2020 में घरेलु हिंसा के मामले 9000 के आसपास रहे. 2024 में यह घटकर 7500 हो गए.

शराबबंदी के नुकसान: दूसरी ओर शराबबंदी के कारण नुकसान भी हुए. शराब नहीं मिलने के कारण लोग नकली शराब खरीदकर पीने लगे, जिससे कई लोगों की मौत हो चुकी है. एनसीआरबी की रिपोर्ट देखें तो 2016 से अब तक 400 से अधिक लोगों की मौत हुई है. जानकार कहते हैं कि यह सरकारी आंकड़ा है, लेकिन असल में इससे ज्यादा लोगों की मौत हुई है.
किस साल कितनी मौतें?: एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार साल 2016 में 156, साल 2018 में 09, साल 2021 में 90, साल 2022 में 100, साल 2023 में 35, और साल 2024 में 25 के आसपास लोगों की मौत हुई है.

2022 में भागलपुर शराब कांड: इसमें सबसे चर्चित घटना भागलपुर शराब कांड है. 2022 में 70 से अधिक लोगों की मौत जहरीली शराब पीने से हुई थी. यह घटना होली के समय की है, जब जिले में जहरीली शराब की घटना सामने आयी थी. कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गयी थी.
2024 में मसरख शराब कांड: साल 2024 में सिवान और छपरा में जहीरी शराब कांड हुआ था, जिसमें दोनों जिला को मिलाकर कुल 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी. इसके अलावे गोपालगंज, आदि जिलों से मामले सामने आए थे. इसको लेकर जमकर सिसायत भी हुई थी.
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