इशारों-इशारों में बात करके छात्र बना रहे गणेश प्रतिमा, बोले- हुनर का इस्तेमाल करने की कोशिश
दिव्यांग छात्र प्राकृतिक चीजों से गणेश जी की मूर्तियां बनाकर मिट्टी को रचनात्मकता का रूप दे रहे हैं. विकास कुमार दास की स्पेशल रिपोर्ट.

Published : September 3, 2026 at 12:51 PM IST
|Updated : September 3, 2026 at 1:27 PM IST
भुवनेश्वर: कहते हैं कि जहां शब्द खामोश हो जाते हैं, वहां रचनात्मकता को अपनी आवाज मिलती है. और यह बात बिल्कुल सही है. ऐसा ही कुछ नजारा ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के एक स्कूल में देखने को मिला है. बता दें, इस समय पूरे देश में गणेश चतुर्थी 2026 को लेकर धूम मची है. मूर्तियां बनाने वाले कलाकर प्रथम पूज्यनीय भगवान गणेश की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं.
वहीं, भुवनेश्वर के बिपिन बिहारी गवर्नमेंट स्कूल फॉर द हियरिंग इम्पेयर्ड (सुनने में अक्षम बच्चों के स्कूल) के छात्र भी गणेश प्रतिमाओं को बनाने में दिनरात एक किए हैं. छात्रों के समूह बड़ी-बड़ी गणेश प्रतिमांएं बनाकर अपने जूनून का प्रदर्शन कर रहे हैं. इन छात्रों ने इस साल बाजार से गणेश जी की मूर्ति न खरीदने का फैसला किया है. वे इसे खुद बना रहे हैं. छात्रों के समूह मिट्टी, पुआल और रेत के बीच बैठकर आने वाले त्योहार के लिए गणेश जी की मूर्तियां बनाने में तल्लीन हैं. वे आपस में काम बांटते हुए इशारों से बातचीत कर रहे हैं. कुछ छात्र मिट्टी गूंथ रहे हैं, कुछ मूर्ति के अलग-अलग हिस्से बना रहे हैं, तो कुछ उसे अंतिम रूप देने में मदद कर रहे हैं.

जानकारी के मुताबिक मूर्तियों को बनाने का काम 16 अगस्त को शुरू हो चुका है. तब से, इच्छुक छात्र क्लास के बाद और अपने खाली समय में एक साथ आते रहे हैं. वे इंटरनेट पर गणेश जी के डिजाइन ढूंढते हैं, अपनी पसंद के डिजाइन चुनते हैं और वैसी ही मूर्तियां बनाने की कोशिश करते हैं. मूर्तियां बनाते समय उनके चेहरों पर साफ उत्साह दिखाई देता है.
सभी छात्र इशारों-इशारों में बात करते हैं, कभी-कभी एक छात्र दूसरे को दिखाता है कि प्रतिमा के किसी हिस्से को कैसे ठीक किया जाए. वे तब तक काम जारी रखते हैं जब तक वे संतुष्ट न हो जाएं. दिव्यांग छात्र मूर्तियां बनाने के लिए मिट्टी, पुआल और रेत का इस्तेमाल कर रहे हैं. ज्यादातर सामान आसपास ही मिल जाता है. मिट्टी और रेत स्कूल के मैदान से इकट्ठा की जाती है, जबकि पुआल का इंतजाम शिक्षक करते हैं. छात्रों के लिए यह सारी गतिविधियां काफी मजेदार हैं और इससे उन्हें एक हुनर सीखने में मदद मिलती है. इससे उन्हें ग्रुप में काम करने, अपने आइडिया आजमाने और अपनी मेहनत का नतीजा देखने का मौका मिलता है.

बिपिन बिहारी गवर्नमेंट स्कूल फॉर द हियरिंग इम्पेयर्ड की एक स्टूडेंट दीपा बेहरा ने बताया कि स्कूल में त्योहार की तैयारियों में मूर्तियां बनाना एक जरूरी हिस्सा बन गया है. दीपा ने कहा कि हम सब मिलकर गणेश जी की मूर्तियां बना रहे हैं और इससे हमें बहुत खुशी और संतुष्टि मिलती है. हम हमेशा अपने हुनर का सही इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं. हर साल हम या तो भगवान गणेश या सरस्वती जी की मूर्तियां बनाते हैं.
एक और स्टूडेंट, अनीता साहू ने कहा कि जब भी बच्चों को कोई मुश्किल आती है, तो टीचर उनकी मदद करते हैं. उन्होंने कहा कि हम मुख्य रूप से मिट्टी, पुआल और रेत का इस्तेमाल करते हैं. मूर्तियां बनाते समय हमारे टीचर भी हमारी मदद करते हैं. बाजार से मूर्ति खरीदने के बजाय खुद मूर्ति बनाने में हमें ज्यादा खुशी मिलती है. वहीं, टीचर काबेरी जेना ने कहा कि स्टूडेंट्स ने इस काम में पहल की है. टीचर उन्हें गाइड करते हैं, लेकिन डिजाइन बच्चे ही चुनते हैं और मूर्तियां भी वही बनाते हैं. जेना ने कहा कि वे इंटरनेट पर गणेश जी के डिजाइन देखते हैं और अपनी पसंद के डिजाइन चुनते हैं. वे क्लास के बाद या जब भी उन्हें खाली समय मिलता है, तब मूर्तियों पर काम करते हैं.

यह एक परंपरा है कि शिक्षक और पुराने छात्र रंगों और सजावट के दूसरे सामान के खर्च में योगदान देते हैं. जेना के अनुसार, बच्चे मूर्तियों पर काम करने के मौके का बेसब्री से इंतजार करते हैं. उन्होंने बताया कि इस गतिविधि से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है. इससे उन्हें प्रैक्टिकल अनुभव भी मिलता है और अपनी क्रिएटिविटी का इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा मिलता है. स्कूल में पहली क्लास से लेकर प्लस टू तक के लगभग 150 छात्र पढ़ते हैं.

हेडमिस्ट्रेस पदमालया रे ने कहा कि आठवीं, नौवीं और दसवीं क्लास के छात्रों ने मूर्ति बनाने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी दिखाई है. हालांकि, जो भी बच्चा इसमें हिस्सा लेना चाहे, उसका स्वागत है. तो क्या हुआ अगर वे किसी चुनौती के साथ पैदा हुए हैं. उनकी क्रिएटिविटी की कोई सीमा नहीं है. हम उन्हें गाइड करते हैं ताकि वे अपनी स्किल्स को बेहतर बना सकें. रे ने कहा कि बच्चे अपने टैलेंट और मेहनत से मूर्तियां बना रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा कि इन मूर्तियों का इस्तेमाल स्कूल में गणेश पूजा के सेलिब्रेशन के दौरान किया जाएगा. जो बात इन्हें खास बनाती है, वह है इनके पीछे की मेहनत. हर स्टूडेंट ने किसी न किसी तरह से योगदान दिया है, चाहे वह मिट्टी तैयार करना हो, मूर्ति को आकार देना हो या उसे सजाने में मदद करना हो. जैसे-जैसे त्योहार पास आ रहा है, बच्चे अब मूर्तियां पूरी करने में लगे हुए हैं. उनके लिए खुशी सिर्फ सेलिब्रेशन में ही नहीं, बल्कि यह कहने में भी है कि जिस गणेश की वे पूजा करेंगे, उसे उन्होंने खुद अपने हाथों से बनाया है.

