बांस की कला को दी नई पहचान, कई देशों में दे चुके हैं ट्रेनिंग, सैकड़ों महिलाओं को मिला रोजगार
ओडिशा के बांस की कारीगरी के मास्टर एकादशी बरीक ने न सिर्फ इस कला को ऊंचाइयों तक पहुंचाया बल्कि महिलाओं को रोजगार से जोड़ा.

Published : January 11, 2026 at 2:07 PM IST
भुवनेश्वर: किसी देवी-देवता की मूर्ति हो या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति... चाहे मोर की कलाकृति हो या फूलों का गुलदस्ता... यह देखने में इतना सुंदर है कि नजरें हटाने का मन नहीं करता. जो भी इसे देखता है, एक पल के लिए रुक जाता है और इन कलाकृतियों को निहारता रहता है.. यह सब देखकर मन में आता है, वाह... कितनी सुंदर चीज है.
हालांकि, ये सभी सुंदर कलाकृतियां बांस से बनी हैं. इस कला के पीछे जिस कारीगर ने सबका ध्यान खींचा, वह हैं एकादशी बरीक. एकादशी न केवल बांस से कलाकृतियां बनाते हैं, बल्कि उन्होंने देश-विदेश में कई लोगों को बांस के प्रोडक्ट बनाने की कला सिखाई है और उन्हें रोजी-रोटी कमाने का रास्ता भी दिखाया है.

ओडिशा के कटक जिले में बांकी क्षेत्र के तालाबस्ता गांव के 56 साल के एकादशी बरीक 44 साल से बांस से कलाकृतियां और घरेलू उपयोग के सामान बनाकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं. परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं होने की वजह से एकादशी पढ़ाई नहीं कर पाए और बचपन से ही उन्होंने बांस को अपनी कमाई का जरिया बनाया.
1981 में उन्होंने बांस से उपयोगी सामान बनाने की ट्रेनिंग ली. 1982 में उन्होंने बांस से सामान बनाना शुरू किया. उन्होंने 1984 से बच्चों को ट्रेनिंग देना शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने खुद बांस से आर्ट बनाया और सरकारी और प्राइवेट लेवल पर अलग-अलग संस्थानों में बच्चों को ट्रेनिंग दी. एकादशी ने गांव की कई महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुफ्त में ट्रेनिंग भी दी है.

बारिक ने कुछ साल पहले सिर्फ 15 स्थानीय महिलाओं को बांस और बेंत की कला सिखाई थी, और यह एक छोटी, बिना पैसे की ट्रेनिंग के तौर पर शुरू हुई थी. यह आज 200 से अधिक महिलाओं के साथ एक मजबूत रोजी-रोटी का माध्यम बन गया है. उनकी कोशिशों की वजह से तालाबस्ता को 'बैम्बू केन विलेज' (बांस का गांव) का यह अनोखा टैग मिला है, जहां लगभग हर घर इस कला से कमाता है.

विदेश में दे चुके हैं ट्रेनिंग
एकादशी का कहना है कि उन्होंने बांस की कारीगरी की ट्रेनिंग राज्य में, राज्य के बाहर और विदेश में भी दी है. उन्होंने ओडिशा में करीब 12-13 हजार बच्चों को ट्रेनिंग दी है. उन्होंने झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में भी ट्रेनिंग दी है. उन्होंने मलेशिया में भी ट्रेनिंग दी है. वर्तमान में उन्होंने 200 से अधिक महिलाओं को रोजगार दिया है. एकादशी बरीक ने कहा, "बांस मेरे लिए भगवान जैसा है. बचपन में हमारे पास खाने को नहीं होते था, इसलिए मैं पढ़ाई नहीं कर सका. बांस की इस कला ने मुझे आगे बढ़ाया और यहां तक पहुंचाया. मैंने ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को रोजगार देने के लिए फ्री ट्रेनिंग दी है. वे आत्मनिर्भर बनी हैं."

बांस से बनाए जाने वाले सामान
बरीक बांस से सूप, टोकरी जैसे घरेलू सामान बनाने के अलावा, कई तरह के गहने, घर की सजावट के सामान, कई तरह की मूर्तियां, बेल्ट आदि बनाती हैं. उन्होंने कहा कि बांस एक ऐसा सामान है जिसका इस्तेमाल सतयुग से लेकर कलियुग तक कई तरह से होता आ रहा है. भले ही आजकल प्लास्टिक की डिमांड है, लेकिन बांस से बने सामान की डिमांड कम नहीं हुई है. उनका कहना है कि बांस से बने सामान कॉलेज गर्ल्स, मॉडल्स और विदेश में खासा पॉपुलर हैं, विशेष रूप से मलेशिया और अमेरिका में इसकी बहुत ज्यादा डिमांड है.

एकादशी के अनुसार, ओडिशा में मिलने वाला सारा बांस, सामान बनाने के लिए सही नहीं होता है. इसलिए, बांस केरल, झारखंड और असम जैसी जगहों पर उगाया जाता है. ओडिशा में 13 तरह के बांस पाए जाते हैं, भारत में 133 प्रकार के और दुनिया में 360 तरह के बांस पाए जाते हैं.
मेलों और फेस्टिवल में बेचते हैं प्रोडक्ट्स
एकादशी बरीक ओडिशा में अलग-अलग मेलों और फेस्टिवल्स में बांस के प्रोडक्ट्स बेचते हैं. उनके पास बांस के सामान के ऑर्डर अमेरिका और मलेशिया जैसे देशों से भी आते हैं. विदेश में बांस की ज्वेलरी की बहुत डिमांड है. इसी तरह, मॉडल्स भी बांस की ज्वेलरी पहनना पसंद करती हैं.

एकादशी की पत्नी सुलोचना बरीक भी उनके काम में मदद करती हैं. सुलोचना लोगों को बांस के प्रोडक्ट्स बनाने की ट्रेनिंग भी देती हैं. सुलोचना के मुताबिक, "हमसे ट्रेनिंग लेने वाले लोग भी आत्मनिर्भर बन गए हैं. वे अपना खर्च भी खुद उठा सकते हैं. हम सालाना एक लाख रुपये से ज्यादा कमाते हैं."
बांस से एक आभूषण बनाने में 7-10 दिन लगते हैं, जबकि बांस की मूर्ति बनाने में 4-5 महीने लगते हैं. घर का सामान बनाने में 2-3 दिन लगते हैं. सुलोचना ने कहा, "आजकल लोग बांस से बनी बेहतरीन ज्वेलरी पहनने में अधिक दिलचस्पी रखते हैं. 10-15 साल पहले बांस के प्रोडक्ट्स की कोई डिमांड नहीं थी. आजकल इसकी डिमांड अधिक है."

चुनौतियां और सरकारी सहायता की उम्मीद
एकादशी के मुताबिक, बांस के सामान बनाने में जितनी मेहनत लगती है, उसके हिसाब से कीमत उतनी नहीं मिलती. ज्यादातर प्रोडक्ट डुंगी बांस से बनते हैं. लेकिन ओडिशा में जरूरत के हिसाब से बांस नहीं मिलता. एकादशी ने कहा, "अगर सरकार हमें बांस उपलब्ध कराए और बांस के सामान बेचने में हमारी मदद करे, तो और कारीगर आत्मनिर्भर बन सकते हैं और अपना गुजारा कर सकते हैं."
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