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Explainer: बिहार के गंडक नदी में कैसे बढ़ती गई घड़ियालों की आबादी?

चंबल के बाद घड़ियालों की सबसे बड़ी आबादी बिहार के गंडक नदी में देखने को मिल रही है. आखिर कैसे यह मुमकिन हुआ, जानें.

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गंडक में घड़ियालों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी (सौजन्य WTI)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : February 18, 2026 at 12:06 PM IST

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रिपोर्ट: दिलीप कुमार

पश्चिम चंपारण: बिहार की गंडक नदी में कभी घड़ियाल खत्म होने के कगार पर पहुंच गए थे, लेकिन अब सैकड़ों की संख्या में उनके बच्चे नदी में दिख रहे हैं. घड़ियालों को मछली खाने वाला मगरमच्छ भी कहा जाता है. अधिकारियों के मुताबिक वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और फॉरेस्ट एंड एनवायरनमेंट क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट की मिली-जुली कोशिशों से घड़ियालों की संख्या बढ़ी है.

गंडक में घड़ियालों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी: 2015 में घड़ियालों की संख्या 54 थी जो अब बढ़कर 2025 में लगभग 400 हो गई है. इससे गंडक नदी भारत नेपाल और बांग्लादेश में अपने डिस्ट्रीब्यूशन रेंज में घड़ियालों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाली नदी बन गई है.

देखें वीडियो (सौजन्य WTI)

गंडक नदी में घड़ियालों की भरमार: वेस्ट चंपारण के कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स और फील्ड डायरेक्टर नेशामणि के. बताते हैं कि वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से होकर बहने वाली गंडक नदी पानी में रहने वाले जीवों के लिए अच्छी हैबिटैट है. इसलिए यह घड़ियालों के लिए भी अच्छी हैबिटैट साबित हो रही है. बेहतर मैनेजमेंट और कंजर्वेशन की वजह से गंडक में घड़ियालों की संख्या हर साल 20 से 22% बढ़ रही है. 2015 से 2025 तक के डेटा से पता चलता है कि नदी में घड़ियालों की संख्या में लगभग 588% की बढ़ोतरी हुई है.

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गंडक में घड़ियालों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी (सौजन्य WTI)

"2010-11 में दस घड़ियाल देखे गए थे. 2015 में गंडक नदी में एक सर्वे में 54 घड़ियाल मिले थे. आज, बड़े घड़ियालों की संख्या चार सौ से ज़्यादा हो गई है. 2015 से 2025 तक वाल्मीकि नगर से सोनपुर तक 326 किलोमीटर के हिस्से में 944 घड़ियालों को अंडे से निकलने के बाद गंडक नदी में छोड़ा गया. इसमें 2025 में छोड़े जाने वाले 212 घड़ियाल शामिल हैं. इस तरह बड़े और छोटे घड़ियालों की कुल संख्या 1000 से ज़्यादा हो गई है."- नेशामणि के, कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स और फील्ड डायरेक्टर

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ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

घड़ियाल संरक्षण गंडक नदी ने निभाई अहम भूमिका: गंडक घड़ियाल रिकवरी प्रोजेक्ट के को प्रोजेक्ट इन्वेस्टिगेटर समीर कुमार सिन्हा ने कहा कि गंडक ने घड़ियाल संरक्षण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है. 1975 में इस नदी से इकट्ठा किए गए अंडों ने ओडिशा के टिकरपाड़ा में घड़ियाल संरक्षण यूनिट में भारत का पहला कैप्टिव ब्रीडिंग और रिलीज प्रोग्राम शुरू करने में मदद की.

"आज गंडक को IUCN ने दुनिया के छह बड़े घड़ियाल हैबिटैट में से एक माना है, जिसके लिए वाइल्डलाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया और बिहार सरकार के पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने मिलकर कोशिश की है."- समीर कुमार सिन्हा, को प्रोजेक्ट इन्वेस्टिगेटर,गंडक घड़ियाल रिकवरी प्रोजेक्ट

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गंडक नदी में अनुकूल वातावरण (सौजन्य WTI)

दुनियाभर में घड़ियालों की संख्या में कमी: घड़ियालों की दुनिया भर में आबादी लगभग 98% कम हो गई, जिसमें 1997 और 2006 के बीच वयस्क आबादी में 58% की गिरावट दर्ज की गई. इस खतरनाक ट्रेंड की वजह से 2007 में इसे क्रिटिकली एंडेंजर्ड के तौर पर क्लासिफाई किया गया था.

IUCN ने दिए थे रिकवरी के संकेत: 2019 में IUCN (International Union for Conservation of Nature) के सबसे नए असेसमेंट में रिकवरी के संकेत दिखे, जिसमें दुनिया भर में लगभग 650 वयस्क ब्रीडिंग करने वाले जीव होने का अनुमान लगाया गया. समीर कुमार सिन्हा ने आगे कहा कि घड़ियाल नॉन एग्रेसिव होते हैं और इंसानों के लिए खतरा नहीं हैं.

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ऐसे किया गया घड़ियालों का संरक्षण: सिन्हा ने आगे कहा कि घोंसलों की सुरक्षा फरवरी की शुरुआत से मध्य तक किए गए. नदी सर्वे के जरिए घड़ियालों के ब्रीडिंग जमावड़े वाली जगहों की पहचान करने से शुरू होती है. इन जगहों पर लोकल कम्युनिटी वॉलंटियर्स और WTI बायोलॉजिस्ट रेगुलर तौर पर नज़र रखते हैं.

टीम की निगरानी से घड़ियालों की संख्या में इजाफा: मादा घड़ियाल मार्च के आखिर से अप्रैल की शुरुआत में ट्रायल नेस्टिंग शुरू करती हैं, जिसके बाद असल में नेस्टिंग और अंडे देना शुरू करती हैं. घड़ियाल प्रोजेक्ट टीम एक्टिव घोंसलों का पता लगाती है और लोकल कम्युनिटी से घोंसलों पर नजर रखने वालों को उन्हें नुकसान कटाव और रौंदने से बचाने के लिए भेजती है.

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जागरुकता अभियान का भी असर: घड़ियालों के संरक्षण के लिए जागरुकता भी काफी अहम रहा. पहले मछुआरे घड़ियालों को अपने जाल के लिए खतरा मानते थे, लेकिन वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और वन विभाग ने इसके प्रति लोगों को जागरुक किया. ग्रामीणों को समझाया गया कि घड़ियाल उनके लिए खतरनाक नहीं है और इंसानों पर हमला नहीं करते हैं. साथ ही मछुआरों को इस बात के लिए भी राजी किया गया कि अगर कोई घड़ियाल गलती से जाल में फंस जाए तो उसे मारना नहीं है, बल्कि सावधानी से निकालकर वापस नदी में छोड़ देना है.

वैज्ञानिक योजना और जमीन पर कड़ी मेहनत: फ्रंटलाइन फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के स्टाफ भी इस कोशिश में मदद करते हैं. कटाव वाले इलाकों में मौजूद घोंसलों को ट्रेंड टीम के सदस्य नदी के किनारे से दूर हाथ से खोदे गए घोंसलों में सावधानी से शिफ्ट करते हैं. इन शिफ्ट किए गए घोंसलों पर सफल हैचिंग 60-70 दिनों के इनक्यूबेशन के बाद तक नजर रखी जाती है, जिसमें प्रोजेक्ट टीम मदद करती है. हैचलिंग को नदी में, मां के पास छोड़ दिया जाता है जो अक्सर उनका इंतज़ार करते हुए पास में ही रहती हैं.

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गंडक नदी में घड़ियाल (सौजन्य WTI)

WTI और लोकल कम्युनिटीज़ का प्रयास हुआ सफल: उन्होंने आगे कहा कि गंडक नदी में घड़ियाल की रिकवरी यह साफ दिखाती है कि अगर कंजर्वेशन के काम स्ट्रेटेजिक सबको साथ लेकर चलने वाले हों और साइट स्पेसिफिक खतरों को कम करने पर फोकस करें तो क्रिटिकली एंडेंजर्ड स्पीशीज को भी वापस लाया जा सकता है. यह सफलता वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट और लोकल कम्युनिटीज़ के मिलकर किए गए प्रयासों से मिली. ब्रीडिंग की सफलता और लंबे समय तक सुरक्षा को बेहतर बनाने पर ज़ोर दिया गया.

सर्वे की पूरी प्रक्रिया:घड़ियालों की गणना का सर्वे टीम और बिहार वन विभाग ने किया है. यह सर्वे WTI के फील्ड ऑफिसर शांतम ओझा के नेतृत्व में किया गया है. सर्वे पीरियड 10 दिन का था. यह 23 जनवरी से 1 फरवरी के बीच के आंकड़े हैं. वाल्मीकि नगर बैराज से हाजीपुर तक 310 किलोमीटर तक गंडक नदी में सर्वे किया गया है.

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घड़ियालों की गणना: वाल्मीकि नगर से हाजीपुर तक 310 किलोमीटर तक घड़ियालों की संख्या को लेकर सर्वे किया गया है. पिछली जनगणना से अभी अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 310 किलोमीटर में 370 से ऊपर घड़ियाल देखे गए हैं. सर्वे में पाया गया कि 2026 में भारत में चंबल के बाद गंडक नदी ऐसी दूसरी नदी है, जिसमें सबसे ज्यादा घड़ियाल रहते हैं. गंडक नदी में गंगा यमुना नदी से ज्यादा साफ सफाई है और घड़ियालों के लिए उत्तम जगह मानी जाती है, क्योंकि यहां पर कम डिस्टरबेंस है. इसके चलते घड़ियालों को हानि कम होती है.

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अंडे से निकलते घड़ियाल के बच्चे (सौजन्य WTI)

घड़ियालों के लिए अनुकूल गंडक: घड़ियालों को धूप सेंकने और अंडे देने के लिए ऊंची रेतीले किनारों की आवश्यकता होती है, जो गंडक नदी में आसानी से उपलब्ध है. चंबल नदी की तरह गंडक का पानी भी कम प्रदूषित है और गहरा है, जो घड़ियालों की आबादी बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है.

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गंडक नदी में ज्यादा नाव का परिचालन नहीं होता है. मछलियां भी ज्यादा संख्या में नहीं मारी जाती हैं. मछली मारने के लिए गंडक नदी में मच्छरदानी का प्रयोग किया जाता है, जिसके चलते घड़ियाल सुरक्षित रहते हैं. घड़ियाल की संख्या गंडक नदी में और भी बढ़ाने के लिए गंडक नदी को ऐसे ही स्वच्छ बनाए रखना होगा, जिससे घड़ियाल की संख्या वृद्धि होती रहेगी.

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अंडों को किया जाता है संरक्षित (सौजन्य WTI)

बिहार का पहला और एकमात्र घड़ियाल अभयारण्य: गंडक नदी के लगभग 150 किलोमीटर लंबे हिस्से को घड़ियालों के लिए संरक्षित घोषित करने की प्रक्रिया और इसकी देखरेख ने इसे एक अनौपचारिक अभयारण्य का रूप दे दिया है. इसकी स्थिति की बात करें तो सरकार इस क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर कंजर्वेशन रिजर्व के रूप में मजबूती देने का काम कर रही है. यहां अवैध बालू खनन और मछली पकड़ने पर सख्त पाबंदी है. इसके कारण घड़ियालों के प्राकृतिक आवास सुरक्षित हैं.

घड़ियाल को 'नदी का डॉक्टर' या नेचर एपेक्स प्रिंटर्स भी कहते हैं, जैसे किसी भी इकोसिस्टम के लिए अलबेला स्पीशीज होता है, वैसे ही घड़ियाल पानी के लिए है. घड़ियाल केवल बीमार या कमजोर मछलियों को खाकर नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत रखते हैं. जहां अधिक संख्या में मछलियां हैं, वहां घड़ियाल की उपस्थिति भी अच्छी होती है.

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