जिंदगी के आखिरी पड़ाव में सहारे की तलाश! झारखंड में तेजी से बढ़ रहा पेलिएटिव केयर
लाइलाज और गंभीर बीमारियों के मरीजों को दर्द से राहत देने की पहल सरकार कर रही है. रांची से उपेंद्र कुमार की रिपोर्ट.

Published : June 11, 2026 at 3:57 PM IST
रांची: भारत में गंभीर, असाध्य और जीवन को सीमित करने वाली बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है. ऐसे मरीजों के लिए केवल इलाज ही पर्याप्त नहीं, बल्कि दर्द से राहत, मानसिक सहारा और सम्मानजनक जीवन भी जरूरी है. इसी जरूरत को पूरा करने के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय उपशामक देखभाल कार्यक्रम (National Programme for Palliative Care - NPPC) शुरू किया है.
झारखंड में वर्ष 2022 से चरणबद्ध तरीके से इस कार्यक्रम की शुरुआत हुई. हर साल छह-छह जिलों को शामिल करते हुए अब राज्य के सभी 24 जिलों में NPPC लागू हो चुका है. झारखंड के स्टेट नोडल अधिकारी डॉ. लाल मांझी ने बताया कि राज्य सरकार इस कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा रही है.
पैलिएटिव केयर क्या है?
पैलिएटिव केयर या उपशामक देखभाल गंभीर एवं लाइलाज बीमारियों से पीड़ित मरीजों तथा जीवन के अंतिम चरण में पहुंच चुके लोगों के लिए विशेष चिकित्सा व्यवस्था है. इसका मुख्य उद्देश्य केवल जीवन को बढ़ाना नहीं, बल्कि मरीज और उसके परिवार की जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाना है. इसमें दर्द निवारण, मनोवैज्ञानिक सहायता, सामाजिक समर्थन और आध्यात्मिक परामर्श जैसी सेवाएं शामिल हैं.
कार्यक्रम की पृष्ठभूमि
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 2012 में पेलिएटिव केयर पर विशेषज्ञ समूह गठित किया था. समिति की सिफारिशों के आधार पर 2014 में राष्ट्रीय उपशामक देखभाल कार्यक्रम (NPPC) की शुरुआत हुई. बाद में इसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के मिशन फ्लेक्सीपूल के तहत शामिल कर लिया गया, ताकि राज्यों को पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता मिल सके.

झारखंड में तैयारियां तेज
झारखंड की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि सभी 24 जिला अस्पतालों में पैलिएटिव केयर यूनिट स्थापित कर दी गई हैं. सरकार अब इन्हें आगे बढ़ाते हुए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और FRU स्तर पर भी उपलब्ध कराने की योजना बना रही है. इस पहल से राज्य के लाखों मरीजों और उनके परिवारों को दर्द मुक्त और सम्मानपूर्ण जीवन जीने में मदद मिलेगी.
किन मरीजों को मिल सकता है लाभ?
यद्यपि कार्यक्रम की शुरुआत में मुख्य रूप से कैंसर और एड्स के मरीजों पर फोकस था, लेकिन अब इसका दायरा काफी विस्तृत हो चुका है. राष्ट्रीय पेलिएटिव केयर कार्यक्रम (NPCC) के तहत निम्नलिखित बीमारियों से ग्रसित मरीजों को अस्पताल में भर्ती कर व्यापक सेवा प्रदान की जाती है:
- कैंसर और एचआईवी/एड्स
- स्ट्रोक एवं लकवा
- पार्किंसन रोग, अल्जाइमर एवं डिमेंशिया
- गंभीर मानसिक रोग
- थैलेसीमिया, सिकल सेल रोग एवं जटिल क्षय रोग (TB)
- जन्मजात गंभीर विकार
- अन्य जीवन-सीमित एवं असाध्य बीमारियां
केंद्र की मदद, राज्यों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
केंद्र सरकार इस कार्यक्रम के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है, जबकि राज्य सरकारें अपने वार्षिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में पेलिएटिव केयर को शामिल करती हैं.

झारखंड में चरणबद्ध विस्तार, फिर भी कई चुनौतियां
झारखंड में सभी 24 जिलों में चरणबद्ध तरीके से 10-10 बेड वाले पेलिएटिव यूनिट स्थापित किए जा रहे हैं. हालांकि, केरल और मेघालय जैसे राज्यों की तुलना में झारखंड अभी काफी पीछे है. कई जिला अस्पतालों में अलग यूनिट की बजाय इसे अन्य वार्डों के साथ संचालित किया जा रहा है. इस वित्तीय वर्ष में झारखंड को NPCC के तहत केंद्र सरकार से करीब 75 लाख रुपये की राशि प्राप्त हुई है.
2022 से शुरू, हर साल 6 जिलों में नई यूनिट
NPCC के झारखंड स्टेट नोडल अधिकारी डॉ. लाल मांझी ने बताया कि वर्ष 2022 से प्रति वर्ष छह जिला अस्पतालों में पेलिएटिव केयर यूनिट शुरू किए जा रहे हैं. रांची के सदर अस्पताल समेत कई जिलों में कार्यक्रम सुचारू रूप से चल रहा है, जबकि कुछ स्थानों पर बेड और जगह की कमी के कारण इसे अन्य वार्डों के साथ जोड़कर संचालित किया जा रहा है. डॉ. मांझी ने कहा, “हम लगातार अपनी सेवाओं को बेहतर बना रहे हैं. कुछ बाधाएं आ रही हैं, जिन्हें दूर करने का प्रयास जारी है.” NPCC के तहत अस्पताल में भर्ती मरीज को दवाएं, भोजन और अन्य जरूरी सुविधाएं पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं.

सदर अस्पताल में ओल्ड एज होम के बुजुर्ग का चल रहा इलाज
रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. बिमलेश कुमार सिंह ने बताया कि अस्पताल के तीसरे तल्ले पर पेलिएटिव वार्ड संचालित हो रहा है. यहां वर्तमान में ओल्ड एज होम से आए एक बुजुर्ग मरीज का इलाज चल रहा है.
डॉक्टर्स, नर्सें और मेडिकल स्टाफ मरीजों की देखभाल सिर्फ चिकित्सकीय दृष्टि से नहीं, बल्कि पूरी मानवीयता और संवेदनशीलता के साथ करते हैं. डॉ. सिंह ने बताया कि कई गंभीर मरीज इलाज के बाद राहत पाकर घर लौट चुके हैं. कार्यक्रम के विस्तार और गुणवत्ता सुधार के साथ झारखंड में पेलिएटिव केयर की पहुंच और बेहतर होने की उम्मीद है.
केस स्टडी-1: रांची के नगड़ी स्थित ओल्ड एज होम के निरीक्षण के दौरान रांची डीसी मंजूनाथ भजंत्री ने पाया कि एक 75 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग सूरज नारायण गुप्ता का स्वास्थ्य ठीक नही है. वह निम्न रक्तचाप, खून की कमी और बेड सोर से ग्रसित हैं. उपायुक्त रांची के निर्देश पर वयोवृद्ध सूरज नारायण गुप्ता को सदर अस्पताल के तीसरे तल्ले पर स्थित Palliative Care यूनिट में भर्ती कराया गया. करीब एक-डेढ़ महीने से सदर अस्पताल में उनका इलाज जारी है.
ओल्ड एज होम, नगड़ी के संचालक पंकज कुमार बताते हैं कि उनकी सेहत में अब बहुत सुधार है. सदर अस्पताल के चिकित्सकों, नर्सों और मेडिकल स्टाफ की पूरी मानवीयता के साथ की जा रही सेवा का असर है कि सूरज नारायण गुप्ता को स्वास्थ्य लाभ हो रहा है. उन्होंने बताया कि इससे पहले उनके यहां से मंजू देवी, गीता देवी जैसी बुजुर्ग महिलाओं को भी बीमारी की स्थिति में Palliative Care कार्यक्रम के तहत पूरी तरह निशुल्क पर गुणवत्तापूर्ण इलाज मिला है.
केस स्टडी-2: रांची के डंगराटोली के रहने वाले विनय उरांव कहते हैं कि उनके बाबा (दादा) बुधन उरांव, एक दिन सुबह सुबह टॉयलेट में गिर गए, जिसके बाद उन्हें सदर अस्पताल ले गए जहां डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें बीपी बढ़ने से स्ट्रोक हुआ है. सीटी स्कैन में ब्रेन के एक हिस्से में खून का थक्का जमा था, जो दवा से धीरे धीरे समाप्त होता, ऐसे में उनके बाबा को करीब एक महीने तक सदर अस्पताल के Palliative Care में रखकर इलाज किया गया, फिजियोथेरेपी भी हुई और पहले जैसा तो नहीं लेकिन वाकर के सहारे वह चलफिर लेते हैं.
कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य व्यवस्था में एक अच्छी मानवीय पहल है, यह योजना उन मरीजों के लिए आशा की किरण है जिनकी बीमारी का पूर्ण उपचार संभव नहीं है लेकिन जिनके दर्द और पीड़ा को कम किया जा सकता है. बदलती जीवनशैली और बढ़ते गैर-संचारी रोगों के दौर में पैलिएटिव केयर केवल चिकित्सा सेवा नहीं, बल्कि गरिमा, संवेदना और मानवीय सम्मान से जुड़ा विषय है. अगर इस कार्यक्रम को जिला स्तर से आगे ले जाकर इसे केरल या मेघालय के तर्ज पर गांवों तक प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और इससे समुदाय को भी जोड़ा जाए तो लाखों मरीजों और उनके परिवारों का जीवन अपेक्षाकृत बेहतर और सम्मानजनक बनाया जा सकता है.
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