लोगों को ही नहीं तंत्र को भी विश्वास नहीं कि नक्सलवाद खत्म हो गया: डॉ लक्ष्मी शंकर निगम
'बस्तर के आदमी को कोट पैंट टाई पहना दें तो क्या वो बस्तर की मूल संस्कृति को स्थापित करेगा''. भूपेंद्र दुबे की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : July 6, 2026 at 10:00 PM IST
रायपुर: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समाप्ति के 100 दिन पूरे हो रहे हैं. 31 मार्च 2026 के नक्सली समाप्ति की घोषित तिथि के बाद छत्तीसगढ़ में बदलाव और उम्मीद की एक नई तैयारी शुरू हुई है. सरकार के स्तर पर आम लोगों के स्तर पर बस्तर में रहने वाले लोगों के अपने स्तर पर बदलाव को जिस रूप में दिया जा रहा है उसमें आम जनमानस किस रूप में उस बदलाव को देख रहा है.
बदलाव के लिए कौन से प्रारूप तेजी से काम करेंगे, या सरकार की जो रणनीति विकास को लेकर बनी है वह आम जनता के लिए कितना उपयोगी है, इसे लेकर पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और शंकराचार्य प्रोफेशनल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ लक्ष्मी शंकर निगम ने ईटीवी भारत से खास बातचीत की. डॉ लक्ष्मी शंकर निगम ने कहा कि बदलाव की बड़ी संभावनाएं छत्तीसगढ़ में हैं. खास तौर से बस्तर के विकास के लिए बस्तरिया मॉडल का होना जरूरी है. बस्तर की मूल कल्पना बची रहे, बस्तर का मूल आधार बचा रहे. विकास के ऐसे ही मापदंड बस्तर में खड़े होने चाहिए.
डॉ लक्ष्मी शंकर निगम ने कहा कि बस्तर जिस रूप से जीवंत होता है, उसकी जीवंतता को बनाए रखने के लिए ही योजना बनाई जानी चाहिए, ताकि बस्तर की मूल थाती, उसकी प्राकृतिक विरासत उसका प्राकृतिक सौंदर्य सब कुछ इस स्वरूप में बना रहे.
सवाल: बस्तर के लोगों के भीतर एक जो डर है उसे डर से कितना बाहर निकल पाया बस्तर ?
जवाब: सरकार की व्यवस्था थोड़ी अलग होती है. इसकी कार्य संस्कृति में भी कुछ अलग बातें होती हैं. समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और उसके हिसाब से अधिकारियों से काम कराने के तरीके भी अलग हो जाते हैं. जब इन तीनों का एकीकरण होगा फिर तंत्र का पॉलिटिकल बिल और प्रशासन उसका पालन करेगा तब उसके बाद हमें उत्तर नजर आएंगे. अभी कुछ दिनों पहले मैंने पढ़ा था कोई ब्रिज बन रहा है जिसकी सुरक्षा के लिए 100 जवान अभी भी मौजूद हैं, यह क्या इंडिकेट करता है. यह इंडिकेट करता है कि लोगों में ही नहीं अभी तंत्र में ही पूरा विश्वास नहीं हुआ है कि परिस्थितियां बदल गई हैं. अभी जनमानस में क्या है इस पर चिंतन करने की जरूरत है, उस पर फील्ड वर्क करने की जरूरत है.
सवाल: भरोसा एक बहुत बड़ी चीज होती है, उस भरोसे को कितना कायम करने में सफल रहे हैं ?
जवाब: भरोसा लोगों के भीतर कायम हुआ है, लेकिन पूरे तौर पर नहीं, हालांकि कभी पूरा होगा भी नहीं. जो 50 सालों में अभी तक हुआ है, उसका माइंडसेट जो बना है, उसका जो प्रभाव है उसको निकालने में समय लगेगा. निश्चित तौर पर उसकी एक प्रक्रिया है और उस दिशा में हम आगे बढ़ भी रहे हैं. उसमें हमें जो कठिनाई दिखती है वह है डेवलपमेंट का मॉडल. जो डेवलपमेंट का मॉडल न्यूयॉर्क का है लंदन का मॉडल है, वह दिल्ली पर लागू नहीं होता. दिल्ली का मॉडल रायपुर पर लागू नहीं होता और रायपुर का मॉडल बस्तर में लागू नहीं होता है. अगर इसे आप लागू करने की कोशिश करेंगे तो इसका परिणाम क्या होगा नहीं कहा जा सकता.
सवाल: क्या यह सांस्कृतिक आधार पर आप कह रहे हैं ?
जवाब: संस्कृति का निर्माण प्रकृति से होता है, जो प्राकृतिक वातावरण वहां का है, झरना है, पहाड़ है, जंगल है, वहां के स्थल हैं, वृक्ष हैं. वह वहां की संस्कृति के निर्माण में बड़ी भूमिका अदा करते हैं. बाकी इसे मूल संगठक संरचना का कह सकते हैं. उस संस्कृति और प्रकृति के समन्वय को अगर ठीक से नहीं समझ पाएंगे तो आपके डेवलपमेंट का मॉडल कितने दिन टिकेगा या नहीं कहा जा सकता है.
सवाल: आज का युवा नक्सल के 50 साल नहीं जानता, तो बस्तर की संस्कृति और विकास को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी वो कैसे उठाएगा ?
जवाब: बंदूक की बदौलत बस्तर ने अपनी संस्कृति को छोड़ा है, यह बात नहीं कही जा सकती है, यह आउटसाइड और थॉट हो सकती है. घोटुल के खत्म होने की जो कहानी है वह थोड़ी अलग है. उसके लिए थोड़ी सी अलग परिकल्पना और सोच है. प्रगति के साथ बदलाव जरूरी है और उस समय जिस तरह के आधार रहे होंगे उसमें बदलाव भी हो रहा है वह जरूरी भी है.
सवाल: सरकार जो बनना चाहती है, वह उसे आधुनिक व्यवस्था में इंटरनेट की दुनिया बता रही है. उसके आधार पर बढ़ता बस्तर होगा या बस्तर की जो मूल बुनियाद थी, उसके आधार पर बस्तर को बनाने की बुनियाद होगी ?
जवाब: दरअसल, इसी पर काम करने की जरूरत है. जो लोग परियोजना बनाते हैं, उन लोगों को इस पर ध्यान रखना होगा कि रायपुर का मॉडल बस्तर में काम नहीं आएगा और दिल्ली का मॉडल रायपुर में काम नहीं आएगा. अगर इस बुनियादी आधार को नहीं समझा गया तो विकास के मायने भटक भी सकते हैं. बस्तर की संस्कृति को बनाए रखते हुए किस तरह का संस्कार वहां दिया जा सकता है, इसी तरह के मॉडल की जरूरत बस्तर को है. वही मॉडल वहां पर सबसे बेहतरीन मॉडल के तौर पर स्थापित भी होगा. उनकी संस्कृति को नष्ट करके अगर आप बस्तर को बनाना चाहेंगे तो उसका कोई औचित्य नहीं है, उसका कोई उपाय नहीं है.
सवाल: बस्तर की संस्कृति को धरोहर माना जाए और धरोहर के आधार पर बस्तर का विकास किया जाए तो वहां बहुत कुछ बदला जा सकता है ?
जवाब: धरोहर क्या है. बहुत सीधे शब्दों में अगर कहा जाए तो मैं यह कहूंगा कि मेरे पिताजी ने जो मुझे दिया उसे मैं अपने बेटे को ट्रांसफर कर दूं, यह जो परंपरा चली आई है यही धरोहर है. धरोहर का मतलब केवल यही नहीं है कि यदि आदिवासी संस्कृति को हम बदल दें. यदि ऐसा हुआ तो फिर बस्तर नहीं रहेगा. आप अंदाजा लगाएं अगर बस्तर वाले आदमी को हम कोट पैंट टाई पहना दें तो क्या वो बस्तर की मूल संस्कृति को स्थापित करेगा. मुझे नहीं लगता है कि ये सही होगा.
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