ETV Bharat / bharat

क्या चाबहार पोर्ट से पीछे हट रहा भारत?; इस बार के बजट में कोई फंड नहीं दिया

व्यापारिक और राजनीतिक रणनीति के लिहाज से भारत के लिए अहम है यह पोर्ट, क्या अमेरिकी दबाव है कारण?.

ईरान में स्थित है चाहबहार पोर्ट, भारत ने इस बार नहीं दिया फंड.
ईरान में स्थित है चाहबहार पोर्ट, भारत ने इस बार नहीं दिया फंड. (Photo Credit; ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Hindi Team

Published : February 2, 2026 at 2:04 PM IST

|

Updated : February 3, 2026 at 3:42 PM IST

13 Min Read
Choose ETV Bharat

हैदराबाद : व्यापारिक-राजनीतिक लिहाज से अहम चाबहार पोर्ट के लिए इस बार भारत ने कोई बजट नहीं दिया. ऐसे में माना जा रहा है कि भारत इस पोर्ट से पीछे हट गया है. एक्सपर्ट के मुताबिक यह अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का नतीजा है.

एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपना नौवां केंद्रीय बजट पेश किया. 53.47 लाख करोड़ रुपये के आकार वाले इस बजट में ईरान के चाबहार पोर्ट के लिए एक भी रुपया नहीं दिया गया. जबकि पिछले बजट में सरकार ने 400 करोड़ रुपये दिए थे. यह पोर्ट कई मायने में भारत के लिए काफी अहम माना जाता है.

चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत यूरोप तक व्यापार कर सकता है. ईरान के अलावा रूस को भी इससे काफी लाभ पहुंचता है. इस पोर्ट के जरिए भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान को दरकिनार कर मध्य एशिया और अफगानिस्तान के बाजारों तक अपनी पहुंच बनाता है.

भारत इस पोर्ट पर अब तक अरबों रुपये निवेश कर चुका है. क्या भारत अमेरिका के दबाव में है?, क्या ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते सरकार ने अपने कदम वापस खींच लिए हैं, देश के लिए क्या हैं इस पोर्ट के मायने, पोर्ट के लिए किसी भी बजट का प्रावधान न करने के पीछे की क्या है वजह?, अन्य देशों के लिए कितना जरूरी है यह पोर्ट?. पढ़िए ईटीवी भारत की रिपोर्ट...

भारत के लिए क्यों जरूरी है यह पोर्ट? : चाबहार पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में मौजूद है. यह समुद्री इलाका भारत को काफी समय से एक वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराता है. यह भारत के काफी नजदीक भी है. चाबहार के 2 टर्मिनल हैं, इनमें से एक शाहिद कलंतरी जबकि दूसरा शाहिद बहिश्ती हैं. यह पोर्ट होर्मुज जलसंधि से बाहर है. इसे बड़े जहाजों के लिए सुरक्षित माना जाता है. यह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से 170 किमी दूर है.

भारत के लिए चाबहार पोर्ट का सामरिक महत्व : भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक व्यावसायिक पोर्ट प्रोजेक्ट नहीं है. यह एक रणनीतिक संपत्ति है. यह स्ट्रेटेजिक पोर्ट सेंट्रल एशिया और नॉर्दर्न यूरोप के लिए भारत का गेटवे है. चाबहार पोर्ट के चालू होने से भारत का आयरन, चीनी और चावल का इंपोर्ट काफी बढ़ेगा. जबकि तेल इंपोर्ट की लागत कम होगी. पोर्ट के अपग्रेड होने से इसे नॉर्थ-साउथ रूट तक इंटरनेशनल एक्सेस मिलेगा.

अनुमान है कि चाबहार पोर्ट से शिपिंग की लागत में लगभग 60% की कमी आएगी और भारत से सेंट्रल एशिया तक शिपिंग का समय आधा हो जाएगा. इसके अलावा यह पोर्ट भारत के रूस के साथ व्यापार को पारंपरिक स्वेज कैनाल रूट की तुलना में 30% तेज और सस्ता बना देगा.

भारत ने कई करोड़ रुपये पोर्ट पर किए इनवेस्ट.
भारत ने कई करोड़ रुपये पोर्ट पर किए इनवेस्ट. (Graphics credit; ETV Bharat)

यह भी पढ़ें : UGC के 'काले कानून' पर क्यों मचा इतना बवाल; क्या वाकई जनरल स्टूडेंट के साथ भेदभाव कर रहे नए नियम?

अरबों रुपये निवेश कर चुकी है सरकार : भारत ने ईरान सरकार के साथ इस पोर्ट को लेकर समझौते किए. इसके बाद अरबों रुपये निवेश किए. शाहिद बहिश्ती और कलंतरी टर्मिनल का संचालन भारत सरकार का इंडिया पोर्ट ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) और ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन मिलकर करते हैं. यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के लिए भी काफी अहम माना जाता है. हालांकि चाबहार पोर्ट को लेकर विपक्षी पार्टी कांग्रेस समय-समय पर भाजपा पर निशाना भी साधती रहती है.

चाबहार को लेकर भारत-ईरान का क्या है समझौता? : मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने साल 2016 में चाबहार पोर्ट के शाहिद बहिश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए समझौता किया था. हर साल इसका नवीनीकरण भी होता रहा. इसके बाद 13 मई 2024 को 10 साल के लिए इस टर्मिनल के संचालन का करार हुआ. इसके बाद फिर साल 2024 में भी भारत और ईरान के बीच चाबहार के विकास को लेकर समझौता हुआ.

यह भी पढ़ें : चीन को पछाड़ कर भारत कैसे बना चावल उत्पादन में नंबर-1? दुनिया का 28% धान हमारे किसानों ने उगाया

क्या ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध का है प्रभाव? : चाबहार परियोजना पहले भी अमेरिकी प्रतिबंध झेलती रही है. साल 2018 में अमेरिका ने इसमें कुछ छूट दी थी. इसके बाद ट्रंप की सरकार ने दोबारा से प्रतिबंध लगा दिए थे. हालांकि बाद फिर से रियायत दी गई. साल 2025 के सितंबर महीने में अमेरिका ने चाबहार पोर्ट को संचालित करने पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दिया. हालांकि कुछ महीने की छूट भी दी थी. यह अभी भी लागू है.

चर्चा है कि अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से ही भारत ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं. इसी के तहत बजट में कोई प्रावधान नहीं किया गया है. एक कारण यह भी है कि पिछले दो सालों में ईरान पहले की तुलना में कमजोर भी हुआ है. हालांकि कुछ जानकार इसे भारत की दूसरी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं. उनका कहना है कि भारत अभी इस पोर्ट से पूरी तरह हटा नहीं है.

चाबहार पर क्या है मौजूदा स्थिति? : ईरान में चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से भारत बाहर निकल गया है. ऐसी चर्चाओं ने जनवरी में भी रफ्तार पकड़ी थी. इसके बाद विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया था कि अमेरिका ने भारत को एक लेटर जारी किया है. इसमें 26 अप्रैल 2026 तक प्रोजेक्ट के लिए बिना शर्त बैन से छूट दी गई है. उन्होंने यह भी बताया कि हम इस अरेंजमेंट पर अमेरिका के साथ काम कर रहे हैं. मतलब साफ है कि 26 अप्रैल तक पोर्ट पर भारत पहले की तरह काम करता रहेगा.

चाबहार पोर्ट का इतिहास : चाबहार पोर्ट की पहुंच हिंद महासागर तक है. इस पोर्ट के पड़ोस में टिस नाम का एक पुराना पोर्ट भी है. यह 2500 ईसा पूर्व का बताया जाता है. यह सिकंदर की जीत के दौरान चर्चा में आया. अफोंसो डी अल्बुकर्क के नेतृत्व में पुर्तगाली सेना ने चाबहार और टिस पर कंट्रोल कर लिया था. 1621 तक इसे अपने कब्जे में रखा.

अमेरिका ने लगा रखे हैं कई तरह के प्रतिबंध.
अमेरिका ने लगा रखे हैं कई तरह के प्रतिबंध. (Graphics credit; ETV Bharat)

मौजूदा समय का चाबहार पोर्ट लगभग 1970 में अस्तित्व में आया. इसे नगर पालिका घोषित किया गया. ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी के आदेश पर बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट शुरू किए गए थे. वह इस पोर्ट को बड़े नौसेना के अड्डे के रूप में बदलना चाहते थे.

ईरानी क्रांति में उनके हटने से बड़े प्रोजेक्ट रुक गए. चाबहार ईरान-इराक युद्ध (1980-1988) के दौरान अपनी पहचान बना पाया. उस दौरान होर्मुज स्ट्रेट से लेन-देन मुश्किल हो गया था. जहाज फारस की खाड़ी में नहीं जा पा रहे थे. इस वजह से यह ईरान का एक बड़ा बंदरगाह बन गया.

इसकी इंटरनेशनल लॉजिस्टिक और स्ट्रेटेजिक वैल्यू बहुत ज्यादा थी. चाबहार अफगानिस्तान और सेंट्रल एशियाई देशों तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान से नजदीक है. यह उन देशों के लिए एक 'गोल्डन गेट' बनाती है.

भारत ने पोर्ट को डेवलप करने के लिए एग्रीमेंट कब साइन किया? : मई 2015 में भारत और ईरान ने चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट प्लान में भारत की पार्टनरशिप’ पर एक MoU साइन किया. इसके बाद मई 2016 में भारत-ईरान और अफगानिस्तान के बीच इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट और ट्रांजिट कॉरिडोर (चाबहार एग्रीमेंट) बनाने के लिए एक त्रिपक्षीय समझौते पर साइन हुआ.

साल 2016 में प्रधानमंत्री मोदी के ईरान दौरे के दौरान दोनों देशों ने चाबहार पोर्ट के दो टर्मिनल डेवलप करने के लिए एक एग्रीमेंट साइन किया. इसमें नई दिल्ली ने 500 मिलियन डॉलर का निवेश किया. साल 2015 से भारत ने चाबहार पोर्ट के डेवलपमेंट में लगभग 1,100 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.

क्या भारत के पीछे हटने से चीन को होगा फायदा? : चीन की मौजूदगी पहले से ही पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर है. ऐसे में भारत यदि चाबहार से पीछे हटता है तो इस इलाके में अधिकार जमाने के लिए चीन को एक मौका जरूर मिल सकता है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के खतरे से भारत वाकिब है, और अमेरिका से बैर ठीक नहीं. इसीलिए 2026-27 के बजट में चाबहार के लिए कोई रकम नहीं दी गई. यह भारत की दूसरी रणनीति का हिस्सा है.

पोर्ट के कुछ अहम बिंदुओं के बारे में जानिए.
पोर्ट के कुछ अहम बिंदुओं के बारे में जानिए. (Graphics credit; ETV Bharat)

ईरान के लिए कितना जरूरी है ये बंदरगाह? : ईरान के पास कुल 6 बंदरगाह हैं. इनमें बंदर अब्बास बंदरगाह प्रमुख है. यह होर्मुज द्वीपसमूह के पार मौजूद है. अमीराबाद बंदरगाह माजदरान प्रांत में कैस्पियन सागर तट पर है. इसके अलावा अंजली, नौशहर, चाबहार और इमाम खुमैनी बंदरगाह भी हैं. ईरान की 90 प्रतिशत आबादी देश के पश्चिमी भाग में रहती हैं, क्योंकि पूर्वी भाग कम विकसित है.

ईरान चाहता है कि चाबहार बंदरगाह के आसपास ज्यादा विकास हो, चाबहार बंदरगाह को मध्य एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में उपयोग किया जा सके. ईरान काफी हद तक अब्बास बंदरगाह पर निर्भर है. हालांकि यह गहरे पानी का बंदरगाह नहीं है. यह बड़े माल वाहक जहाजों को नहीं संभाल पाता है. जबकि चाबहार में बड़े जहाज आसानी से पहुंच सकते हैं. ऐसे में इस पोर्ट के लिए अगर भारत उदासीनता वाला रवैया अपनाता है तो यह ईरान के लिए भी बड़ा झटका साबित होगा.

ईरान पर क्यों प्रतिबंध लगाता है अमेरिका? : साल 1979 से ही अमेरिका और ईरान में तनानती चल रही है. ईरानी क्रांति के बाद कुछ खास गतिविधियों में शामिल होने से रोकने के लिए उस पर अमेरिका ने कई प्रतिबंध लगाए. इसके पीछे की वजह खास तौर पर आतंकवाद से संबंधित गतिविधियों को रोकना रहा. परमाणु शक्ति बनने से रोकना भी एक कारण रहा. मानवाधिकार का उल्लंघन भी इसमें शामिल था.

राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा भी अपने-अपने कार्यकाल में अमेरिकी कंपनियों को ईरान के साथ व्यापार करने से प्रतिबंधित कर चुके हैं. ईरान के तेल और बैंकिंग उद्योगों पर भी कई प्रतिबंध लगाए गए.

कई तरीके की पाबंदियां लगाता है अमेरिका : अमेरिका ईरान के अंदर या बाहर की एक्टिविटी और लोगों पर नजर रखता है. जिससे ईरान के US के प्रति दुश्मनी वाले रवैये को रोका जा सका, जन समर्थन को कम किया जा सके. दूसरे पक्ष को भी ईरानियों से जुड़ने से रोकने की कोशिश करता है. ईरानियों की यूएस के लोगों के साथ लेन-देन पर भी रोक रहती है. अमेरिका यूनाइटेड स्टेट्स में ईरानियों को प्रवेश से भी रोकता है. इसका उल्लंघन करने पर मुकदमा भी चलाता है.

क्या है इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर : इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत, रूस और ईरान की एक जरूरी पहल है. इस पर 12 सितंबर 2000 को एक इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट साइन किया गया था. इसका मकसद इसके रास्ते में आने वाले देशों के बीच ट्रेड और ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी को बढ़ाना है.

अभी INSTC के 13 मेंबर हैं. इनमें भारत, ईरान, रूस, अजरबैजान, आर्मेनिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्की, यूक्रेन, बेलारूस, ओमान और सीरिया शामिल हैं. बुल्गारिया एक ऑब्जर्वर स्टेट के तौर पर इसमें शामिल हुआ है. सेंट्रल एशिया और यूरेशियन रीजन के साथ भारत की कनेक्टिविटी बढ़ाने की क्षमता है. INSTC भारत, ईरान, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, सेंट्रल एशिया और यूरोप के बीच माल ढुलाई के लिए 7,200 km लंबा मल्टी-मोड ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट है.

चाबहार पोर्ट के एरिया के बारे में जानिए.
चाबहार पोर्ट के एरिया के बारे में जानिए. (Graphics credit; ETV Bharat)

क्या भारत-अमेरिका ट्रेड डील से खुलेंगे नए रास्ते? : अमेरिका ने भारत पर लगाए गए 25 फीसदी टैरिफ को घटाकर अब 18 प्रतिशत कर दिया है. इसे भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है. इस लिहाज से एक्सपर्ट यह संभावना भी जता रहे हैं कि ईरान के चाबहार पोर्ट के संचालन को लेकर अमेरिका की ओर से भारत पर लगाए प्रतिबंधों पर भी आगामी समय में ढील मिल सकती है. क्योंकि दोनों देशों के रिश्तों में सुधार आया है. इससे चाबहार के जरिए भारत अपने लिए तरक्की के नए रास्ते खोल सकता है.

क्या विश्व के अन्य देशों के लिए भी जरूरी है चाबहार? : उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को भी इस पोर्ट का लाभ मिलता है. उज्बेकिस्तान डबल लैंडलॉक्ड है. मतलब यह दूसरे देशों की जमीनों से घिरा हुआ है. इस पोर्ट के विकसित होने से इन देशों को लाभ मिलेगा. इसके अलावा ईरान और अफगानिस्तान को भी इस प्रोजेक्ट से फायदा होता है.

2024 में पोर्ट को लेकर भारत-ईरान के बीच क्या एग्रीमेंट हुआ? : साल 2024 में 13 मई को भारत ने ईरान के स्ट्रेटेजिक रूप से जरूरी चाबहार पोर्ट को डेवलप और ऑपरेट करने के लिए 10 साल का एक बड़ा वेंचर (उद्यम) शुरू किया. यूनियन शिपिंग मिनिस्टर सर्बानंद सोनोवाल इस डील के गवाह बने. उस दौरान इसे भारत के ट्रेड लिंक में बड़ा बदलाव लाने वाला कदम बताया गया था.

ये भी पढ़ें

Last Updated : February 3, 2026 at 3:42 PM IST