नेपाल त्रासदी की क्या रही वजह? केदारनाथ आपदा से क्यों हो रही तुलना, वैज्ञानिकों से जानिए हर पहलू
नेपाल में आई त्रासदी को वैज्ञानिक केदारनाथ आपदा से करीब तीन गुना बड़ा मान रहे हैं. इसके पीछे वैज्ञानिक कई कारण बता रहे हैं.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : August 27, 2026 at 4:26 PM IST
|Updated : August 27, 2026 at 7:59 PM IST
देहरादून: नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा ने भारी तबाही मचाई है. त्रासदी के बाद महाविनाश की सामने आई तस्वीरें भयावह हैं. इससे जुड़े वीडियोज रोंगटे खड़े करने वाले हैं. नेपाल आपदा के बाद जो तस्वीरें और वीडियोज सामने आये हैं उससे एक बार फिर से केदारनाथ आपदा की यादें ताजा हो गई हैं. वैज्ञानिक भी नेपाल आपदा की केदारनाथ आपदा से तुलना कर रहे हैं.
ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियरों की अस्थिरता नेपाल त्रासदी का कारण: नेपाल में 26 अगस्त को आए सैलाब ने स्थानीय वादियों और बस्तियों को तबाह कर दिया. इस त्रासदी को सदी का सबसे बड़ी और सबसे विनाशकारी आपदा मानी जा रही है. इस आपदा में पानी का वेग इतना तीव्र था कि उसने बड़े-बड़े पर्वत खंड, पुल, मकान और इन्फ्रास्ट्रक्चर आसानी से उखाड़कर फेंक दिया. वैज्ञानिक इस घटना के पीछे ग्लोबल वार्मिंग और हिमालयी ग्लेशियरों के अस्थिर होने को एक बड़ा कारण मान रहे हैं. उन उच्च हिमालय क्षेत्रों में बारिश होने लगी है जहां पहले स्नो फॉल हुआ करता था. करीब चार हज़ार मीटर तक बारिश होना और ग्लेशियरों का तेज़ी से पीछे हटना ग्लेशियर से जुड़ी खतरों को बढ़ा रहा है.
नेपाल त्रासदी में क्यों हुआ अधिक नुकसान: ईटीवी भारत से बातचीत करते हुए इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के सीनियर साइंटिस्ट डॉ मनीष मेहता ने कहा नेपाल में आई आपदा का इसरो ने भी अध्ययन किया है. जिसमें इसरो ने साफ किया है कि नेपाल में आइस एवलांच या डेबिरी फ्लो की वजह से वजह से फ्लैश फ्लड हुआ है. सैटेलाइट इमेज के अध्ययन से पता चला कि वह क्षेत्र काफी अधिक संवेदनशील भी है. साथ ही उस क्षेत्र में ग्लेशियर काफी अधिक रिट्रीट हुआ है. ग्लेशियर के पिघलने की दर भी काफी अधिक देखी जा रही है. यही नहीं इमेज से यह भी पता चला कि वो काफी अधिक डाउनस्ट्रीम रीजन है. उसकी वैली काफी अधिक नैरो है. संभावना जताई जा रही है कि उस क्षेत्र में कोई बड़ा भूस्खलन हुआ हो या फिर कोई एवलांच टूटा हो, जिसकी वजह से वहां पर डैम बना. जिसके टूटने की वजह से नीचे वाले क्षेत्र में त्रासदी आई है.
नेपाल त्रासदी की दो थ्योरी: नेपाल में जब भीषण आपदा आई उससे पहले उस क्षेत्र में काफी अधिक कंपन भी महसूस किया गया. जिसके चलते यह संभावना जताई जा रही है कि इस आपदा के पहले भूकंप भी आया होगा. जिसको सवाल पर मनीष मेहता ने कहा इस आपदा के असल वजहों को जानने के लिए जो एजेंसी काम कर रही है, वो सभी तथ्यों पर अध्ययन कर रही है. वर्तमान समय में दो थ्योरी निकलकर सामने आई हैं. पहली थ्योरी में कहा जा रहा है कि आइस एवलांच या फिर रॉक फॉल की वजह से ये आपदा आई है. दूसरी थ्योरी में अर्थक्वेक को जिम्मेदार माना जा रहा है. मनीष मेहता ने कहा अगले दो से तीन दिनों में अध्ययन होने के बाद ही त्रासदी की असल वजहों की स्थिति स्पष्ट हो पाएगी.
उत्तराखंड और नेपाल का हिमालय लगभग समान है. नॉर्थ वेस्ट से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक का हिमालय की परिस्थितियों एक समान है. ऐसे में आपदा आने के पहले और आपदा आने के बाद के सैटेलाइट इमेज पर अध्ययन कर रहे हैं. फिलहाल यह संभावना जताई जा रही है कि उसे क्षेत्र में पहले कम बारिश होती हो लेकिन अचानक अत्यधिक भारी बारिश की वजह से उस क्षेत्र का रॉक टूट कर पानी के साथ नीचे आ गया हो, जिसकी वजह से यह भीषण आपदा आई, लेकिन हिमालय क्षेत्र की बात करें तो लगभग सभी हिमालयी क्षेत्र एक जैसे ही हैं.
-डॉ मनीष मेहता, सीनियर साइंटिस्ट, इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी
नेपाल त्रासदी VS केदारनाथ आपदा: नेपाल में आई त्रासदी इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी मानी जा रही है. जिसके सवाल पर मनीष मेहता ने कहा 18वीं सेंचुरी में चमोली में भी आपदा आई थी. वह भी कुछ ऐसी ही आपदा थी. तब उत्तराखंड का श्रीनगर गढ़वाल उस दौरान पूरा डूब गया था.जिस तरह की तस्वीरें नेपाल से सामने आई हैं उससे ये कहा जा सकता है कि उत्तराखंड के केदारनाथ घाटी में साल 2013 में आई आपदा से करीब 2 से 3 गुना बड़ी घटना है. नेपाल के इस क्षेत्र का कैचमेंट एरिया काफी अधिक बड़ा है. ऐसे में यहां पर काफी अधिक ग्लेशियर भी हैं. इसी कारण इसे बड़ी त्रासदी माना जा रहा है.

कैसे आई थी केदारनाथ आपदा: उत्तराखंड 16 और 17 जून 2013 को तेज बारिश के बाद सभी नदी नाले उफान पर थे. केदारनाथ मंदिर की दोनों तरफ बहने वाली मंदाकिनी और सरस्वती नदी भी उफान पर थी. उस दौरान केदारनाथ आपदा अपने पीक पर थी. तेज बारिश के कारण 16 और 17 जून की रात केदारनाथ मंदिर के पीछे से आए पानी के सैलाब ने ऐसी तबाही मचाई कि कई जिंदगियां लापता हो गईं. इस सैलाब से मंदिर के आसपास मौजूद भवन भी क्षतिग्रस्त हो गए.

केदारनाथ आपदा का आंकड़ा: वैज्ञानिकों ने आपदा पर अध्ययन के बाद बताया गया कि, 14 जून से लगातार हो रही बारिश के कारण 16 और 17 जून की रात केदारनाथ धाम के ऊपर मौजूद चोराबाड़ी झील में एक ग्लेशियर टूट कर आ गया था. जिसकी वजह से चोराबाड़ी झील टूटी और झील का पानी केदारनाथ घाटी में सैलाब के रूप में आया. इस मामले में सरकारी आंकड़े तो नहीं है, लेकिन बताया जाता है कि उस दौरान केदारघाटी में करीब 10 हजार लोग थे. हालांकि, आपदा के 13 साल बीत जाने के बाद श्रद्धालुओं की मौत का सटीक आंकड़ा आज तक भी पता नहीं चल पाया है. हालांकि, अधिकारिक रूप से तकरीबन 4400 लोग मारे गए या लापता हुए.

उत्तराखंड में आ चुकी हैं कई आपदाएं: उत्तराखंड का हिमालय भी नेपाल के हिमालय से मिलता जुलता है. उत्तराखंड में भी बड़ी संख्या में ग्लेशियर और ग्लेशियर झील हैं. तो क्या,भविष्य में ऐसी स्थिति उत्तराखंड में भी बन सकती है? जिसके सवाल पर मनीष मेहता ने कहा यह आपदा एक प्राकृतिक आपदा है. इस तरह की आपदा का सामना उत्तराखंड पहले ही कई बार कर चुका है. केदारनाथ आपदा एक बड़ी आपदा थी. इसके बाद ऋषि गंगा आपदा और धराली आपदा भी आ चुकी है. इन आपदाओं के दौरान वैज्ञानिकों और सरकार की ओर से बेहतर काम किया. उन्होंने कहा ऐसी आपदाएं कहीं पर भी आ सकती हैं. इसके लिए लोगों को जागरूक करने की जरूरत है. प्राकृतिक आपदाओं को रोक नहीं जा सकता. उससे होने वाले जान-माल के नुकसान को काम जरूर किया जा सकता है.

ग्लेशियर झीलों पर भी सरकार की नजर: उत्तराखंड में मौजूद ग्लेशियर झीलों की स्थिति के सवाल पर वैज्ञानिक मनीष मेहता ने कहा उत्तराखंड राज्य में जितने भी ग्लेशियर झील हैं वहां पर पहुंचना काफी अधिक कठिन है. 13 अति संवेदनशील ग्लेशियर झील हैं, उनमें से चार से पांच ग्लेशियर झीलों का अध्ययन आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से कराया जा चुका है. ऐसे में जल्द ही आपदा प्रबंधन विभाग और ग्वालियर इंस्टीट्यूट की टीम जल्द ही केदारताल समेत अन्य झीलों का अध्ययन करने जा रही है. जहां पर इंस्ट्रूमेंट लगाए जाने की प्रक्रिया चल रही है.

नेपाल त्रासदी को लेकर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ विनीत कुमार गहलोत से भी बात की गई है. उन्होंने कहा-
नेपाल में जब भीषण आपदा आई उस दौरान भारतीय केंद्र के साथ ही अन्य सेंटर ने इस बात को कहा कि तिब्बत में करीब 4 मेग्नीट्यूड का भूकंप आया. इसके बाद तमाम चीजों को इससे जोड़कर देखा जाने लगा की क्या भूकंप आने के बाद एक बाद भूस्खलन हुआ? भारी बारिश हुई जिसकी वजह से ये त्रासदी आई? लेकिन फिर बाद में यह चीज सामने आई कि वहां कोई भूकंप नहीं आया, हालांकि, इंस्ट्रूमेंट में यह जरूर रिकॉर्ड किया गया कि भूकंप जैसी हलचल हुई है, लेकिन यह कहना कि वह भूकंप है या फिर किसी बड़े लैंडस्लाइड की वजह से हलचल हुआ हो इसके लिए एक बेहतर अध्ययन की जरूरत होती है. जब उन तरंगों का अध्ययन किया गया तब पता चला की हलचल रिकॉर्ड हुई है लेकिन भूकंप नहीं आया था.
-डॉ विनीत कुमार गहलोत, निदेशक, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी
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