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'झारखंड नहीं हमें बिहार चाहिए..'दहशत की वो कहानी, जब नक्सलियों के खौफ से खाली हुआ पूरा गांव

झारखंड बॉर्डर पर बसा बेंगवातरी गांव नक्सलवाद के नासूर से उजड़ गया. लेकिन, हालात सुधरने पर ग्रामीण लौटे तो उन्होंने अनोखी मांग रख दी. पढ़ें-

Jharkhand Bengrawati village
नक्सली दहशत से उजड़े गांव की दर्दनाक कहानी (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : February 23, 2026 at 7:25 PM IST

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गया : बिहार-झारखंड की सीमा पर बेंगवातरी गांव है. कहने को तो यह झारखंड का गांव है लेकिन इस गांव के लोगों का वास्ता पूरी तरह से बिहार से है. रिश्तेदारी-नातेदारी से लेकर रोटी का जुगाड़ झारखंड के इस अंतिम गांव के लोगों के लिए बिहार में ही हो पाता है. 25 साल पहले नक्सलियों की गतिविधियों के कारण 150 से 200 घरों की आबादी वाला बेंगवातरी गांव पूरी तरह से खाली हो गया था. 15 साल तक यहां कोई चिराग जलाने वाला भी नहीं बचा, लोगों का पलायन हो गया.

नक्सलियों के चलते उजड़ गया गांव : 25 साल पहले बेंगवातरी गांव खुशहाल हुआ करता था. इस गांव में 150 से 200 घरों की बस्ती हुआ करती थी. इस बीच 90 के दशक में नक्सलियों की गतिविधियां चरम पर पहुंचने लगी थी. नक्सलियों की गतिविधियों की आंच खुशहाल बेंगवातरी गांव पर भी पड़ चुकी थी. यह झारखंड का अंतिम गांव था, जो बिहार से सटा था. लेकिन नक्सलियों और पुलिस पार्टी की धमक से बेहाल हो चुका था.

देखें रिपोर्ट- (ETV Bharat)

सैकड़ों की संख्या में पहुंचते थे माओवादी : बेंगवातरी गांव की 55 वर्षीय रेशमी देवी बताती हैं, कि हमारा गांव काफी खुशहाल था. यहां 150 से 200 घर होते थे. तुरी और भोक्ता जाति के घर होते थे. आबादी 1000 के करीब थी. जैसे-जैसे नक्सलवाद बढ़ा उसके बीच प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी का दस्ता बिहार और झारखंड के बॉर्डर पर रहे बेंगवातरी गांव पहुंचने लगा. बेंगवातरी गांव पहुंचकर नक्सली दस्ते के लोग भोजन इकट्ठा करने को कहते थे. सभी घरों से भोजन बनाने का फरमान नक्सलियों का होता था.

दो तरफा मार झेलते थे बेंगवातरी के ग्रामीण : बेंगवातरी की रेशमी देवी बताती है कि पार्टी वाले (नक्सली) हथियार लेकर चलते थे, उनका हथियारबंद दस्ता सैकड़ों की संख्या में होता था. नक्सलियों का दस्ता गांव में पहुंचता, तो खाना खिलाने का फरमान होता था. नक्सलियों का खौफ इस कदर था कि कोई कुछ नहीं बोल पाता था. न खिलाएं तो नक्सलियों का कोप भाजन होना पड़ता था और खिला दें तो पुलिस की लाठियां हमपर बरसती थी. हम लोग बेबस थे.

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'नक्सलियों को भोजन कराना मजबूरी थी' : गांव के नरेश गंझू बताते हैं कि नक्सलियों को भोजन कराना हमारी मजबूरी थी. यदि नक्सलियों को भोजन नहीं कराया, तो वह कोई भी घटना कर सकते थे. ऐसे में उन्हें पूरे गांव के लोग मिलकर भोजन कराते थे. नक्सली जैसे ही भोजन करके जाते थे, वैसे ही पुलिस और सुरक्षा बल पहुंच जाते थे. सुरक्षा बल हमपर शक करते थे कि हम लोग नक्सलियों का साथ देते हैं. इसलिए हमारे पिता ने ये फैसला लिया था कि गांव छोड़कर कहीं और चले जाएं.

''जो हमारे पिता थे उन सभी ने मिलकर निर्णय लिया कि गांव छोड़ देंगे. क्योंकि एक ओर नक्सली तंग करते हैं, तो दूसरी ओर पुलिस पिटाई करती है. इसके बाद लगभग वर्ष 2000 के आसपास में एक-एक कर सभी घरों से लोग पलायन करने लगे. चंद समय में ही पूरा गांव खाली हो गया.''- नरेश गंझू, स्थानीय निवासी, बेंगवातरी

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वीरान पड़े घरों में लौटने लगे लोग (ETV Bharat)

2000 से 2015 तक गांव में था सन्नाटा : नक्सलियों की गतिविधियों के कारण वर्ष 2015 के आसपास तक बेंगवातरी गांव में कोई नहीं रहता था. अब जब 2015 के बाद से नक्सलियों का खौफ कुछ कम होने लगा और उनकी गतिविधियां थमने लगीं तो कुछ लोग धीरे-धीरे वापसी करने लगे हैं. लेकिन गांव पूरी तरह से उजड़ चुका था. अब गांव में कोई सुविधा नहीं बची, यहां तक पीने के पानी का भी कोई इंतजाम नहीं है.

नक्सलियों की धमक कम हुई तो लौटने लगे गांव : नक्सलियों और पुलिस के बीच बेंगवातरी गांव के लोग पीसते रहे और करीब 15 वर्षों तक यह गांव खाली रहा. यहां दीपक जलाने वाला भी कोई नहीं रह गया था. अभी बेंगवातरी गांव में अब कुछ परिवारों के लोग हालिया सालों से रहने लगे हैं. इन परिवारों का कहना है नक्सलियों का खौफ कम होने पर जो भी इस गांव को छोड़कर गए अब कई परिवार लौट आए हैं. कुछ लौटने की सोच रहे हैं. यह गांव अब धीरे-धीरे आबाद होने लगा है.

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नक्सली दहशत से पलायन, अब लौटे घर (ETV Bharat)

बिहार के गांवों से चलती है रोजी-रोटी : झारखंड के अंतिम गांव बेंगवातरी के लोग बिहार का आभार जताते हैं. गांव के मन्नू गंझू, संगीता देवी और तारा देवी कहती हैं, कि यह गांव आज का नहीं है. यह कई पीढ़ियों से चला आ रहा है. बेंगवातरी गांव से कई किलोमीटर दूर धनगाई से सटे इलाकों में लोग अपने पहचान के रिश्तेदार के यहां जाकर रहने लगे थे. आज भी लोग बिहार के गया जिले के धनगाई थाना अंतर्गत महुआरी, हाहेसाड़ी, पतलूका आदि गांव में रह रहे हैं. अब सभी अपने पुश्तैनी गांव बेंगवातरी में वापसी के मूड में हैं.

''झारखंड सरकार इस गांव को शायद अपना गांव नहीं मानती है. गांव के बारे में सिर्फ चुनाव के समय ही सोचा जाता है, वह भी सिर्फ वोटर कार्ड बनाने के लिए. चंद रुपए देकर वोट देने के लिए बुलाया जाता है. इसके बाद हमारी तो कोई सुध भी नहीं लेता. हमें किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता आज तक नहीं मिल पाई है.''- मन्नू गंझू, स्थानीय निवासी

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बिहार से रोटी-बेटी का नाता : मन्नू गंझू बताते हैं कि बिहार से रोटी-बेटी का नाता है. वे मानते हैं कि हमारा गांव झारखंड में पड़ता है, लेकिन हमारे लिए बिहार ही सब कुछ है. बिहार के गया से ही हमें सब कुछ मिलता है. हमारे रिश्तेदार, नातेदार, रोटी का जुगाड़ सब कुछ गया से ही होता है. हमारे गांव बेंगवातरी से गया के गांव की शुरुआत महज आधे किलोमीटर से शुरू हो जाती है.

''हमारे गांव से बिहार के गया के गांव का बाजार मात्र एक-दो किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है. बिहार की सीमा चंद मीटर की दूरी से ही शुरू हो जाती है. जबकि हमारे गांव से झारखंड का बाजार दन्तार 20 किलोमीटर की दूरी पर है.हमें यदि झारखंड जाना है, तो इसके लिए बिहार के गया होकर ही जाना पड़ेगा.''- मन्नू गंझू, स्थानीय निवासी

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2015 से धीरे-दीरे लौटने लगे ग्रामीण (ETV Bharat)

'झारखंड नहीं, हमें बिहार चाहिए' : गांव की संगीता देवी बताती है कि हम लोग तुरी और भोक्ता जाति के लोग इस गांव में शुरू से ही निवास करते रहे हैं. झारखंड सरकार इन जातियों के लिए कई योजनाएं शुरू की है. किंतु झारखंड सरकार का कोई नेता या अफसर इस गांव में आज तक नहीं आया है और न ही सरकार की कोई योजना यहां पहुंची. यहां सिर्फ नक्सली और पुलिस की टीम ही पहुंचती रही है.

''झारखंड सरकार ने आज तक बेंगवातरी गांव की सुध नहीं ली है. अब जब उजड़ा हुआ गांव आबाद होने लगा है, तो हम मांग करते हैं, कि हमारे गांव की गिनती बिहार के गांव में ही हो. क्योंकि आज हमारा जो भी संपर्क है, वह बिहार के गांव से ही है. बिहार में हमारे परिवार के लोग रहते हैं. वहीं से रोटी का जुगाड़ होता है. हमें बिहार से जोड़कर यहां की सरकार हमें सुविधा दें.''- संगीता देवी, स्थानीय निवासी

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बेंगवातरी गांव में लोगों की बढ़ने लगी हलचल (ETV Bharat)

गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव : बेंगवातरी गांव की तारा देवी कहती हैं कि गांव में जरूरी सुविधाएं नहीं है. यहां न स्कूल है, न सड़क है, न बिजली और न ही चिकित्सा की व्यवस्था. रोजगार के साधन भी इस गांव में नहीं हैं. किसी प्रकार हम लोग सूखी लकड़ी इकट्ठा कर उसे बाजार में बेचते हैं. वहीं पुश्तैनी काम दउरी, सूप और झाड़ू बनाने का काम करते हैं.

''लकड़ी बेचकर और बांस से बनाई गई दउरी, सूप झाड़ू को गया के मार्केट में बेचकर रोटी का जुगाड़ मुश्किल से कर पाते हैं. हम लोग अब बिहार वासी बनना चाहते हैं, क्योंकि आजादी के बाद से आज तक हमें उपेक्षित रखा है.''- तारा देवी, स्थानीय निवासी, बेंगवातरी गांव

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बेंगवातरी गांव की विकट भौगोलिक स्थिति : यह गांव पहाड़ों से घिरा है. बेंगवातरी गांव झारखंड में पड़ता है और बिहार के सीमा पर उसका अंतिम गांव है. यह बिहार के गया जिले के एकदम सीमावर्ती गांव है. बिहार के गया के गांव से महज चंद मीटर की दूरी पर ही बेंगवातरी गांव पड़ता है. यहां से बिहार का धनगाई थाना दो-ढाई किलोमीटर की दूरी पर है. वही बेंगवातरी से झारखंड का बाजार 20 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है. लेकिन झारखंड जाने के लिए गया होकर जाना पड़ता है.

''गया जिला मुख्यालय से बेंगवातरी गांव करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर है. जो स्थिति बनी है, उससे हमलोगों की हालत न घर की और न घाट की. हम लोग उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. हम लोग किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता के आज भी मोहताज हैं. हम लोग चाहते हैं कि हमें बिहारी बना दिया जाए.''- मन्नू गंझू, स्थानीय निवासी

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हाथों से बांसों का सामान बनाती महिला (ETV Bharat)

कौन करेगा इनके दर्द का अंत? : ये दर्द है बेंगवातरी गांव का जो अपने पैतृक निवास पर लौटने के बावजूद ये आज भी अपने रहने के लिए महफूज ठिकाना ढूंढ रहे हैं. अब जब नक्सली धमक खत्म होने को है तो इन गांव वालों को उनका हक और उनके मन मुताबिक सम्मान उन्हें मिलना चाहिए. फिर चाहे झारखंड में रहें या फिर बिहार में. इलके हालात जरूर बदले ऐसा प्रयास शासन-प्रशासन के साथ केंद्र सरकार को भी करना चाहिए.

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