हर साल बढ़ रहा हिमालय का आकार: पिघलते ग्लेशियर से तबाही की आशंका, हिमाचल की इस झील में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम
वर्ष 2023 और 2025 में आई आपदाओं के बाद अब सरकारें ज्यादा सतर्क हो गई हैं.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : April 16, 2026 at 1:40 PM IST
कुल्लू: हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से पिघलते ग्लेशियर और उनसे बन रही झीलों के बढ़ते खतरे को लेकर अब केंद्र और राज्य सरकारें सक्रिय हो गई हैं. इसी कड़ी में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की टीम ने बुधवार को हिमाचल प्रदेश के जिला लाहौल स्पीति की घेपन झील का दौरा किया और इसके बढ़ते आकार व संभावित खतरे पर गहन चर्चा की. इस बीच हिमाचल में पहली बार किसी ग्लेशियर झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी शुरू कर दी गई है.
घेपन झील पर लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम
एनडीएमए के सदस्य दिनेश कुमार असवाल ने गुरुवार को मनाली में इसकी जानकारी साझा की. उन्होंने बताया कि घेपन झील में सैटेलाइट आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाएगा. यह हिमाचल प्रदेश का पहला ऐसा प्रोजेक्ट होगा, जिससे झील में किसी भी प्रकार की हलचल या खतरे की स्थिति में तुरंत अलर्ट मिल सकेगा. इस परियोजना पर सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग, केंद्रीय जल आयोग और जिला प्रशासन मिलकर काम करेंगे.
हर साल बढ़ रहा हिमालय का आकार
एनडीएमए के अनुसार, हिमालय अभी भी विकसित हो रहा है और इसका आकार हर साल 1 से 17 मिलीमीटर तक बढ़ रहा है. यह बदलाव भूकंपीय गतिविधियों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम है. एनडीएमए ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है. यही कारण है कि ऐसे क्षेत्रों में खतरा भी बढ़ता जा रहा है.
घेपन झील से क्यों है खतरा?
घेपन झील समुद्र तल से करीब 13,615 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और इसकी गहराई 100 मीटर से अधिक आंकी गई है. यह पूरी तरह ग्लेशियर से बनी झील है, जिसका आकार लगातार बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह झील अचानक टूटती है, तो इसका पानी चंद्रा नदी में जाएगा, जिससे लाहौल घाटी के कई गांवों के साथ मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग और अटल टनल मार्ग को भारी नुकसान हो सकता है.
2023 और 2025 की आपदाओं से सबक
एनडीएमए टीम ने बताया कि वर्ष 2023 और 2025 में आई आपदाओं के बाद अब सरकारें ज्यादा सतर्क हो गई हैं. एसडीआरएफ और प्रशासन ने उन आपदाओं में बेहतर काम किया, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए पहले से तैयारी जरूरी है. इसी के तहत अब जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर वहां सुरक्षा उपायों को मजबूत किया जा रहा है.
लोगों की भागीदारी भी जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि आपदा प्रबंधन में केवल सरकार ही नहीं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी भी बेहद जरूरी है. भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में पौधारोपण और जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि जोखिम को कम किया जा सके. सरकार का प्रयास है कि हर संभावित खतरे वाले क्षेत्र में पहले से योजना तैयार रखी जाए.
बता दें कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा चिन्हित खतरनाक ग्लेशियर झीलों में घेपन झील भी शामिल है. ऐसे में यहां लगाया जाने वाला अर्ली वार्निंग सिस्टम मौसम विभाग और प्रशासन को समय रहते अलर्ट देगा. इससे संभावित आपदा के दौरान समय रहते राहत और बचाव कार्य शुरू किए जा सकेंगे और जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा.
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