बिहार की शाही लीची 25 दिनों तक नहीं होगी खराब, मुजफ्फरपुर के किसान ने बढ़ाई उम्र
मुजफ्फरपुर के किसान कृष्ण गोपाल ने हर्बल तकनीक से शाही लीची की सेल्फ लाइफ बढ़ा दी. पढ़ें विवेक कुमार की रिपोर्ट-

Published : May 17, 2026 at 6:49 PM IST
मुजफ्फरपुर : बिहार के मुजफ्फरपुर की पहचान विश्व प्रसिद्ध शाही लीची से है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या हमेशा से कम शेल्फ लाइफ रही है. पेड़ से टूटने के बाद लीची महज 3 से 4 दिनों में खराब होने लगती है, जिससे किसानों और व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. लेकिन इसका भी समाधान खोज निकाला गया है.
नई खोज से लीची कारोबार को नया बूस्टर : मुजफ्फरपुर के एक किसान परिवार से निकले कृष्ण गोपाल ने इस समस्या का समाधान खोजने का दावा किया है. उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे शाही लीची करीब 25 दिनों तक ताजा रह सकती है. इस नई खोज के चलते लीची कारोबार को एक बड़ा बूस्टर मिलने वाला है.
'Veda Fresh' नाम से विकसित हुई नई तकनीक : कृष्ण गोपाल ने कई वर्षों की मेहनत और रिसर्च के बाद इस तकनीक को तैयार किया है. इसका नाम 'Veda Fresh' रखा गया है. यह पूरी तरह जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक तत्वों पर आधारित तकनीक है. इस तकनीक को विकसित करने में गाजियाबाद स्थित Vishvaksenah Herbs and Aromatic Pvt. Ltd. का भी सहयोग मिला है. इस नवाचार के लिए भारत सरकार के पास पेटेंट आवेदन भी दाखिल किया गया है.
जड़ी-बूटी रिसर्च से लीची तक पहुंची खोज : कृष्ण गोपाल ने बताया कि शुरुआत में उनकी टीम लीची पर काम नहीं कर रही थी. वे जड़ी-बूटियों और औषधीय पौधों पर रिसर्च कर रहे थे. इसी दौरान वे राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (NRCL) पहुंचे, जहां वैज्ञानिकों ने उन्हें लीची पर काम करने की सलाह दी. चूंकि उनके अपने खेत में लीची थी और वे इसकी समस्या को करीब से देख रहे थे, इसलिए उन्होंने इस दिशा में काम शुरू किया.

''हम लोग पहले जड़ी-बूटी पर काम कर रहे थे. NRCL में वैज्ञानिकों से मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि आप अलग तरीके से रिसर्च कर रहे हैं, लीची पर काम करके देखिए. हमारे खेत में लीची थी और हम उसकी समस्या भी लगातार देख रहे थे. इसके बाद मैंने करीब छह साल लीची के पूरे इको सिस्टम को समझने में लगाए.''- कृष्ण गोपाल, युवा खोजकर्ता
छह साल तक समझा लीची का पूरा इको सिस्टम : उन्होंने बताया कि किसी भी समस्या का हल निकालने के लिए उसकी जड़ तक जाना जरूरी होता है. इसी सोच के साथ उन्होंने करीब छह साल तक लीची के पूरे इको सिस्टम को समझने में लगाए. उन्होंने पाया कि लीची का छिलका बेहद संवेदनशील होता है और यही इसकी सबसे बड़ी चुनौती है.
'लीची का छिलका खादी कपड़े जैसा' : कृष्ण गोपाल के अनुसार लीची का नेचर बिल्कुल अलग है. उन्होंने कहा कि साधारण भाषा में समझें तो लीची का छिलका खादी के कपड़े जैसा होता है. इसे संभालना काफी मुश्किल होता है. यही कारण है कि इसे फलों की रानी कहा जाता है. फल टूटने के बाद सबसे बड़ी समस्या फंगल इन्फेक्शन की होती है, जो तेजी से फल को खराब कर देता है.
फंगल इन्फेक्शन रोकने के लिए हर्बल समाधान : इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने प्राकृतिक औषधीय तत्वों पर रिसर्च शुरू की. कई पौधों और जड़ी-बूटियों में मौजूद फाइटो-केमिकल्स का अध्ययन किया गया. ऐसी औषधियों को चुना गया जो फंगस को नियंत्रित करने की क्षमता रखती थीं. इनसे फाइटो-केमिकल्स को अलग कर लीची पर इस्तेमाल किया गया. परिणाम सकारात्मक मिले और फंगस कंट्रोल होने लगा.

''हमने कुछ ऐसी औषधियों को चुना जो फंगस को नियंत्रित करने की क्षमता रखती हैं. उन औषधियों से फाइटो-केमिकल्स को आइसोलेट किया गया और फिर उसका इस्तेमाल लीची पर किया गया. रिजल्ट काफी सकारात्मक मिला. लीची में फंगस कंट्रोल होने लगा और उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ने लगी.''- कृष्ण गोपाल, युवा खोजकर्ता
वैज्ञानिकों के सहयोग से तकनीक बनी मजबूत : शुरुआती प्रयोग सफल होने के बाद कई वैज्ञानिकों ने भी उनका सहयोग किया. इसके बाद संस्थान के साथ एक औपचारिक एग्रीमेंट हुआ और मिलकर इस तकनीक को और बेहतर बनाया गया. अब यह तकनीक सिर्फ लीची तक सीमित नहीं है, बल्कि आम समेत अन्य फलों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने पर भी काम जारी है.

ऐसे होती है पूरी प्रोसेसिंग : कृष्ण गोपाल ने बताया कि लीची को तोड़ने के बाद सबसे पहले उसे अच्छी तरह वॉश किया जाता है. इसके बाद उनके द्वारा तैयार विशेष सॉल्यूशन को पानी में मिलाकर लीची को प्रोसेस किया जाता है. एक लीटर सॉल्यूशन को करीब एक टन पानी में मिलाया जाता है और लगभग तीन टन लीची को उस पानी से प्रोसेस किया जाता है.
प्री-कूलिंग और पैकेजिंग से बढ़ती है ताजगी : प्रोसेसिंग के बाद लीची को सुखाया जाता है और विशेष पैकेजिंग में रखा जाता है. फिर 15 से 18 डिग्री सेल्सियस तापमान पर प्री-कूलिंग की जाती है. इससे फल लंबे समय तक ताजा बना रहता है और बाजार तक सुरक्षित पहुंचता है.

''एक लीटर हमारे द्वारा तैयार सॉल्यूशन को करीब एक टन पानी में मिलाया जाता है. फिर लगभग तीन टन लीची को उस पानी से प्रोसेस किया जाता है. इसके बाद लीची को सुखाया जाता है और विशेष पैकेजिंग में रखा जाता है. इसके बाद लीची को नियंत्रित तापमान में रखा जाता है. 15 से 18 डिग्री सेल्सियस तापमान पर प्री-कूलिंग की जाती है, जिससे फल लंबे समय तक ताजा बना रहता है.''- कृष्ण गोपाल, युवा खोजकर्ता
किसानों को 25 रुपये प्रति किलो अतिरिक्त खर्च : इस पूरी प्रक्रिया के लिए पैक हाउस की जरूरत होती है. अगर किसान संगठित तरीके से इस तकनीक को अपनाते हैं तो लीची को देश के दूसरे राज्यों और विदेशों तक आसानी से भेजा जा सकता है. इस तकनीक को अपनाने में करीब 25 रुपये प्रति किलोग्राम का अतिरिक्त खर्च आता है, जिसमें वॉशिंग, सॉल्यूशन, प्री-कूलिंग और पैकेजिंग शामिल हैं.

कम लागत में ज्यादा मुनाफे की उम्मीद : कृष्ण गोपाल का कहना है कि यह अतिरिक्त लागत किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित होगी. अब तक लीची जल्दी खराब हो जाने के कारण किसानों को कम दाम पर बेचनी पड़ती थी. लेकिन अगर शेल्फ लाइफ 25 दिनों तक बढ़ जाती है तो किसान बेहतर बाजार तक पहुंच पाएंगे और उन्हें ज्यादा कीमत मिलेगी.
लीची कारोबार को नई उड़ान : इस साल पेटेंट आवेदन दाखिल होने के बाद उम्मीद बढ़ गई है कि अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो मुजफ्फरपुर की शाही लीची का कारोबार नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है. इससे न केवल किसानों की आमदनी बढ़ेगी, बल्कि बिहार की पहचान बनी शाही लीची को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी मजबूत जगह मिल सकती है.
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