खेल-खेल में बच्चों के सपनों को पंख दे रहीं मुनमुन भट्टाचार्य, एक स्मार्टफोन से शुरू हुई शिक्षण यात्रा जो राष्ट्रपति भवन तक पहुंची
मुनमुन भट्टाचार्य जिन्होंने एक स्मार्टफोन से स्मार्ट क्लास तक का सफर तय किया अब राष्ट्रपति के हाथों होंगी सम्मानित. नरेंद्र निषाद की रिपोर्ट.

Published : August 24, 2026 at 5:59 AM IST
|Updated : August 24, 2026 at 5:49 PM IST
धनबाद: बरमसिया राजकीयकृत मध्य विद्यालय की प्राचार्य शिक्षिका मुनमुन भट्टाचार्य ने साबित कर दिया कि शिक्षक सिर्फ किताबों से नहीं पढ़ाता. वह बच्चों के भीतर सीखने की जिज्ञासा जगाता है और कक्षा को बोझ नहीं, आनंद का स्थान बना देता है. तकनीक, स्थानीय संसाधनों और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए उन्होंने बच्चों के सीखने के तरीके को नई दिशा दी. उनकी नवाचारी और बाल-केंद्रित पद्धतियों को अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है. शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति के हाथों उन्हें शिक्षक सम्मान से सम्मानित किया जाएगा.
कोरोना काल में स्मार्टफोन ने खोले पढ़ाई के नए दरवाजे
जब कोरोना महामारी ने स्कूलों के दरवाजे बंद कर दिए, तब सबसे बड़ी चुनौती थी छोटे बच्चों की पढ़ाई जारी रखना. खासकर कक्षा एक और दो के बच्चों के लिए ऑनलाइन पढ़ाई अपने आप में मुश्किल थी. मुनमुन भट्टाचार्य ने महंगे उपकरणों की बजाय एक साधारण स्मार्टफोन और मुफ्त डिजिटल संसाधनों का सहारा लिया. उन्होंने बच्चों तक कहानियां, गीत, खेल, पहेलियां, क्विज और गतिविधियां पहुंचाईं. लंबे नीरस लेक्चर की जगह पढ़ाई को रोचक बनाया और स्थानीय परिवेश को डिजिटल कंटेंट में शामिल किया, ताकि बच्चे किताब की बातों को अपने आसपास की दुनिया से जोड़ सकें.
बुनियादी साक्षरता को मजबूत करने वाले डिजिटल पाठ
बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान यानी फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमरेसी को मजबूत करने के लिए उन्होंने डिजिटल पाठ, एनिमेटेड प्रस्तुतियां, वॉयस रिकॉर्डिंग, वर्कशीट और शैक्षणिक वीडियो तैयार किए. कक्षा एक और दो के बच्चों के लिए भाषा, गणित, पर्यावरण अध्ययन, नैतिक मूल्य, अच्छी आदतें और जीवन कौशल से जुड़े छोटे-छोटे एनिमेटेड वीडियो बनाए गए. बच्चे अपनी सुविधा से घर पर इन्हें दोबारा देख और समझ सकते थे. इन संसाधनों ने अभिभावकों को भी बच्चों की पढ़ाई में भागीदार बनाया. महामारी के दौरान तनाव और अकेलेपन से जूझ रहे बच्चों के लिए मोटिवेशन और तनाव कम करने वाले वीडियो भी साझा किए गए. तकनीक सिर्फ पाठ पढ़ाने का माध्यम नहीं बनी, बल्कि बच्चों के भावनात्मक और समग्र विकास का साधन बन गई.

साथी शिक्षकों और अभिभावकों को डिजिटल धारा से जोड़ा
मुनमुन भट्टाचार्य की यात्रा कोरोना काल तक सीमित नहीं रही. धीरे-धीरे सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी उनकी रोजमर्रा की कक्षा का हिस्सा बन गई. डिजिटल कहानी सुनाना, एनिमेशन, शैक्षणिक वीडियो, प्रेजेंटेशन और इंटरैक्टिव क्विज के जरिए कठिन अवधारणाएं आसानी से समझाई गईं. बच्चों को तकनीक का सुरक्षित और जिम्मेदार इस्तेमाल भी सिखाया गया. उनका मानना रहा कि तकनीक लक्ष्य नहीं, माध्यम है जो सीखने को सरल, आनंददायक, समावेशी और हर बच्चे तक पहुंच योग्य बनाता है.
शिक्षकों के लिए ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए
महामारी के दौरान उन्होंने साथी शिक्षकों के लिए स्वैच्छिक ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए. ऑनलाइन कक्षाएं चलाने, डिजिटल शिक्षण सामग्री बनाने, प्रेजेंटेशन तैयार करने और इंटरैक्टिव संसाधन विकसित करने के तरीके सिखाए. डिजिटल संसाधन साझा करने की संस्कृति विकसित की और शिक्षकों का आत्मविश्वास बनाए रखने के लिए ऑनलाइन गतिविधियां भी कराईं. सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी को व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, साझा सीखने और सहयोग की व्यवस्था बना दिया.

अभिभावकों की डिजिटल साक्षरता पर भी काम किया
अभिभावकों की भूमिका को समझते हुए उनकी डिजिटल साक्षरता पर भी काम किया गया. माता-पिता को क्यूआर कोड स्कैन करके शैक्षणिक वीडियो और डिजिटल सामग्री तक पहुंचने का तरीका बताया गया. उन्हें क्यूआर कोड के जरिए कैशलेस डिजिटल भुगतान की भी जानकारी दी गई. कक्षा एक और दो के पिक्चर डिस्प्ले बोर्ड पर क्यूआर कोड लगाए गए, जिनसे अतिरिक्त शिक्षण सामग्री मिलती थी. पीएम पोषण और पोषण वाटिका से जुड़े क्यूआर कोड आधारित संसाधन तैयार किए गए, जिनमें सब्जियों के पोषण मूल्य, स्वस्थ खान-पान और बेहतर कृषि पद्धतियों की जानकारी थी. माता समिति की सदस्यों को भी इनके इस्तेमाल का मार्गदर्शन दिया गया. तकनीक का लाभ कक्षा से निकलकर परिवार और समुदाय तक पहुंचा.
स्मार्ट पैनल तक पहुंचा सफर, घर और स्कूल की दूरी घटी
जिला प्रशासन के साथ समन्वय से स्कूल के लिए स्मार्ट पैनल उपलब्ध कराया गया, जिसने शिक्षण अनुभव को और समृद्ध किया. डिजिटल साक्षरता के प्रयासों से माताएं व्हाट्सएप आधारित ई-कंटेंट तक पहुंचने लगीं, जिससे घर पर भी पढ़ाई जारी रखना आसान हुआ. तकनीक ने कक्षा को स्मार्ट बनाया और घर-स्कूल की दूरी भी कम कर दी.

डरमुक्त और आनंदमय कक्षा का निर्माण
मुनमुन भट्टाचार्य की पहचान सिर्फ सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी आधारित शिक्षिका के रूप में नहीं है. वे बच्चों के लिए डरमुक्त, आनंदमय और बाल-केंद्रित वातावरण बनाने वाली शिक्षिका के रूप में भी जानी जाती हैं. 2019 में स्कूल से जुड़ने के बाद से उन्होंने ऐसी पद्धतियां अपनाईं, जिनमें बच्चा सिर्फ सुनने वाला नहीं, सक्रिय भागीदार बने. 2023 में स्कूल लीडर की जिम्मेदारी मिलने के बाद भी वे फाउंडेशनल स्टेज के बच्चों से जुड़ी रहीं. उनका मानना है कि शुरुआती वर्ष बच्चे के पूरे जीवन की सीखने की नींव तैयार करते हैं.
उनकी कक्षाओं में कहानियां, गीत, बातचीत, खेल, गतिविधियां और हाथों से काम करने का अनुभव है. बच्चों को सवाल पूछने की आजादी है. रटने की बजाय आसपास की चीजों से जोड़कर सिखाया जाता है. स्थानीय और कम लागत वाली सामग्री से शिक्षण अधिगम सामग्री तैयार की जाती है. पुराने मोजों से हैंड पपेट्स और एग ट्रे जैसी साधारण चीजों को कहानी सुनाने, भाषा विकास, मूल्य शिक्षा और बातचीत का माध्यम बनाया गया. इनसे बच्चों में सुनने-बोलने का आत्मविश्वास बढ़ा.

शब्द भंडार से लेकर अंग्रेजी बोलने तक का सफर
भाषा क्षमता मजबूत करने के लिए “माई लिटिल वर्ड बैंक” नाम की छोटी पुस्तिकाएं शुरू की गईं. कक्षा एक और दो के लिए इन मिनी बुक्स को बनाने और इस्तेमाल करने में बड़े बच्चों ने छोटे बच्चों की मदद की. छोटे बच्चों का शब्द भंडार बढ़ा, पढ़ने की तैयारी मजबूत हुई और बड़े बच्चों में सहयोग व नेतृत्व की भावना विकसित हुई.
अंग्रेजी सीखने को आसान बनाने के लिए एक्शन सॉन्ग्स, राइम्स, रोल प्ले, कहानी सुनाना, पिक्चर रीडिंग और बातचीत जैसी गतिविधियां कराई गईं. धीरे-धीरे बच्चे मॉर्निंग असेंबली में छोटे-छोटे अंग्रेजी स्पीच देने लगे. इससे भाषा कौशल के साथ आत्मविश्वास भी मजबूत हुआ.

फाउंडेशनल लिटरेसी रूम और रीडिंग बडी प्रोग्राम
स्कूल में एक फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमरेसी रूम विकसित किया गया, जहां शिक्षण अधिगम सामग्री, कहानी की किताबें, पिक्चर बुक्स, चार्ट, फ्लैशकार्ड और अन्य संसाधन उपलब्ध हैं. बच्चे खाली समय में अपनी रुचि से सीख सकते हैं. रीडिंग बडी प्रोग्राम शुरू किया गया, जिसमें बड़े बच्चे छोटे बच्चों को पढ़ने में मदद करते हैं. इससे पढ़ने की आदत के साथ सहयोग, संवेदनशीलता और नेतृत्व की भावना भी विकसित हुई.

कला, खेल और समावेशी सीखने का माहौल
कला को भाषा, गणित और पर्यावरण अध्ययन से जोड़ा गया. बच्चे चित्र बनाते, रंग भरते, मॉडल और चार्ट तैयार करते हुए पाठ्यक्रम समझते हैं. गेम्स, संगीत, मूवमेंट और खेल को दैनिक गतिविधियों में शामिल किया जाता है, जिससे शारीरिक विकास, एकाग्रता, टीमवर्क और भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान रहता है.

हर बच्चा अलग तरीके से सीखता है. अलग-अलग जरूरतों वाले बच्चों के लिए सरल और लचीली रणनीतियां अपनाई जाती हैं. क्षमता के अनुसार गतिविधियां बदली जाती हैं और व्यक्तिगत सहयोग व प्रोत्साहन दिया जाता है. मूल विचार यही है कि हर बच्चा सीख सकता है, अगर सही अवसर और सुरक्षित माहौल मिले.
सहयोगी सीखने को बढ़ावा देने के लिए ग्रुप एक्टिविटीज, क्लासरूम प्रोजेक्ट्स, साझा आर्टवर्क और पीयर सपोर्ट का इस्तेमाल होता है. बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान मजबूत करने के लिए भाषा खेल, संख्या खेल, पजल, पिक्चर रीडिंग और स्थानीय संसाधनों का सहारा लिया जाता है. निरंतर कक्षा आधारित आकलन से बच्चों की जरूरतें समझी जाती हैं और बिना दबाव के समय पर फीडबैक व सपोर्ट दिया जाता है. अभिभावकों को घर पर कहानी सुनाने, साझा पढ़ने और खेल आधारित गतिविधियों में शामिल किया जाता है.

कक्षा को सीखने की जीवंत जगह बनाने के लिए लर्निंग कॉर्नर्स, थीमैटिक डिस्प्ले और बच्चों की बनाई सामग्री से उसे चाइल्ड फ्रेंडली और प्रिंट रिच बनाया गया. कहानी सुनाने से लेकर प्रकृति देखने तक, स्थानीय संस्कृति से लेकर स्कूल गतिविधियों में भागीदारी तक, सीखने के अवसर किताबों के बाहर भी तैयार किए गए.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना से जुड़ा प्रयास
यह पूरा प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर फाउंडेशनल स्टेज 2022 की मूल भावना से जुड़ा है. अनुभव आधारित शिक्षा, क्षमता आधारित सीखने, बहुभाषी सीखने, खेल आधारित शिक्षाशास्त्र, बाल-केंद्रित शिक्षा और तकनीक सक्षम सीखने इन सभी पहलुओं को उन्होंने रोजमर्रा की गतिविधियों से जोड़ा.

एक स्मार्टफोन से शुरू हुआ सफर डिजिटल कंटेंट से स्मार्ट पैनल तक पहुंचा और फिर बच्चों, शिक्षकों, अभिभावकों तथा पूरे समुदाय को जोड़ने वाली पहल में बदल गया. मुनमुन भट्टाचार्य की कहानी बताती है कि शिक्षा में बदलाव के लिए हमेशा बड़े बजट या महंगे संसाधनों की जरूरत नहीं होती. जरूरत होती है सोच में बदलाव की, बच्चे को समझने की संवेदनशीलता की और उपलब्ध संसाधनों को नए तरीके से इस्तेमाल करने की इच्छा की.

शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के हाथों मिलने वाला सम्मान सिर्फ एक शिक्षिका का नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है जिसमें हर बच्चे को सीखने का समान अवसर मिले. हर बच्चा बिना डर के सवाल पूछे, खेलते हुए सीखे, तकनीक का सही इस्तेमाल करे और स्कूल आने के लिए उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान हो. जब शिक्षक की सोच बदलती है, तो कक्षा बदलती है और जब कक्षा बदलती है, तो बच्चों का भविष्य बदलता है.
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