अयातुल्ला खामेनेई के साथ अपनी मुलाकातों को याद कर भावुक हुए सांसद रुहुल्लाह, PM मोदी और उमर अब्दुल्ला पर बरसे
श्रीनगर से उमर अब्दुल्लाह के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह ने ईरान पर हमले और अयातुल्ला खामेनेई की हत्या पर ETV Bharat से खास बातचीत की.


Published : March 3, 2026 at 3:30 PM IST
|Updated : March 3, 2026 at 6:03 PM IST
श्रीनगर: मार्च 2001 में, अपने पिता की एक शक्तिशाली IED धमाके में मौत के ठीक चार महीने बाद, आगा सैयद रुहुल्लाह तेहरान गए थे. वह वहां एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक दुखी युवा बेटे के रूप में गए थे. अपने दादा के साथ गए रुहुल्लाह की मुलाकात ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई से हुई थी.
आज, सांसद रुहुल्लाह उस मुलाकात को एक 'आध्यात्मिक पल' के रूप में याद करते हैं, जिसने उन्हें निजी दुख के समय में सुकून दिया था. उन्हें याद है कि खामेनेई ने उन्हें उन 'विश्वासों पर मजबूती से चलने' की सलाह दी थी, जिनके लिए उनके पिता और कश्मीर के प्रमुख शिया नेता आगा सैयद मेहदी ने अपनी जान दे दी थी.
इजराइल और अमेरिका के हमलों में ईरान के इस बड़े नेता की हत्या के बाद, रुहुल्लाह ने इस नुकसान को 'दर्दनाक' बताया. उन्होंने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खत्म होने और 'जंगल राज' के बढ़ने का संकेत है. ETV भारत ने रुहुल्लाह के साथ खास बातचीत की. पढ़ें, इसके प्रमुख अंश.
सवाल: अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
जवाबः दुनिया ने लक्ष्मण रेखा पार कर दी है. यह 'जंगल राज' है, जहां सैन्य ताकत वाला कोई भी देश बिना किसी डर के अपनी मर्जी थोप सकता है. संप्रभुता या एक ऐसे धार्मिक नेता का कोई सम्मान नहीं रह गया है जिसे पूरी मुस्लिम दुनिया में सम्मान की नजर से देखा जाता था. अंतरराष्ट्रीय समझौतों और कानूनों को ताक पर रख दिया गया है. इन हरकतों के जरिए अमेरिका असल में इजराइल की इच्छाओं को पूरा कर रहा है.
सवाल: आपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़राइल यात्रा की आलोचना क्यों की?
ऐतिहासिक रूप से, भारत हमेशा नैतिक सिद्धांतों और भू-राजनीति में एक स्वतंत्र दृष्टिकोण रखने वाला देश रहा है. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी देश को उस नीति से दूर ले जा रहे हैं. उन्होंने इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से मुलाकात की और उनका अभिवादन किया. इज़राइल, फिलिस्तीन में तबाही के जिम्मेवार है. मोदी के अलावा किसी अन्य संप्रभु नेता ने नेतन्याहू से मुलाकात नहीं की और न ही इजराइल का दौरा किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई सवालों के जवाब देने हैं. क्या उन्हें इस हमले के बारे में पता था, क्योंकि यह हमला उनके इज़राइल में होने के कुछ ही घंटों बाद हुआ? इसके अलावा, वह इस हमले और हत्या की निंदा करने में विफल क्यों रहे?
सवालः ईरान पर इजराइल-अमेरिका के हमले के बारे में क्या कहना चाहेंगे
जवाबः इज़राइल और अमेरिका द्वारा एक संप्रभु राष्ट्र (ईरान) पर हमला होते देखना बहुत दुखद और चिंताजनक है. उन्होंने मासूम लोगों और स्कूली बच्चों की जान ली और स्कूलों को निशाना बनाया. दुनिया की एक बड़ी आबादी के धार्मिक गुरु (अयातुल्ला खामेनेई) की हत्या कर दिया जाना बेहद चिंताजनक है.
सवाल: ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई से हुई मुलाकात के बारे में बताएं?
मैं उनसे दो बार मिला हूं. जब कश्मीर में मेरे पिता की हत्या हुई थी, तब मुझे और मेरे दादाजी को (जो यहां उनके प्रतिनिधि थे) उनकी ओर से निमंत्रण मिला था. वह मार्च 2001 का समय था और मुझे उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने का मौका मिला. अयातुल्ला ने मेरे पिता की हत्या पर व्यक्तिगत रूप से शोक संवेदना व्यक्त की. वह एक आध्यात्मिक पल था. उन्होंने मेरा माथा चूमा और मुझे अपने पिता के विश्वासों पर अडिग रहने की सलाह दी.
2010 में, मैं उनसे तब मिला जब मैं ईरान गया था. उस समय मैं (उमर अब्दुल्ला सरकार में) मंत्री बन चुका था. उन्होंने इतनी कम उम्र में मेरी प्रगति पर खुशी जताई और मुझसे अपने काम और जनता के प्रति वफादार रहने को कहा.
सवाल: उनकी (अयातुल्ला खामेनेई की) हत्या का ईरान और कश्मीर के मुसलमानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
जवाबः उन्होंने एक आध्यात्मिक पिता तुल्य व्यक्तित्व को खो दिया है. कश्मीर में लोग अपना दुख व्यक्त करने के लिए बाहर आए, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें रोक दिया गया क्योंकि वहां बैरिकेड्स और पाबंदियां लगा दी गई थीं. ये शांतिपूर्ण प्रदर्शन थे और वहां कानून-व्यवस्था का कोई उल्लंघन नहीं हुआ था. लोगों को शोक मनाने से क्यों रोका जा रहा है?
सवाल: आपने अयातुल्ला खामेनेई की हत्या की निंदा न करने पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की आलोचना की है?
जवाबः यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वह उन लोगों की भावनाओं से नहीं जुड़ पाए जिनका प्रतिनिधित्व करने का वह दावा करते हैं. यह उन पर एक सवालिया निशान है. वे निंदा करने से क्यों कतराते हैं? वे किसे खुश करना चाहते हैं? क्या उन्हें कहीं से निर्देश मिल रहे हैं?
उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि जनता क्या महसूस करती है. उनकी प्रतिक्रिया अपने मतदाताओं के बजाय केंद्र की सत्ता में बैठे लोगों के साथ मेल खाती है, जैसे प्रधानमंत्री चुप हैं. मुझे यहां भी वैसी ही समानता दिखती है और यह बहुत कुछ बयां करता है.
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