किशाऊ प्रोजेक्ट: 17 गांवों के 5000 लोगों की बात- 'सुनो देश, हम देंगे पानी, लेकिन हमारे हिस्से न आए पुनर्वास की दर्दभरी कहानी'
किशाऊ बांध प्रोजेक्ट से दिल्ली, राजस्थान, यूपी, हरियाणा को होगा लाभ. लेकिन इस परियोजना का हिमाचल के गांव, वन और संस्कृति पर गहरा असर होगा.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : June 22, 2026 at 10:11 PM IST
|Updated : June 22, 2026 at 10:21 PM IST
शिमला: राष्ट्रीय महत्व की किशाऊ बांध परियोजना के रास्ते की रुकावटें बेशक दूर होती चली जा रही हैं, लेकिन बिजली पानी की सौगात देने वाली ये विशालकाय परियोजना कुछ सवाल भी पैदा कर रही है. यहां उन्हीं सवालों की पड़ताल की जाएगी. तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा, इस डर और आशंका के बीच भारत जैसे विशाल देश के बड़े राज्यों की प्यास बुझाने की चुनौती हर समय सत्ता के समक्ष रही है.
किशाऊ बांध प्रोजेक्ट राष्ट्रीय महत्व की ऐसी ही परियोजना है, जिसके तैयार होने से न केवल देश की राजधानी दिल्ली की प्यास बुझेगी, बल्कि राजस्थान, यूपी, हरियाणा आदि मैदानी राज्यों के कंठ भी तर हो जाएंगे. जैसा कि तय है, हर विकास परियोजना अपने साथ पर्यावरण और इकोलॉजी पर असर भी डालती है. किशाऊ बांध परियोजना से भी कम से कम 17 गांवों से 5000 से अधिक लोग प्रभावित होंगे. गांव, वन, संस्कृतियों पर असर होगा. यही प्रभावित होने वाले गांव, वन और संस्कृतियां कह रही हैं-आओ देश, हम देंगे पानी, बस हमारा पुनर्वास कहीं बन न जाए इक दर्द भर कहानी. क्योंकि परियोजना विस्थापितों का पुनर्वास अकसर गंभीर प्रयासों के बिना कर दिया जाता है. प्रभावित इलाकों की समृद्ध जनजातीय संस्कृति है. इस संस्कृति के मूल पर विकास का प्रहार होगा

मिलेगा पानी-बिजली, मिट जाएगी चिंता
हाल ही में ये नेशनल इंपोर्टेंस का प्रोजेक्ट फिर से चर्चा में आया है. कारण ये है कि इस परियोजना को लेकर छह दिन पहले देश के गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में एक बैठक हुई. उस बैठक में हिमाचल के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य के हितों की पैरवी करते हुए इस बात को मनवाया कि परियोजना के पावर कंपोनेंट यानी बिजली घटक की दो हजार करोड़ की लागत वे राज्य वहन करें, जिन्हें पानी मिलना है. इस पर सैद्धांतिक सहमति होने से आठ साल पुराना गतिरोध टूट गया. अब हिमाचल को प्रोजेक्ट निर्माण में अपनी तरफ से कोई खास खर्च नहीं रह गया है, क्योंकि नब्बे फीसदी खर्च तो वैसे भी केंद्र वहन करेगा. प्रोजेक्ट पूरा हो जाने पर हिमाचल को सौ करोड़ यूनिट बिजली मिलेगी, जो सालाना छह सौ करोड़ रुपए कीमत की होगी.
इस परियोजना से सबसे अधिक पानी हरियाणा को मिलेगा. हरियाणा को 5.71 बिलियन क्यूसिक लीटर पानी मिलेगा. यूपी को 3.71 बिलियन क्यूसिक लीटर, राजस्थान को 1.119 बिलियन क्यूसिक लीटर, उत्तराखंड के .311 बिलियन क्यूसिक लीटर व दिल्ली को .724 बिलियन क्यूसिक लीटर पानी मिलेगा. किशाऊ बांध परियोजना से कुल 1324 बिलियन क्यूसिक लीटर पानी मिलेगा. बांध के पानी से 97 हजार हैक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी. कुल 236 मीटर ऊंचे बांध से कई तरह के लाभ होंगे. इस परियोजना के 2008 में नेशनल इंपोर्टेंस का प्रोजेक्ट घोषित किया गया था.

लाभ अनेक, साथ में विस्थापन का दर्द
प्रोजेक्ट का बांध 236 मीटर ऊंचा होगा और इसकी लंबाई 680 मीटर होगी. बांध के बनने से 32 किलोमीटर की विशालकाय पानी की झील बन जाएगी. इससे टौंस वैली के कई गांव प्रभावित हो जाएंगे. हिमाचल में जिला सिरमौर का शिलाई इलाका सबसे अधिक प्रभावित होगा. शिलाई में पांच पंचायतों के गांव विस्थापन की जद में आएंगे. ये पंचायतें बालीकोटी, कांडो, धारवा, चमरा मोहराड़ व सियासु हैं. यदि पिछली जनगणना (2011) के अनुसार देखा जाए तो इस परियोजना से 632 ज्वाइंट फैमिलीज व 508 सिंगल फैमिली प्रभावित होंगी. इसके अलावा अस्सी हजार से अधिक पेड़ काटने होंगे. कुल मिलाकर पौने दो सौ पक्के घर प्रभावित होंगे. यही नहीं, इलाके के 15 मंदिर भी इसके प्रभाव में आएंगे.

यदि उत्तराखंड व हिमाचल, दोनों राज्यों की बात की जाए तो करीब 40 रेवेन्यू विलेज पर इस परियोजना का असर होगा. यहां की हजारों हेक्टेयर भूमि, जिस पर अदरक व बेमौसमी सब्जियों की उपज होती है, वो जलमग्न हो जाएगी. कई सड़कें भी प्रभावित होंगी.
हिमाचल की तरफ से परियोजना निर्माण में सहयोग करने एचपीपीसीएल यानी हिमाचल प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड के अनुसार परियोजना से 1379 मिलियन यूनिट बिजली पैदा होगी. इस परियोजना से 860 मीटर फुल रेजरवायर लेवल अथवा पूर्ण जलाशय स्तर से जलमग्न होने वाला क्षेत्र 1498 हैक्टेयर होगा. इससे आठ गांवों के 2092 लोग प्रभावित होंगे. वहीं, उत्तराखंड में 9 गांवों के 3406 लोग प्रभावित होंगे.
क्या है किशाऊ बांध परियोजना?
हिमाचल के सिरमौर जिला व उत्तराखंड की सीमा पर किशाऊ बांध परियोजना बननी है. किशाऊ एक गांव का नाम है. पहले ये परियोजना किशाऊ के आसपास बननी थी, लेकिन अब कुछ जगह की कमी व तकनीकी कारणों से ये सांबरखेड़ा इलाके में बनाई जाएगी. यमुना की सहायक नदी टौंस पर ये परियोजना बनेगी. टौंस नदी हिमाचल व उत्तराखंड में बहती है. इसे हिमाचल व उत्तराखंड मिलकर बना रहे हैं. केंद्र का इसमें सहयोग है. इस परियोजना के तैयार हो जाने से दिल्ली, हरियाणा, यूपी, राजस्थान आदि को भरपूर पानी मिल सकेगा. हिमाचल को बिजली के रूप में छह सौ करोड़ रुपए सालाना का लाभ होगा.

टौंस नदी पर बनने वाला बांध भाखड़ा बांध से भी ऊंचा होगा. वर्ष 2014 में हिमाचल सरकार व उत्तराखंड सरकार के बीच परियोजना को लेकर सहमति बनी थी. पहले बांध की हिस्सेदारी पर विवाद था, लेकिन अब दोनों राज्यों को पचास-पचास फीसदी हिस्सा मिलना है. पहले 2014 में इस परियोजना की लागत 7 हजार करोड़ रुपए थी. बाद में बढ़कर ये दस हजार करोड़ रुपए हुई और अब ये 15 हजार करोड़ रुपए से अधिक हो गई है. परियोजना को हिमाचल व उत्तराखंड मिलकर बनाएंगे. किशाऊ कारपोरेशन लिमिटेड के बैनर तले ये परियोजना बनेगी.
विस्थापन का दंश पीड़ादायक
प्रख्यात पर्यावरणविद् कुलभूषण उपमन्यु कई अहम सवाल उठाते हैं. उपमन्यु दोनों तरफ देखते हैं. उनका कहना है कि देश के मैदानी राज्यों के लिए पानी अत्यावश्यक है. ऐसे में पेयजल की उपलब्धता के लिहाज से देखें तो ये परियोजना बननी चाहिए. विकास की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है, लेकिन धैर्य व गंभीरता से कुछ सार्थक फैसले लेने होंगे. पर्यावरण व इकोलॉजी की चिंता को लेकर कुलभूषण उपमन्यू कहते हैं-इतना बड़ा बांध बनेगा तो पर्यावरण पर असर आएगा ही. वहीं, करोड़ों लोगों के पीने के पानी का भी सवाल है. ऐसे में विस्थापन की दर्द कम करने के लिए कुछ बिंदुओं पर काम करना चाहिए. इनमें सबसे अधिक है विस्थापित लोगों की प्रकृति के अनुसार उन्हें जमीन के बदले उसी नेचर से मिलती-जुलती उपजाऊ जमीन प्रदान की जाए.
अकसर कई मामलों में देखा गया है कि भारी-भरकम रकम मुआवजे के रूप में मिलने से ग्रामीण अज्ञानता वश कहें या स्वभाव के अनुसार, उस धन का सदुपयोग नहीं कर पाते. ग्रामीण जनता खेत-खलिहान, पशुपालन, सब्जी उत्पादन से आजीविका कमाते हैं. फिर उपजाऊ जमीन पीढ़ी दर पीढ़ी एसेट का काम करती है. जमीन की कीमत हमेशा बढ़ती है, जबकि कैश के रूप में हाथ आया मुआवजा किसी न किसी दिन एक या अधिक से अधिक दूसरी पीढ़ी में खत्म हो जाता है. ऐसे में सत्ता को विस्थापन की समस्या का गंभीरता से समाधान करना होगा. ये भी देखा गया है कि परियोजना के लिए जमीन का अधिग्रहण करने से पहले कई वादे किए जाते हैं, जो सब्जबाग ही साबित होते हैं. जमीन के बदले उपजाऊ जमीन देनी चाहिए. कुल मिलाकर पुनर्वास सही तरीके से जिम्मेदारी से होना चाहिए.
शिलाई के स्थानीय निवासी और पर्यावरणीय चिंताओं को लेकर जागरुक जगत तोमर कहते हैं, "बांध निर्माण से विशालकाय झील बनेगी. जाहिर है, इसका असर आसपास के गांवों, उपजाऊ भूमि व वन संपदा पर होगा. फिर विस्थापन की पीड़ा झेलने वालों के जख्मों पर मरहम लगाने का काम गंभीरता से करना होगा. विस्थापित लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता के आधार पर समझना होगा".
लेखक-संपादक नवनीत शर्मा का कहना है, "अपनी जड़ों से उखड़ने की पीड़ा अबूझ होती है. विश्व भर में ये दुविधा रहती है कि विकास की कीमत पर परियोजनाओं का क्या विकल्प हो सकता है. देखा जाए तो पीने का पानी और बिजली भी जरूरी है. ऐसे में कीमत तो चुकानी ही होती है. यदि विस्थापन की पीड़ा पर सही पुनर्वास का मरहम लगाया जाए तो जख्म जल्द भर जाएंगे. पहाड़ यदि मैदान की प्यास बुझा रहा है तो केंद्र की सत्ता को विस्थापितों के त्याग को लेकर उचित सहायता व संवेदनाएं देनी चाहिए".
सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है, "राष्ट्रीय महत्व की इस परियोजना के लाभार्थी कई राज्य हैं. हिमाचल की सरकार अपने व जनता के हक के लिए जागरुक है. राज्य सरकार पुनर्वास को लेकर संवेदनशील रही है और आगे भी रहेगी".

