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मिरांडा हाउस में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान पर बड़ी रिसर्च, कम खर्च में जांच करने वाला बायोसेंसर विकसित

मिरांडा हाउस में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान पर रिसर्च, देखिए संवाददाता आनंद कुमार गुप्ता की ये खास रिपोर्ट

मिरांडा हाउस में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान पर बड़ी रिसर्च,
मिरांडा हाउस में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान पर बड़ी रिसर्च, (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Delhi Team

Published : May 20, 2026 at 4:10 PM IST

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नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में अल्जाइमर बीमारी की शुरुआती पहचान को लेकर रिसर्च की जा रही है. कॉलेज के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा बायो सेंसर विकसित किया है, जो कम लागत में अल्जाइमर के शुरुआती संकेतों का पता लगाने में मदद कर सकता है. यह रिसर्च अभी शुरुआती और परीक्षण चरण में है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक आम लोगों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है.

कॉलेज की प्रोफेसर मोनिका तोमर ने बताया कि कोविड-19 महामारी के बाद बुजुर्गों में अल्जाइमर और याददाश्त से जुड़ी समस्याओं के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई. इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपनी सहयोगी डॉ विलासिनी नौरैम और डॉ नमिता सिंह के साथ मिलकर ऐसा बायो सेंसर बनाने की योजना तैयार की, जो अल्जाइमर की शुरुआत को शुरुआती स्तर पर पहचान सके. इस टीम में डॉ काजल जिंदल, प्रो. मोनिका तोमर, डॉ विलासिनी नौरैम, डॉ अंजलि शर्मा, डॉ नेहा बत्रा, डॉ रीमा गुप्ता और प्रो. अरिजीत चौधरी शामिल हैं.

क्या है अल्जाइमर ?
क्या है अल्जाइमर ? (ETV Bharat)

क्या है अल्जाइमर बीमारी:
अल्जाइमर एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें व्यक्ति की याददाश्त धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है. समय के साथ मरीज को सामान्य बातें याद रखने, बोलने, सोचने और रोजमर्रा के काम करने में दिक्कत होने लगती है. यह बीमारी मुख्य रूप से बुजुर्गों में पाई जाती है और दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही है. अल्जाइमर के दौरान दिमाग में कुछ विशेष प्रोटीन जमा होने लगते हैं, जिससे मस्तिष्क की गतिविधियां प्रभावित होती हैं. इन्हीं बदलावों को पहचानने के लिए मिरांडा हाउस की टीम ने अपने शोध को आगे बढ़ाया है.

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दो खास प्रोटीन पर आधारित है पूरा शोध:

प्रो. मोनिका तोमर ने बताया कि अल्जाइमर बीमारी में मुख्य रूप से दो प्रोटीन “टाउ प्रोटीन” और “बीटा अमायलॉइड” जरूरी भूमिका निभाते हैं. सामान्य व्यक्ति के शरीर में इन दोनों प्रोटीन की एक निश्चित मात्रा होती है, लेकिन जैसे-जैसे अल्जाइमर की शुरुआत होती है, यह प्रोटीन दिमाग में जमा होने लगते हैं और खून में इनकी मात्रा कम हो जाती है. उन्होंने बताया कि इसी सिद्धांत के आधार पर ऐसा बायोसेंसर तैयार किया है, जो खून में इन प्रोटीन की मात्रा को माप सकता है. यदि किसी व्यक्ति के खून में इनकी मात्रा लगातार कम होती दिखाई देती है तो यह अल्जाइमर की शुरुआती संभावना का संकेत हो सकता है. प्रो. मोनिका तोमर ने बताया कि यदि बीमारी का पता शुरुआती स्तर पर चल जाए तो मरीज की स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है और समय रहते जरूरी सावधानियां एवं इलाज शुरू किए जा सकते हैं.

दो खास प्रोटीन पर आधारित है पूरा शोध
दो खास प्रोटीन पर आधारित है पूरा शोध (ETV Bharat)

रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल से मिला सहयोग:

इस परियोजना को कॉलेज की रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल का समर्थन मिला. टीम ने अपने प्रोजेक्ट को कॉलेज में प्रस्तुत किया, जिसके बाद उन्हें रिसर्च के लिए कॉलेज की प्रिंसिपल प्रोफेसर विजयालक्ष्मी नंदा ने सहायता प्रदान की. वर्तमान में शोधकर्ताओं ने बायो सेंसर की चिप तैयार कर ली है और उस पर प्रयोग भी किए जा रहे हैं. हालांकि यह तकनीक अभी पूरी तरह बाजार के लिए तैयार नहीं है. उन्होंने बताया कि आगे इसके लिए विस्तृत परीक्षण, प्रोटोटाइप निर्माण और वास्तविक मरीजों के नमूनों पर अध्ययन करना जरूरी होगा.

कैसे काम करता है यह बायोसेंसर
कैसे काम करता है यह बायोसेंसर (ETV Bharat)

कैसे काम करता है यह बायोसेंसर:

असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. काजल जिंदल ने बताया कि यह बायोसेंसर इलेक्ट्रोकेमिकल तकनीक पर आधारित है. उन्होंने बताया कि बुजुर्ग मरीजों के लिए बार-बार अस्पताल या लैब जाना आसान नहीं होता, इसलिए कोशिश की गई कि ऐसी तकनीक विकसित हो जिसे घर पर भी इस्तेमाल किया जा सके. उन्होंने बताया कि प्रयोगशाला में एक विशेष “थिन फिल्म बेस्ड सेंसर चिप” तैयार की है. इस चिप पर ऐसी एंटीबॉडी लगाई गई है, जो अल्जाइमर से जुड़े प्रोटीन को पहचान सकती है. जब इस सेंसर पर बीटा अमायलॉइड प्रोटीन की अलग-अलग मात्रा डाली जाती है तो इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया के दौरान बनने वाले करंट में बदलाव देखा जाता है. इस बदलाव को रिकॉर्ड करते हैं और उसके आधार पर यह समझते हैं कि शरीर में प्रोटीन की मात्रा कितनी है. डॉ. काजल जिंदल ने बताया कि जैसे-जैसे बीटा अमायलॉइड की मात्रा बढ़ती है, सेंसर पर रिकॉर्ड होने वाला करंट कम होता जाता है. इसी प्रक्रिया की मदद से मरीज की स्थिति का विश्लेषण किया जा सकता है.

रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल से मिला सहयोग
रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल से मिला सहयोग (ETV Bharat)

असली सैंपल पर भी हुआ परीक्षण:

शोध को केवल लैब तक सीमित नहीं रखा गया. रिसर्च टीम ने मानव खून के नमूनों पर भी इसका परीक्षण किया. खून से सीरम निकालकर उसी प्रक्रिया के तहत सेंसर पर जांच की गई और फिर तैयार “कैलिब्रेशन कर्व” की मदद से प्रोटीन की मात्रा का अनुमान लगाया गया. डॉ काजल ने बताया कि इस प्रक्रिया के जरिए शोधकर्ताओं ने यह जांचने की कोशिश की कि उनका सेंसर वास्तविक परिस्थितियों में कितना सही परिणाम देता है. शुरुआती परीक्षणों में सेंसर के परिणाम संतोषजनक पाए गए हैं.

महंगी जांच तकनीकों का सस्ता विकल्प बनने की उम्मीद
महंगी जांच तकनीकों का सस्ता विकल्प बनने की उम्मीद (ETV Bharat)

एम्स के साथ भी सहयोग:

शोध को आगे बढ़ाने के लिए टीम ने ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (AIIMS) के साथ भी सहयोग शुरू किया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि जल्द ही अधिक संख्या में वास्तविक मरीजों के नमूनों पर अध्ययन किया जाएगा, जिससे इस तकनीक की सटीकता और विश्वसनीयता को और बेहतर तरीके से समझा जा सके. डॉ काजल ने बताया कि यदि बड़े स्तर पर परीक्षण सफल रहता है तो भविष्य में यह तकनीक अस्पतालों और घरों दोनों में उपयोग की जा सकती है.

नियमित हेल्थ चेकअप में शामिल करने का सुझाव
नियमित हेल्थ चेकअप में शामिल करने का सुझाव (ETV Bharat)

महंगी जांच तकनीकों का सस्ता विकल्प बनने की उम्मीद:

प्रो. मोनिका तोमर ने बताया कि वर्तमान में अल्जाइमर की पहचान के लिए जो तकनीकें उपलब्ध हैं, वह काफी महंगी हैं और उन्हें संचालित करने के लिए विशेष प्रशिक्षित विशेषज्ञों की जरूरत होती है. कई जांचों में अत्याधुनिक मशीनों और जटिल प्रक्रियाओं का इस्तेमाल होता है, जिससे सामान्य लोगों के लिए जांच कराना आसान नहीं होता. उन्होंने बताया किइसके मुकाबले यह बायोसेंसर कम लागत वाला है और इसे भविष्य में ग्लूकोमीटर की तरह इस्तेमाल करने योग्य बनाने की योजना है. यानी जिस तरह लोग घर पर ब्लड शुगर की जांच करते हैं, उसी तरह भविष्य में अल्जाइमर से जुड़े प्रोटीन की जांच भी संभव हो सकती है.

मिरांडा हाउस में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान पर बड़ी रिसर्च
मिरांडा हाउस में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान पर बड़ी रिसर्च (ETV Bharat)

नियमित हेल्थ चेकअप में शामिल करने का सुझाव:

भविष्य में शरीर की सामान्य जांचों के साथ “टाउ प्रोटीन” और “बीटा अमायलॉइड” की जांच भी शामिल की जानी चाहिए. इससे डॉक्टरों को समय रहते यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी व्यक्ति के दिमाग में अल्जाइमर से जुड़े बदलाव तो शुरू नहीं हो रहे. यदि नियमित जांच के जरिए शुरुआती संकेत मिल जाएं तो बीमारी को नियंत्रित करने और मरीज की जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाए रखने में काफी मदद मिल सकती है.

अभी रिसर्च स्टेज में है तकनीक:

शोधकर्ताओं ने बताया कि यह तकनीक अभी शुरुआती रिसर्च स्तर पर है और इसे बाजार में लाने से पहले कई चरणों से गुजरना होगा. फिलहाल टीम प्रोटोटाइप विकसित करने और बड़े स्तर पर परीक्षण की दिशा में काम कर रही है. प्रो. मोनिका तोमर ने बताया कि अभी इस तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन नहीं किया गया है, लेकिन शोध से जुड़ा एक वैज्ञानिक प्रकाशन जारी किया जा चुका है. आने वाले समय में यदि प्रोटोटाइप सफल रहता है तो पेटेंट के लिए भी आवेदन किया जाएगा.

कम खर्च में जांच करने वाला बायोसेंसर विकसित
कम खर्च में जांच करने वाला बायोसेंसर विकसित (ETV Bharat)

स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए जरूरी साबित हो सकती है पहल:

भारत सहित दुनिया के कई देशों में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ अल्जाइमर जैसी बीमारियों के मामले भी बढ़ रहे हैं. ऐसी स्थिति में कम लागत वाली और आसान जांच तकनीकें स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी साबित हो सकती हैं.

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